Tuesday, January 25, 2011

विकास तभी संभव जब लोगों के आशियाने बने




लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधीश जनता के सेवक के तौर पर नियुक्त किए जाते हैं। ये लोग कहने को तो सत्ताधीश होते हैं लेकिन इनका असल उद्देश्य जनता की छोटी से छोटी जरुरतों को पूरा करना होता है। जनता का हित सर्वोपरि रखना ही लोकतंत्र की पहली औऱ आखिरी शर्त होती है। रोटी,कपडा और मकान एक आदमी को मिल रहा है या नही, या वो किस रुप में मिल रहा है ये भी जानने का दायित्व लोकसेवकों को दिया जाता है। रोटी कपडा और मकान एक इंसान की पहली जरुरत होती है या ये कहें कि इंसान कहलाने के लिए आपके पास इन तीनों चीजों का होना जरुरी है, तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी।

देश की राजधानी दिल्ली ने कई लोगों को आशियाना दिया है बस फर्क है तो सरकार की नितियों में किसी को अनाधिकृत बना दिया है तो किसी का आशियाना प्रशासन के नियमों पर खरा उतरता है। लेकिन रहने वाले के लिए तो आशियाना अनाधिकृत और अधिकृत कुछ नही होता, वो तो बस एक घर होता है जहाँ उसके बच्चे स्कूल से जीतकर मैडल लाते हैं तो कोई बेटा या बेटी अपनी माँ को अपनी पहली सैलरी इस आशियाने में थमाती या थमाता है। किसी की बेटी की डोली इन आशियानों से उठती है तो किसी की मय्यत के दो आंसू इन्हीं आशियानों में बहाए जाते हैं। एक आदमी जब घर बनाता है तो कई सपने उसकी आंखों में घर बना चुके होते हैं लेकिन जब प्रशासन का एक आदमी उस घर पर अपनी आंखे तरेरता है और उसके निर्माण को जनता के द्वारा चुने गए लोकसेवकों के बनाए नियमों का हवाला देकर रुकवा देता है तो एकबारगी दिल में ये ख्याल आता है कि आखिर ये आज़ादी किस काम की है! दिल्ली में सरकार ने नियमों के निर्माण और उन नियमों के कार्यान्वयन के लिए डीडीए,एमसीडी को कुछ अधिकार दिए हैं और इनकी मदद के लिए पुलिस तो हमेशा से तैयार ही रहती है। दिल्ली में घर बनाने वालों को प्रशासन से अनापत्तिप्रमाण पत्र लेना पडता है अगर व्यक्ति अनाधिकृत कालोनी में रह रहा है तो उसे कोई अधिकार नही है घर बनाने का (कुछ अपवादों को छोडकर)। हालांकि सरकार समय समय पर अलग अलग प्रकल्पों के माध्यम से ये प्रयास करती रहती है लोगों को आशियाना बनाने में कोई परेशानी न आए।
दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशानुसार अनाधिकृत बस्तियों में घर बनाने पर कड़ी आपत्ति है जिसका उल्लंघन करने पर सजा का भी प्रावधान है। अनाधिकृत निर्माण को किसी भी तरह से जायज नही ठहराया जा सकता लेकिन सरकार को ये आवश्यकता है वो ये भी जाने की उस अनाधिकृत निर्माण के पीछे मंशा क्या है। एक परिवार 25 या 50 गज की जगह पर अपना घर बनाकर रहता है। अचानक उसे जरुरत महसूस होती है कि वो अपने घर का पुर्ननिर्माण करे। वो शुरु हो जाता है उस निश्चित जगह में अपना घर बनाने के लिए जिस निश्चित जगह में उसका घर पहले बना था, लेकिन जब वो घर बनाना शुरु करता है तो अचानक उसे रोकने के लिए प्रशासन के नुमाईंदे आ जाते हैं और उसके घर के निर्माण को रुकवा देते हैं। सवाल ये उठता है कि जब एक आदमी अपने निश्चित क्षेत्र में घर बनाने की कोशिश कर रहा तो उसे रोका क्यों जाए? ऐसा लगता है कि