
“अबे उस प्रेस वाले के जाके चांटा मार, इतनी देर हो गई साला प्रेस कर रहा है या कोयले की फैक्ट्री से कोयला निकाल रहा है..अबे हाँ यार वहाँ दुल्हा घोड़े पर चढ़ गया यहाँ कपड़े प्रेस होकर नही आए”। इतना कहते ही राहुल फिर से अपने चेहरे पर पाऊडर पोतने में मशगूल हो गया। दरअसल ये सारी कवायद राहुल के जिगरी दोस्त और मेरे हालिया बने दोस्त सुमित की शादी के लिए थी। उसी हड़बडी में राहुल बेचारे प्रेस वाले पर बरस रहा था। ये भी बताना जरूरी है कि एक अनुमान के मुताबिक उस दिन दिल्ली में 15 हजार शादियाँ थी। अंदाजा लगाना मुश्किल नही है कि उस प्रेस वाले का उस दिन क्या हाल होगा। राहुल जैसे न जाने कितने छोकरों की कॉलर की क्रीज़ बैठाने में उसकी कोयले की प्रेस धकाधक लगी होगी। मज़े की बात तो ये है कि राहुल की हड़बड़ाहट ने उसे गालियों का शहंशाह बना दिया था। बेचारा ग्रेजुएट राहुल ये भी भूल गया कि दुल्हा घोड़े पर नही घोड़ी पर बैठकर अपनी दुल्हन को लाता है। खैर राहुल के कपड़े आ गए और उसने उन्हें पहन भी लिया। राहुल बिना पूछे ही सारी बातों का जवाब दे रहा था उससे किसी ने नही पूछा कि नए कपड़े क्यों नही लाया, पर उसने बता दिया कि उसे नए कपड़े खरीदने का टाइम नही मिला। दिलचस्प है..राहुल कोई काम नही करता, ग्रेजुएशन के बाद पिछले एक साल से खाली है फिर भी कहता है टाइम नही मिला। खैर ये भी सच है कि खाली बैठना भी आजकल बिजी होना कहलाता है। बहरहाल आगे बढ़ते हैं। ये तो सुमित की शादी का ट्रैलर था जिसमें राहुल को दिखाया गया है लेकिन “द ग्रेट इंडियन मैरिज ड्रामा” तो अभी बाकी है। राहुल का फोन दनादन बज रहा था..आखिर उसे चाहने वालों की फेहरिस्त भी तो कम नही है ना। मैं बेकार में राहुल के पीछे ऐसे घूम रहा था मानों की मैं उसका शार्गिद हो गया। हाँ घूमना भी मजबूरी था। खैर एक घंटे के फैशन के बाद हम पहुँच गए सुमित की बारात में शामिल बस के पास। बस खचाखच भर चुकी थी। ऑफिस में काम ज्यादा कर लिया था इसलिए सोचा था कि बारात में नही जाऊंगा लेकिन राहुल की जिद ने मजबूर कर दिया। खैर फिर सोचा कि बस में पहले ही सीट पर जाकर बैठ जाऊंगा लेकिन मेरी टाइमिंग ने मुझे खड़ा होने पर मजबूर कर दिया। उस टाइम मन तो ऐसा कर रहा था कि राहुल को गालियाँ सुना दूँ। लेकिन क्या करूँ कमबख्त दोस्ती का ख्याल आ गया। बारात की बस में दिलचस्प ये था कि सीटों पर वही लोग ज्यादा तादात में बैठे थे जो सुमित के गाँव से आए थे। दरअसल गाँव के और शहर के लोगों में फर्क करने में देर नही लगती। शहरी फूहड़ता और ग्रामीण भोलापन(आगे भोलापन मेरी समझ आ गया) दोनों के बीच गहरी खाई होती है। खैर बस चली..बसवाला ताव में आ गया और उसने स्टीरियो के माध्यम से मुन्नी को बदनाम और शीला की जवानी का बखान करना शुरू कर दिया। अगर मेरा अंदाजा सही है तो आधे घंटे के सफर में कम से कम 3 बार उसने मुन्नी को बदनाम किया। उसी आधे घंटे में दो बार तो शीला की जवानी का भी प्रदर्शन हुआ होगा। मन में आया कि गुलिस्तां का बर्बाद करने में तो एक ही उल्लू काफी होता लेकिन यहाँ बस में तो उल्लूओं की पूरी जमात भरी थी..मुझे गुलिस्तां का अंजाम समझने में देर नही लगी। खैर मुन्नी और शीला एक साथ हों और सलमान और अक्षय न आए ऐसा तो हो ही नही सकता। बस में बैठे कई लौंडे खड़े होकर संकरे से पायदान में डाँस करने लगे। उनका डांस तो ऐसा था गोयाकि कई बार डांसर्स को शर्म आ जाए। खैर इस ढीले कैरेक्टर के साथ बारात पहुँच गई अपने गंतव्य स्थल तक। आहें भरते हुए लोग बस से उतरना शुरू ही हुए थे कि एक अजीब सी हंसी ने सबको चौंका दिया। धीरे-धीरे हंसी का शोर बढ़ता गया..