Monday, June 28, 2010

हम्माम में सब नंगे या पानी गंदा !


नाइट शिफ्ट में ऑफिस से काम करके सुबह घर लौट रहा था.उस समय आलम ये था कि मेरी आँखे और डीटीसी बस की जर्जर हालत की तेज आवाज युद्धरत थी.मुल्तान नगर की लाल बत्ती पर डीटीसी लाल बत्ती को पार करती हुई निकल गई.पीरागढी पर बस के पहुँचते ही डीटीसी बस के आगे एक ट्रैफिक पुलिस की पीसीआर वैन आकर खड़ी हो गई.मैं भी बस से उतर गया.देखा तो पाया कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी से जुर्माना वसूल करने की कोशिश कर रहा था.देखकर आश्चर्य हुआ कि ऐसा तो होता नही है, मगर हो रहा है तो अच्छा है.ये कवायद सरकार की समानता की नीतियों का समर्थन तो कम से कम कर ही रही है.सरकारी कर्मचारी कोई लाईसेंस प्राप्त कानून भंजक तो है नही ! खैर पुलिसवाले और डीटीसी ड्राइवर का विवाद बढ़ गया.पुलिसवाले का गुस्सा देखकर ड्राइवर थोडा़ नरम पडा और जेब से सौ का नोट निकालकर पुलिसवाले की जेब में डाल दिया.पुलिसवाला झल्लाया तो ड्राइवर ने पचास का एक और नोट निकालकर उसे भी पुलिसवाले की जेब में डाल दिया.पुलिसवाला बस वाले को चेतावनी देकर फौरन निकल गया.
मेरे लिए ये एक अजीब सा ही अनुभव था कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी को रिश्वत दे रहा है मैने ऐसा पहली बार देखा था.भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में रिश्वत एक बेहद सशक्त हथियार है अपने लक्ष्य को भेदने का.बार-बार जागरुकता संबंधी कार्यक्रम जोर मारता है कि शिक्षा भ्रष्ट्राचार का नाश कर सकती है.पर सवाल ये है कि क्या वो दोनो सरकारी कर्मचारी शिक्षित थे? जवाब है नही.क्योंकि शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नही बल्कि नैतिक मूल्यों के प्रति आदर भी है.लेकिन अब नैतिक तो भुला दिया गया है और मूल्य का ही आदर किया जा रहा है.मूल्य चुकाओ और कोई भी काम करवाओ,ये शिगुफा बन गया है.दरअसल भारत में शिक्षा प्रसार सिर्फ 6 घंटो की कवायद ही रह गया है.स्कूल कॉलेजों मे भ्रष्ट्राचार समाप्ति के भाषण सिर्फ वर्किंग ऑवर्स की बात ही रह गई है.सत्य के धरातल पर कुछ और ही बात सामने आती है.हम प्रतिदिन अपने इर्द-गिर्द भ्रष्ट्राचार होता देखते हैं परन्तु उसके खिलाफ आवाज उठाने में कतराते हैं, क्योंकि हमारी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर हमारा विश्वास नही है.वोट देना महज फैशन बन कर रह गया है.और वैसे भी राक्षसों के बीच में भगवान को चुनना तो असंभव ही है.बात होती है एक वोट से दुनिया बदलने की पर सच्चाई ये है कि एक हमेशा से कमजोर होता है.दरअसल भारतीय जनमानस के अंदर राष्ट्र के अस्तित्व को सजाने,संवारने और संरक्षित करने की भावना लगभग मर चुकी है. लोकतंत्र का मतलब ये नही कि लोग अपनी मर्जी से नेता चुने बल्कि लोकतंत्र का उद्देश्य है कि लोग अपनी मर्जी से अच्छा नेता चुने.अब अच्छा नेता क्या है ये समझाने की मुझे जरुरत नही है.राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का भाव ही हमारे मन में होना चाहिए.तभी कुप्रथाएं देश को बचा पाएंगी.लेकिन नीति नियंता कैसे हो इस पर भी विचार होना चाहिए.आप मुझे भी बतायें कि अच्छा नीति नियंता क्या होता है?

