Monday, June 7, 2010
महाभारती अंदाज में झा की राजनीति
प्रकाश झा जब भारतीय राजनीति का रस चखने के लिए पिछले लोकसभा चुनाव में रणक्षेत्र में उतरे तो भारी असफलता के साथ उन्हें बौद्धिक धरातल पर निराशा झेलनी पडी होगी.लेकिन फिल्मी राजनीति में प्रकाश झा ने अपना झंडा फहरा ही दिया.बात कि जा रही है उनकी हाल ही में आई मल्टी स्टारर फिल्म राजनीति की.व्यावहारिक राजनीति में तो प्रकाश झा ने कोई परिवर्तन की मशाल नही जलाई लेकिन रील लाईफ में प्रकाश झा ने राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर अपने महाभारती अंदाज में फिल्मी कौरवों के दांत तो खट्टे कर ही दिए.वैसे भी भारतीय फिल्म जगत में प्रकाश झा अपने सामाजिक सरोकारों वाली फिल्मों से ही जाने जाते हैं.जिस तरह युवाओं ने इस फिल्म को रिस्पांस दिया उससे तो यही लगता है कि अब भारतीय दर्शक का स्वाद भी बदल रहा है.प्रकाश झा की राजनीति दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य की भी याद दिलाती है.दरअसल फिल्म राजनीति के पात्र भी महाभारत के पात्रों की तरह सत्ता के इर्द-गिर्द घुमते नज़र आते हैं.कृष्ण की भूमिका में नाना पाटेकर जिस ज्ञान को रणवीर कपूर को बाँट रहे हैं और युद्ध के धर्म का पाठ पढा रहे हैं वो यही साबित करता है कि अधर्म करने वाला अपना ही क्यों न हो उसका संहार ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए.वैसे द्वापर युग में घटित हुई महाभारत की प्रासंगिकता आज के समय में बढ गई है क्योंकि सत्ता मोह और निजी स्वार्थ में अपनों का ही भरोसा तोडना राजनीति का मूल मंत्र बन चुका है.वैसे प्रकाश झा अपनी फिल्म में राजनीति के अपराधीकरण का कोई हल देते हुए नज़र नही आते.उन्होनें राजनीति के विभिन्न पहलुओं को तो छुआ मगर राजनीति के जिस अपराधीकरण के खात्में की बात प्रकाश झा अपने इंटरव्यू में करते हैं उस अपराधीकरण को खत्म करने का विचार प्रकाश झा ने अपनी फिल्म में कहीं भी दिया हो ऐसा नही लगता.भारतीय राजनीति के प्रति देश के युवाओं का रुखापन इस फिल्म को देखकर और अधिक बढेगा क्योंकि प्रकाश झा की राजनीति का मुख्य रणनीतिकार समर प्रताप सिंह उर्फ रणवीर कपूर राजनीति को नापसंद करके भी इस राजनीति का अर्जुन है और जब समर प्रताप की कवायद रंग लाती है और सत्ता पर उसके एक छत्र राज की स्थिति आती है तो वो सबकुछ छोडकर विदेश रवाना हो जाता है, ये अंर्तद्वद एक कमी को भी प्रदर्शित करता प्रतीत होता है.प्रकाश झा की राजनीति भारतीय युवा की पलायनवादी सोच को तो दर्शा ही देती है.रणवीर कपूर में भारत का युवा खुद को देखता है और वो भी राजनीतिक अवसरवादी बनने तक ही खुद को सीमित रखता है.राजनीति को लताडना तो भारतीय युवा को आता है मगर उसकी कीचड़ को साफ करके वो अपने हाथ गंदे नही करना चाहता.दरअसल यही भारतीय राजनीति की विडंबना है कि हम भारतीय कमियाँ निकालने में माहिर हैं.निर्देशक अपनी फिल्म बनाने से पहले किसी न किसी से प्रेरित तो होता ही है, लेकिन उस प्रेरणा को नया रुप देकर संप्रेषणीय बनाना ही कलाकारी है और इस कलाकारी में झा हिट हैं.लेकिन प्रकाश झा की राजनीति सिर्फ एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घुमती कहानी है। इसमें गठबंधन राजनीति का तो पटाक्षेप झा ने किया मगर अंत तक वो सिर्फ एक ही परिवार की राजनीतिक प्रतिदंद्विता तक ही सीमित रहे। लगता है झा महाभारत के पात्रों और उसकी घटनाओं पर ही केंद्रित रह गए.अगर ये फिल्म की सीमित रणनीति है तो ठीक है लेकिन अगर ये भूल है तो अक्षम्य है। खैर उनकी अगली फिल्म ‘आरक्षण’ भी भारतीय राजनीति और सत्ता लोलुपता के यथार्थ को प्रदर्शित करेगी ऐसी आशा तो रखी ही जा सकती है..
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