पता चला कि जहाँ बस वाले ने बस रोकी थी वहाँ कीचड़ थी और उस कीचड़ में दो ने तो अपनी पेंट खराब करा ही ली। मुझे भी हंसी आ गई। बेचारे ड्राइवर को भी सज़ा के रूप में दो गालियाँ मिली। खैर बस थोड़ी आगे रोक दी गई। सभी उतरे। और तलाशने लगे कोई कोना..हल्के होने के लिए। कोने की तलाश एक नवनिर्मित घर पर खत्म हुई। सुकुं की आह समझने में देर नही लगी। बारातियों ने अच्छी तराई कर दी थी नवनिर्मित घर की....। 30 मिनट इंतजार के बाद बैंड और ढोल दूल्हे की घुड़चढ़ी के साथ तैयार हो गए। अब बारी थी “नागिन डांस” की। बैंड की पों-पो के साथ शुरू हुआ नागिन डांस का दौर। अजीब प्रर्तिस्पर्धा का दौर था वो। प्रर्तिस्पर्धा बैंड और ढोल के बीच, और प्रर्तिस्पर्धा शहरी और ग्रामीण डांस के बीच। लेकिन एक दर्शक के तौर पर कह सकता हूँ कि इस डांस की प्रर्तिस्पर्धा में गाँव वालों ने धुआं उठा दिया। डांस तो खैर वो नही था बल्कि वो था ग्रेट इंडियन नागिन डांस। हवा में कुछ इस तरह से वो पैर हिला रहे थे मानो सीधे हवा को चुनौती दे रहे हों। सिर पर नागिन सरीखा फन बनाकर कुछ ऐसे भाव दे रहे थे मानो डस के पूरी बारात को अचेत कर देंगे। कुछ तो इस तरह का डांस कर रहे थे जैसे बदन पर चीटिंयों का हमला हो गया हो। डाँस का ऐसा कोई स्टेप नही था जो सुमित की बारात में अप्लाई नही हुआ। कुछ नए नवेले डांसर्स ने तो स्टेप मारने भी शुरू कर दिए। भई वाह मज़ा आ गया। शक्ल के भाव कुछ ऐसे मानों दस्त लग गए हों। गौर करने वाली बात ये भी थी कि गाँव वाले ज्यादातर बैंड पर अपने नृत्य का प्रदर्शन कर रहे थे वहीं शहरी लौंडे ढोल की चौकड़ी पर पैरों को हवा में उछाल रहे थे। गाँववालों के डांस ने उनके प्रति मेरे भोलेपन वाली विचारधारा को गहरा धक्का पहुँचाया। बस में शहरी लौंडों के डांस को बदतमीजी भरा कहने वाले सुमित के ग्रामीण रिश्तेदारों ने तो यहाँ रायता ही फैला दिया। औरतों के विरोध के बाद एक बुजुर्ग अंकल ने आकर उनके नागिन डांस को पिटारे में बड़ी मुश्किल से बंद किया। लेकिन वो मान जाएं..ऐसा हो नही सकता..5 मिनट बाद फिर एक-दो करके वो आए और सड़क रूपी मंच पर कूदना शुरू कर दिया। लेकिन अब उन्हें कोई रोकने नही आया। शराबियों की पूरी जमात ने तो ऐसा डांस किया मानो सुमित की शादी की सारी खुशी सिर्फ उन्हीं को हुई। अब वो खुशी थी या पव्वे का नशा, वो तो उन नशेड़ियों से अच्छा कोई नही बता सकता। मेरी आंखो के सूक्ष्म निरीक्षण ने मोहब्बत के मोहपाश में बंध चुकी आंखों को भी देखा। कुछ लौंडे और छोरियों की आंखों को देखकर ऐसा लग रहा था कि वो फैशन के लबादे में सिर्फ एक-दूसरे के लिए ही लिपटकर आए हैं। लेकिन उन्हें ये नही पता होगा कि फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा फिज़ूल है। चलिए कुछ लड़के लाइन क्लियर होने का इंतजार तो कर ही रहे थे। ये तो पता नही कि उनकी शाख पर चिड़िया बैठी या नही लेकिन इतना कहा जा सकता है कि नज़रों की उड़ान लगातार जारी रही। इन सब घटना-दुर्घटनाओं के साथ बारात पहुँची लड़की पक्ष के दरवाजे पर..लेकिन दरवाजे तक दूल्हे के साथ सिर्फ कुछ ही रिश्तेदार पहुँचे। बाकी पहुँचे उस जगह जहाँ लड़की वालों की तरफ से खाने और नाचने के लिए डी.