Thursday, June 10, 2010

दुर्भावनाओं से भरी जनगणना

जात ही पुछो साधु की,मत पुछिए ज्ञान,
मोल करो मयान का,ऊपर से होती पहचान
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दोहों का मतलब बदलने में समय नही लगता. झुठ,फरेब और ऊपरी दिखावे के आसरे सत्ता के तवे पर राजनीतिक लोग और उनके नुमाइंदे अपनी राजनीतिक रोटियाँ खूब सेकते हैं.दस सालों में एक बार होने वाली जनगणना ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में एक नया विवाद पैदा कर दिया है.जनगणना में अब जाति के आधार पर लोगों की गिनती की जाएगी और ये प्रस्ताव एक ऐसे देश में रखा गया है जो अपने मिजा़ज से धर्मनिरपेक्ष है.लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इसी धर्मनिरपेक्ष देश में पहली बार 1991 में उसी सरकार नें धर्म आधारित जनगणना की पैरवी की थी जिसने देश की स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण में धर्मनिरपेक्षता का भाव डाला था.मैं बात कर रहा हुँ कांग्रेस सरकार की. ये वही कांग्रेस सरकार है जो कि पहले जाति आधारित जनगणना से ना नुकुर कर रही थी और अब समर्थन की मुस्कान से तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों को खुश कर रही है
देश में जाति आधारित जनगणना से निसंदेह जाति व्यवस्था को बल मिलेगा और जनगणना के बाद जो आंकडे़ आएंगे उन पर राजनीतिक गुणा-भाग का जो दौर चालु होगा वो भारतीय संविधान की आत्मा को गहरा आघात पहुँचाएगा.देश की संसद में जाति आधारित जनगणना के मामले में जान फूंकने वालों में जिस यादव तिकड़ी ने गोलबंदी की है वो 70 के दशक के समाजवादी आंदोलन की ही पैदाइश है जिसे राम मनोहर लोहिया लीड कर रहे थे.बड़े दुर्भाग्य की बात है कि यादव तिकडी़ जाति व्यवस्था को बढावा देने का कोई मौका नही छोड़ती औऱ वहीं इनके तथाकथित राजनीतिक पिता राममनोहर लोहिया ने जाति व्यवस्था के जिन्न को बोतल में बंद रखने की ही वकालत की.लेकिन ये राजनीतिक मजबूरियाँ और अस्तित्व को बनाए रखने की कवायद है जो इन्हे जाति व्यवस्था को मजबूत करने की वकालत करने पर मजबूर करती है.दरअसल सपा, राजद,जेडीयू और बसपा ये वो पार्टियाँ है जो मुद्दों के आसरे नही बल्कि अपने जातिगत व धार्मिक प्रपंचों के आसरे सत्ता पर काबिज होने की जोड तोड करते हैं महिला आरक्षण का विरोध ये अपनी पुरुषवादी मानसिकता को संरक्षित करने के लिए करते हैं.आरक्षण की पैरवी करने वाले महिला आरक्षण को सिरे से नकार देते हैं और संसद में जहर खाने तक की धमकी देते हैं. राष्ट्रवाद,अफजल की फांसी,बांग्लादेशी घुसपैठ पर इनकी चुप्पी सिर्फ यही साबित करती है कि राष्ट्रहित इनके लिए नगण्य है.अब जब राष्ट्रहित की भावना ही नही है तो स्वाभाविक है कि अपने निजी स्वार्थ सर्वोपरि हो जाएंगे तभी तो मांग उठती है जातीय जनगणना की, जिसमें हम जान पाएंगे कितने लोग देश में मैला ढोने वाली जात के हैं और कितने पंडिताई कर रहे हैं.इनसे कुछ हो न हो लेकिन नेताओं का बडा फायदा होगा.नेताओं को चुनावों के दौरान राजनीतिक बिसात बिछाने में आसानी हो जाएगी.फिर चुनाव में खडे होने के इच्छुक उम्मीदवारों के बायोडाटा में जातियों का समीकरण भी मायने रखेगा.खैर दुख तो तब होता है जब राष्ट्रीय पार्टियाँ भी जाति आधारित जनगणना का समर्थन करती है. साम्यवादी समाजवाद को भूल जाते हैं,वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को लात मारते हैं और वहीं भाजपाई पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को दरकिनार करके जाति आधारित जनगणना का समर्थन करते हैं.वहीं कांग्रेस की तो पुरानी नीति रही है कि परिस्थितियों को देखकर रंग बदलना.वो भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को सर्वोपरि रखकर देश के माथे पर जातिवादी कलंक लगाना चाहती हैं.
खैर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो देश में 3000 जातियाँ और 25000 उपजातियाँ हैं और जाति आधारित जनगणना के बाद इन जातियों में बढोतरी स्वाभाविक है.21वीं सदी में जाति विहीन समाज की कल्पना को मूर्त रुप देना तो इस तरह की जाति आधारित जनगणना से मुमकिन नही हैं.हम सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के ख्वाब देख रहे हैं और राजनीतिक प्रपंचों से ही सुरक्षित नही है.हम ममता सौढा को एवरेस्ट पर चढता देखते हैं और वहीं मिर्चपुर में दलितों पर अत्याचार को भी सामने पाते हैं.देश में नक्सली मौत का तांडव खेलते हैं,मंहगाई दम निकाल रही है, फिर भी हम जाति व्यवस्था में समय बर्बाद कर रहे हैं. राजनीतिक खिलवाड़ तो देश की जनता से हो ही रहा है लेकिन ये हमेशा जारी रहेगा ऐसा हम होने नही देंगे. राष्ट्रवाद ही इन सारी यातनाओं से हमें मुक्ति दिला सकती है.जातिगत दुर्भावनाओं से ऊपर उठकर ही देश को प्रगति की ओर ले जाया जा सकता है.

