राष्ट्रीय पटल अपनी गर्जना करने वाले
विषयों की गूंज जब गली मोहल्लों, चौपालों में भी पहुंच जाती है तो समझिए कि मामला
अब सचमे राष्ट्रीय हो चला है। महिलाएं घरों के सामने खड़ी होकर या मर्द चौक
चौराहों पर खड़े होकर चर्चा करने लगते हैं तो मामला वाक्ये में गंभीरता की तरफ बढ़
जाता है। फिर हम कह सकते हैं कि उस विषय का सरोकार अब समाज के निचले तबके तक भी
पहुंच रहा है। एक मजदूर जो कि पूरे दिन रिक्शा खींचता है, साइकिल पर कई किलोमीटर
का रास्ता तय करके कारखानों में अपना पसीना बहाने पहुंच जाता है। वो शख्स घर
पहुंचकर खाना खाता है और सो जाता है। फिर सुबह उठता है और अपने काम धंधे पर लौट
जाता है। उसे नही है परवाह इंडिया गेट पर होने वाले धरने प्रदर्शनों की। एक लड़की
की अस्मत लूटती है तो किस तरह के कानून संवैधानिक पटल के आसरे अपने मूर्त रूप में
लौट रहे होते हैं उसका सरोकार उसे नही होता। लेकिन जब वही मजदूर किस्म का व्यक्ति
राष्ट्रीय स्तर के विषयों की चर्चा में शामिल होता है तो समझिए मामला गंभीर हो चला
है। दिल्ली के गैंगरेप मामले में भी कुछ इसी तरह की चीजें सामने आ रही हैं। मीडिया
में आने वाले प्रदर्शन के बाद सत्ता विरोधी और क्रूरता विरोधी आवाज़ अब चौक
चौराहों और घर के सामने बैठी महिलाओं में भी होनी शुरू हो चुकी हैं। पीड़िता की
मौत ने विरोध के स्वर में गुस्से को और बढ़ा दिया है मानों ये स्थिति इंडिया गेट
पर प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज के बाद उठे बवाल से भी कहीं
ज्यादा गुस्सैल है। मेरे मायनों में ये गुस्सा दिल्ली के लुटियन ज़ोन में होने
वाले विरोधों से भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यहां बात अब मीडिया में आने वाले
प्रदर्शनों से हटकर भी होने लगी है। सूदुर गांवो में दौरा कर लीजिए या झुग्गियों
में रहने वाले लोगों का हाल जान लीजिए सभी तरफ से एक ही आवाज़ आएगी कि पीड़िता के
साथ दुष्कर्म करने वाले लोगों को सरेराह फांसी पर लटका दिया जाए। वहीं बीच में से
एक स्वर ये भी उठेगा कि फांसी पर लटकाने से क्या होगा! बलात्कारियों के गुप्तांगों को ही काटकर उन्हें नपुंसक बना
देना चाहिए। इस तरह का स्वर हर जगह से उठ रहा है। खैर लोकतांत्रिक व्यवस्था में
क्या सज़ा सही है और क्या गलत ये तो सरकारी नुमाइंदों को सोचना है पर इस
लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार ये “लोक” तो यही चाहता है कि सजा कुछ ऐसी होनी चाहिए कि ब्लात्कारियों
को सबक मिले।
जब बातें सोशल नेटवर्किंग साइट्स से निकलकर
सोशल या गूढ़ सामाजिक हो जाएं(गूढ़ इसलिए लिखा क्योंकि सामाजिक होने और गूढ़
सामाजिक होने में यथार्थपरक फर्क है) तो समझ जाना चाहिए कि सत्ता विरोधी लहर अब
राशन की दुकान में मापतोल को लेकर लड़ रही महिला तक भी पहुंच चुकी है। लोकतांत्रिक