जे. का इंतजाम किया गया था। दूल्हे के स्वागत के दौरान अजीब वाक्या सामने आया..दूल्हे का पियक्कड़ पिता लड़कीवालों की दहलीज से टकराकर धड़ाम से गिर गया। और मजे की बात देखिए कि उसे उठाने के लिए सबसे पहले उसके पियक्कड़ दोस्तों का हाथ बढ़ा। अचानक बेकग्राऊंड आवाज़ निकली “लो हो गया स्वागत, दंडवत प्रणाम भी स्वीकार करें”। पता नही चला कि ये किसके मुखारबिंद के वचन थे, लेकिन थे बड़े सटीक। खैर गिरे हुए बाप को उठाया गया, संभाला गया, उनके सफेद सफारी सूट पर गिरने के बाद रंगोली बन गई थी। मेहनत खराब। चलिए लड़कीपक्ष की तरफ से सजावट के लिए बनी रंगोली बारातियों की तरफ से स्वीकार हुई और उस स्वीकार्यता के अगुआ बने हमारे दूल्हे के पियक्कड़ पिता.। हम भी टेंट की तरफ रवाना हुए। भूख के चूहों ने पेट में कई छेद कर दिए थे। डी.जे.पर देखा तो लौंडों ने धमाचौकड़ी मचा रखी थी। डी.जे. पर शीला-मुन्नी के अलावा कैरेक्टर ढीला करने के पूरे इंतजाम थे। शामियाने में नजर दौडाई तो देखा एक शख्स सबको आर्डर देता फिर रहा था। हो न हो वो लड़की का मजलूम बाप होगा..मजलूम क्यों! वो इसलिए क्योंकि लड़के के पियक्कड़ पिता की लादेन सरीखी हुकुमत के सामने लड़की के पिता तो मनमोहन सिंह ही लग रहे थे। भारतीय समाज भी अजीब है यहाँ बेटी और दहेज देने वाला दब्बू बनकर घूमता है तो लेने वाले की चौड़ाई बढ़ जाती है। जैसे उसने बेटा नही मर्यादा पुरूषोत्तम राम को पैदा कर दिया है। इस सारे ड्रामे के बीच खाना खाने की बारी आई, मुंह में पहला निवाला डाला ही था कि पीछे से आवाज़ आई कि अबे कोल्डड्रिंक है या पानी..मेरा निवाला हाथ से प्लेट की तरफ अग्रसर हुआ...शक्ल देखी तो पाया शराब में टुन्न राहुल होंठों से पानी के गिलास को लगाए बैठा है और उसे उसमें कोल्डड्रिंक नज़र आ रही है। शुक्र है कुछ और नही दिया वरना उसे तो कोल्डड्रिंक समझकर पी जाता। बड़ी मुश्किल से दिलासा दिया राहुल को। खाना खाते हुए कई तो भुख्ड्डों की फौज के सिपहसलार लग रहे थे। एक साहब की प्लेट तो ऐसी घुमी की सारी लाल चटनी राहुल के झक्क सफेद कोट पर औंधी पड़ गई। पता चला कि चटनी गिराने वाले साहब भी टुन्न हैं। चौंकने की बात है कि दो टुन्न मिले तो जूतमपैजार नही हुई..लगे दोनों गले मिलने..अजी साहब रिश्तेदारी निकल आई..पता नही सारे पियक्कड़, रिश्तेदार कैसे हो जाते हैं। डी.जे. पर वही आलम था, लात-घूंसे सब चल चुके थे। अजी एकदूसरे पर नही...हवा में। चलिए खाने का स्वाद ले लिया...धमाचौकड़ी भी खूब हुई..अब वक्त आ चुका था घर जाने का...दरअसल शादियों में यही होता है। खासकर लड़के की शादी में..बारात खाना खाकर रफ्फू चक्कर हो जाती है। बेचारे दूल्हे को परिवार वाले और कुछ दोस्ती का दामन थामें दोस्तों के साथ दुल्हन को घर तक लाना पड़ता है। ये बाराती भी सही हैं..खाना खाते ही दूल्हे को बुरे वक्त में छोड़कर निकल लेते हैं। भला हो सभी दूल्हों का। खैर इस बार भी बस में देर से पहुँचने की सज़ा मिली..सीट तो नही मिली लेकिन सीढ़ियों पर बैठकर जाने का जो सुकूँ था वो शायद गद्देदार सीट पर भी न मिलता क्योंकि सारे बाराती सेट होकर अपनी सीटों पर चुप्पी साधे बैठे थे..बस चली और फिर सिर्फ बस की ही ध्वनि सुनाई दे रही थी क्योंकि बस का हंगामा सो चुका था...ऐसा लग रहा था कि ये तूफान से पहले का सन्नाटा है..क्योंकि सुमित की शादी चरम पर थी।