प्रशासन धाक लगाए बैठा है कि कब एक आम आदमी अपना घर बनाए और कब प्रशासन उसे अनाधिकृत का प्रमाण पत्र पकड़ाकर उसके घर को बनने से रोक दे। ये दशा समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भुगत रहा है। ये तो सिर मुंडाते ही ओले पडने जैसा हो जाता है। ये दशा निसंदेह भ्रष्टाचार को बढावा देती है। अपने अर्धविकसित घऱ को बनाने के लिए फिर शुरु होता है खरीद-फरोख्त का खेल। जो जेब गर्म कर देता है वो कुछ दिनों बाद अपने गृहप्रवेश की दावत दे देता है और जो जेब गर्म करने में असमर्थ होता है वो सिर्फ सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटता रह जाता है।
दरअसल प्रशासनिक नुमाईंदे इस सच्चाई से रुबरु नही होते वो तो रिपोर्टों पर विश्वास करते हैं। जमीनी सच्चाई से सरोकार रखने को वो अपनी कार्यप्रणाली में शामिल नही करते। सरकार विकास के लिए करोडों रुपये का फंड जनता को मुहैया करवाती है लेकिन सवाल ये भी उठता है कि क्या घर बनाना विकास की श्रेणी में नही आता? सवाल ये भी उठ सकता है कि अनाधिकृत कालोनियों में घर बनाने पर पाबंदी है तो क्या अनाधिकृत कालोनियों को दिल्ली सरकार की तरफ से दिए जा रहे 170.99 करोड रुपये व्यर्थ हैं। गौरतलब है कि अभी हाल ही में दिल्ली सरकार ने अनाधिकृत कालोनियों के विकास के लिए 45 करोड रुपये भी मजूंर किए हैं। अब राशी बढकर 216.69 करोड़ रुपये हो गई है। सरकार ने एक नियम और बनाया जिसके तहत अनाधिकृत/नियमित कालोनियों व गाँवों में रहने वालों को मकान बनाने मे बड़ी राहत मिलने जा रही है। बिल्डिंग बायलॉज बदलने से लोगों की मकान बनाने की ख्वाहिश जल्द पूरी होती नजर आएगी। शहरी विकास मंत्रालय ने तो इसे मंजूरी दे दी है। इसी महीने इसके लिए गजट नोटिस भी जारी किया जा सकता है। इसके लागू होने के बाद इन क्षेत्रों में डीडीए और एमसीडी के पहले के भवन उपनियम लागू नही होंगे। इसके तहत विशेष क्षेत्र, नियमित/अनियमित कालोनियों तथा गाँवों को जल्दी ही डीडीए नोटिफाईड कर देगा। जिसके बाद लोगों को मकान बनाने में कुछ राहत मिल सकेगी। छोटे प्लाटों का नक्शा पास कराने में भी आसानी होगी। विकास के लिए पार्षदों को इस बार जो 50 लाख रुपये मिले हैं उससे क्षेत्र का विकास तो हो जाएगा लेकिन लोगों की मूलभूत जरुरत यानि की मकान के बारे में सरकार को नियमों में निसंदेह लचीलापन लाना जरुरी हो गया है।
दिल्ली कई अनाधिकृत कालोनियों को अपनी गोद में समाए हुए है। जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा वर्ग निवास करता है इस बड़े वर्ग का विकास तभी संभव है जब इन्हें एक खुला वातावरण मिले। सरकार को जरुरत है अनाधिकृत निर्माण को रोकने की। अनाधिकृत कालोनियों में अपने क्षेत्र में निर्माण करने वालों को रोकने का कोई औचित्य नजर नही आता। सरकार को जरुरत है जागरुकता संबंधी कार्यक्रम चलाने की जहाँ लोग इन नियमों को अच्छी तरह से जान सकें। बिना लोगों को जागरुक किए उनके आशियानों को बनने से रोका जाएगा तो निसंदेह विरोध का स्वर मुखर होगा। अपनी ऊंगलियों को मैं बस ये अंतिम पंक्ति कहकर आराम देना चाहुँगा कि­­_ _
“उम्मीदों के साए में आप तो आशियाने बनाने वाले हो,
खुदा ने पतझड़ बनाया है पत्ते गिराने के लिए”