व्यवस्था की दुहाई देकर विरोध प्रदर्शनों के हिंसक प्रदर्शनों को गलत तो ठहराया जा
सकता है लेकिन दुष्कर्मियों के विरोध में धमनियों में उबाल मार रहे खून को कैसे
शांत किया जा सकता है। चलिए मान लिया जाए अन्नायपूर्ण और लोकअहितकारी इस व्यवस्था
का विकल्प अराजक व्यवस्था नही हो सकता, मगर ये कौन देखेगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था
तो खुद ही आईसीयू में अंतिम सांसें गिन रही है। जिस व्यवस्था में लोगों के द्वारा
सरकार का चुनाव होता हो वहां लोग ही सुरक्षित नही होंगे तो क्या तो वो लोकहितकारी
व्यवस्था रहेगी और क्या ही सामाजिक उत्थान के अपने लक्ष्यों को वो सत्ता पूरा कर
पाएगी? ऐसा नही कि बलात्कार पहली बार हुआ
हो या उसे मीडिया ने पहली बार प्रमुखता से उठाया हो, वक्त-वक्त पर मीडिया अपनी
जागरूकता दिखाता रहता है। समाज में छुपे बर्बर रूप को भी उजागर करता रहता है लेकिन
सत्ता के गलियारों से सिर्फ आश्वासनों की राजनीत ही होती है। संपादकों को विशेष
बैठकों में बुलाकर सत्ता विरोधी मीडिया प्रकल्पों को भी सरकार शांत कर देती है।
लेकिन इस बार मामला जरा गंभीर हो चला है। सरकारी तंत्र सुरक्षित वातावरण देने में
असफल रहा है और इसकी भी कोई गारंटी नही है कि आने वाले वक्त में भी हम सुरक्षित
रहे पाएंगे। बलात्कार की घटनाएं अभी भी हो रही है। सवाल है आखिर क्यों? दरअसल ये सवाल हमेशा यूहीं सरकारी तंत्र के सामने मुंह बाए
खड़ा रहेगा। नही मिल पाएगा इस सवाल का जवाब हमें। अब मामला गैंगरेप का है तो कुछ
आरोपियों को पकड़कर जेल में डाल दिया जाएगा। कुछ मामले थानों में आसानी दर्ज हो
जाएंगे लेकिन कुछ वक्त बाद क्या होगा, जब वसंत विहार गैंगरेप की चिता का आंच ठंडी
हो जाएगी? चलिए आप गैंगरेप बंद कर देंगे, क्या
हत्याएं बंद हो जाएंगी? लूट की वारदातों को ग्रहण
कब लगेगा? बसों में जेबें कटनी कब बंद होंगी? हमारे नलों में नियमित रूप से पानी कब आएगा? सड़कों के गड्ढे कब भरेंगे? कब
बहन-बेटियां रात को 10 बजे बस स्टैंड पर पहुंचने पर अपने भाई को फोन करके नही
बुलाएंगी? कब वो स्वावलंबन के साथ अकेली घर
लौट पाएंगी?
सवाल कई हैं। जिन प्रश्नों को ऊपर उठाया है ये
सभी जिम्मेदारियां सरकार की ही है। सरकार का दायित्व है इन्हें पूरा करना लेकिन आज
तक सरकार सिर्फ पंगु बनी हुई है। और मैं भरोसे के साथ कहता हूं कि सरकार हमेशा
पंगु बनी रहेगी। तो सुन लो सत्ता के दलालों अगर हालात नही बदले तो प्रदर्शन फिर
होगा। इंडिया गेट की सड़कें फिर जाम होंगी। मेट्रो स्टेशन बंद करने पर भी लोग अपने
वाहनों से या पैदल ही पहुंचंगे। नही पहुंच पाए तो हर सड़क राजपथ होगी और हर
मोहल्ला जनपथ। विरोध तो होगा। संभल जाओ और संभाल लो। अब आवाज़ एलिट क्लास से नही
आम आदमी के ह्रदय से निकल रही है।