Monday, June 7, 2010

महाभारती अंदाज में झा की राजनीति

प्रकाश झा जब भारतीय राजनीति का रस चखने के लिए पिछले लोकसभा चुनाव में रणक्षेत्र में उतरे तो भारी असफलता के साथ उन्हें बौद्धिक धरातल पर निराशा झेलनी पडी होगी.लेकिन फिल्मी राजनीति में प्रकाश झा ने अपना झंडा फहरा ही दिया.बात कि जा रही है उनकी हाल ही में आई मल्टी स्टारर फिल्म राजनीति की.व्यावहारिक राजनीति में तो प्रकाश झा ने कोई परिवर्तन की मशाल नही जलाई लेकिन रील लाईफ में प्रकाश झा ने राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर अपने महाभारती अंदाज में फिल्मी कौरवों के दांत तो खट्टे कर ही दिए.वैसे भी भारतीय फिल्म जगत में प्रकाश झा अपने सामाजिक सरोकारों वाली फिल्मों से ही जाने जाते हैं.जिस तरह युवाओं ने इस फिल्म को रिस्पांस दिया उससे तो यही लगता है कि अब भारतीय दर्शक का स्वाद भी बदल रहा है.प्रकाश झा की राजनीति दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य की भी याद दिलाती है.दरअसल फिल्म राजनीति के पात्र भी महाभारत के पात्रों की तरह सत्ता के इर्द-गिर्द घुमते नज़र आते हैं.कृष्ण की भूमिका में नाना पाटेकर जिस ज्ञान को रणवीर कपूर को बाँट रहे हैं और युद्ध के धर्म का पाठ पढा रहे हैं वो यही साबित करता है कि अधर्म करने वाला अपना ही क्यों न हो उसका संहार ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए.वैसे द्वापर युग में घटित हुई महाभारत की प्रासंगिकता आज के समय में बढ गई है क्योंकि सत्ता मोह और निजी स्वार्थ में अपनों का ही भरोसा तोडना राजनीति का मूल मंत्र बन चुका है.वैसे प्रकाश झा अपनी फिल्म में राजनीति के अपराधीकरण का कोई हल देते हुए नज़र नही आते.उन्होनें राजनीति के विभिन्न पहलुओं को तो छुआ मगर राजनीति के जिस अपराधीकरण के खात्में की बात प्रकाश झा अपने इंटरव्यू में करते हैं उस अपराधीकरण को खत्म करने का विचार प्रकाश झा ने अपनी फिल्म में कहीं भी दिया हो ऐसा नही लगता.भारतीय राजनीति के प्रति देश के युवाओं का रुखापन इस फिल्म को देखकर और अधिक बढेगा क्योंकि प्रकाश झा की राजनीति का मुख्य रणनीतिकार समर प्रताप सिंह उर्फ रणवीर कपूर राजनीति को नापसंद करके भी इस राजनीति का अर्जुन है और जब समर प्रताप की कवायद रंग लाती है और सत्ता पर उसके एक छत्र राज की स्थिति आती है तो वो सबकुछ छोडकर विदेश रवाना हो जाता है, ये अंर्तद्वद एक कमी को भी प्रदर्शित करता प्रतीत होता है.प्रकाश झा की राजनीति भारतीय युवा की पलायनवादी सोच को तो दर्शा ही देती है.रणवीर कपूर में भारत का युवा खुद को देखता है और वो भी राजनीतिक अवसरवादी बनने तक ही खुद को सीमित रखता है.राजनीति को लताडना तो भारतीय युवा को आता है मगर उसकी कीचड़ को साफ करके वो अपने हाथ गंदे नही करना चाहता.दरअसल यही भारतीय राजनीति की विडंबना है कि हम भारतीय कमियाँ निकालने में माहिर हैं.निर्देशक अपनी फिल्म बनाने से पहले किसी न किसी से प्रेरित तो होता ही है, लेकिन उस प्रेरणा को नया रुप देकर संप्रेषणीय बनाना ही कलाकारी है और इस कलाकारी में झा हिट हैं.लेकिन प्रकाश झा की राजनीति सिर्फ एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घुमती कहानी है। इसमें गठबंधन राजनीति का तो पटाक्षेप झा ने किया मगर अंत तक वो सिर्फ एक ही परिवार की राजनीतिक प्रतिदंद्विता तक ही सीमित रहे। लगता है झा महाभारत के पात्रों और उसकी घटनाओं पर ही केंद्रित रह गए.अगर ये फिल्म की सीमित रणनीति है तो ठीक है लेकिन अगर ये भूल है तो अक्षम्य है। खैर उनकी अगली फिल्म ‘आरक्षण’ भी भारतीय राजनीति और सत्ता लोलुपता के यथार्थ को प्रदर्शित करेगी ऐसी आशा तो रखी ही जा सकती है..