Thursday, January 13, 2011

दुस्साहस की इंतेहां


चीन ने अरुणाचल प्रदेश के दो नागरिकों को स्टेपल वीजा देकर सीधे तौर पर फिर से भारत की संप्रभुता पर चोट की है। चीन के इस दुस्साहस ने एक बार फिर ये साबित किया है कि कितनी भी वार्ताएं हो जाएं लेकिन चीन की भारत के संबंध में जो भी नितियाँ है वो नही बदलने वाली। नत्थी वीजा की आड़ में चीन ये जता देना चाहता है कि अरुणाचल को वो किसी भी कीमत पर भारत का हिस्सा नही मानेगा।चीनी प्रधानमंत्री के भारत दौरे के दौरान भी स्टेपल वीजा से लेकर सीमा विवाद औऱ तिब्बत तक के विषय पर चर्चा हुई थी वो बात अलग है कि चर्चा सिर्फ चर्चा के लिए ही हुई थी,न तो उसमे कोई गहनता थी और न ही विवाद सुलझाने की मंशा।चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत आए थे सिर्फ अपने आर्थिक हितों की पूर्ति करने के लिए। न जाने भारत इस बात को क्यों नही मान रहा कि चीन औऱ भारत के तथाकथित मित्र देश भारत को एक बाजार की दृष्टि से ज्यादा और कुछ नही मानते। पाकिस्तान को विभिन्न रुपों में मदद देकर चीन भारत को प्रभावित करने की कोशिश करता रहता है। इस बात से भी इन्कार नही किया जा सकता कि भारत में पनप रहे नक्सलवाद या माओवाद के पीछे चीन का हाथ नही है। दरअसल ये चीन कि विदेश नीति का हिस्सा बन गया कि कैसे भारत जैसे उभरते देश को अस्थिर करके उसके विकास को रोका जा सके। जिस देश में लोकतंत्र समर्थकों को गोलियों से मरवा दिया जाता है उस देश से ये उम्मीद करना बेकार है कि वो खुद पर किसी भी तरह की मुसीबत आने पर किसी लोकतांत्रिक देश की लोकतांत्रिक नितियों के खिलाफ कोई कदम नही उठाएगा। ये सर्वविदित है भारत के पास अभी वो शक्ति नही है कि वो चीन का मुकाबला कर सके। शायद यही कारण है कि चीन लगातार हमारी मांगों के साथ सिर्फ खिलवाड़ कर रहा है। वो कहते हैं न कि शांति बकरी की तरह मिमियाने से नही मिलती शेर की तरह दहाडने से मिलती है। इसलिए अब समय आ गया कि शेर की तरह दहाडा जाए।

स्टेपल वीजा तो चीन के दुस्साहस का एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि चीन के इस हालिया दुस्साहस पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है। प्रकाश ने 12 नवंबर 2009 को जारी की गई ट्रैवल एडवाईजरी की याद भी दिलाई जिसमें चीन द्वारा जारी किए गए नत्थी वीजा को भारत से बाहर गैरकानूनी मानने की बात कही गई थी। दरअसल भारत को एक कड़ा कदम उठाने की जरुरत है। वो कदम ये भी हो सकता है कि भारत चीनी उत्पादों को खरीदना बंद कर दे। इससे कम से कम चीन को एक सबक मिलेगा और उसकी अर्थव्यव्स्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से भी निसंदेह चीन को झटका लगेगा। हालांकि ये कदम बहुत कड़ा है लेकिन कुछ तो करना ही पडेगा नही तो चीन का दुस्साहस समय के साथ और भी बढता रहेंगा।