Sunday, May 30, 2010

फिर मौका दे

एक दिन मैं अकेला था,
फिर एक दिन दो जान हुआ,
आज फिर वो तन्हाई खाए जाती है
रह-रह कर मुस्कुराते अतीत की याद दिलाती है
सोचा जी लेंगे किसी और की आस में,
सोचा न था तेरी भी आस लगी थी हमसे
सूरज की रोशनी में,
एक उजाला ढूंढना चाहा
रात की तन्हाई में खुद को भुलाना चाहा,
लेकिन,ये हो न सका,

तोडकर किसी की हसरतें
कमब्ख्त दिल रो भी न सका
सोचा इतने कमसब्र नही थे हम
लेकिन तेरी मोहब्बत में,वो भी हो गया,
जो कभी हो न सका
अब मुराद करते हैं,
फरियाद करते हैं,लौट आ,
एक बार फिर जीने का मौका दे,
बिखरी माला को पिरोकर,
एक खूबसुरत तोहफा दे,
वादा रहा तुझसे,
लौट कर फिर न जाऊँगा,
अर्थी पर हुँ एक बार फिर,
तु मिली तो जिंदगी ढूँढ लाऊँगा.

Saturday, May 29, 2010

जम्हूरियत में हैवानी हुकूमत

‘शंभु प्रताप सिहं राठौर’ एक ऐसा नाम जिसे अब हैवानियत का पर्याय माना जाने लगा है.शंभु प्रताप राठौर यानि हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जिनका नाम भारतीय इतिहास में हमेशा के लिए जुड गया है.68 साल की उम्र में 14 साल की बच्ची पर बुरी नज़र डालने वाले इस पुलिस अधिकारी को चंडीगढ़ सेशन कोर्ट से मिली डेढ साल की सजा बेशक कम लगे लेकिन कोर्ट द्वारा दिया गया ये फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक विश्वास तो जगा ही देता है.खैर भारत भूमि पर इस तरह के कैरेक्टर तो पैदा होते ही रहे हैं,वो चाहे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा़ हो या इसी राज्य के मौजुदा सीएम शिबु सोरेन हो.सत्यम के राजू और लालु के चारे घोटाले को भी अभी कोई नही भुला होगा.दरअसल भारतीय व्यवस्था मे इस तरह के मामले पहले नही है बल्कि ऐसा लगातार होता रहा है.भारतीय न्याय व्यवस्था की कमजोरी का फायदा कैसे उठाया जाए उसे ये कानून जानने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं.देश में इस तरह के लोगों का लगातार पैदा होना देश के लिए एक गलत संदेश है.ये तो वो मामले हैं जो जनता कि हिम्मत से सामने आ गए लेकिन कई ऐसे मामले है जो सिर्फ दिल में या कागजों मे सिमट कर रह जाते हैं.सामाजिक बंधन कई चीखों को सिसकियों में बदल देते हैं और एक दिन परिणाम आता है रुचिका गिरहौत्रा सरीखा..खैर यहाँ तो आन्नद प्रकाश है जो रुचिका को इंसाफ दिलाने के लिए जद्दोजहद में लगे हुए हैं लेकिन उन सैकडो रुचिकाओं का क्या होगा जो कोर्ट तो क्या थाने तक भी नही पहुँच पाती.ऐसा इसलिए देखने में आता है क्योंकि कोर्ट की लंबी-लंबी तारीखों को कोई झेलना नही चाहता.देश में जहाँ नवरात्रों के दौरान कन्याओ के पूजन की प्रथा है उसी देश में उन कन्याओं को हवस का शिकार बनते भी देखा जाता है.दुखद विषय है कि एक तरफ तो सरकार के प्रयास इस तरह की समाजविरोधी गतिविधियों को रोक नही पा रहे है दूसरी तरफ जब अपराध हो रहे हैं तो उनकी स्वीकारोक्ती भी नही हो पाती.सिर्फ जाँच का भरोसा दिला कर छोड दिया जाता है.अगर मामला किसी भी तरफ हाईप्रोफाईल हो तो दबाने के भरसक प्रयास भी किए जाते हैं. एक तो बडी अजीब न्याय व्यवस्था है कि तीन तरह की कोर्ट मे मामले के निपटारे के लिए जद्दोजहद की जाती है.अपराध एक और सुनवाई तीन बार.बढिया है..और हम इतराते नही थकते की हम दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र है.क्या करना है ऐसे लोकतंत्र का जिसमें लोक के अधिकारों को कुछ संभ्रात लोगों द्वारा कुचल दिया जाता है.मूलभूत समस्याओं को दबाकर कुछ सुविधाओं का ढिंढोरा पिटना हमारी आदत बन चुकी है.शायद यही कारण है कि समस्याऐं और भी ज्यादा विकराल रुप में हमारे सामने खडी हो रही हैं.इन समस्याओ को अगर नजरअंदाज करने की कोशिश की जाएगी तो स्वाभाविक है कि एक दिन कुठाओं का ज्वार तो फूट ही जाएगा.इसकी गूंज सुनाई देने लगी है..सावधान

Tuesday, May 18, 2010

जाग तू प्रहार कर.

उठ,रग में भर जोश नया,
दुश्मन पर तू प्रहार कर,
माँ फिर तुझे पुकारती,
है दर्द से चिंघाड़ती,
धमनियों में ज्वार दे,
रक्त को संचार दे,
शमशीर को धार दे,
रणक्षेत्र में दहाड़ दे,
कपट का तू संहार कर,
लपट सा तू तेज ला,
आर्य की संतान तू,
आर्यवृत है देश तेरा,
गौरवी इतिहास को,
फिर से तू स्मरण कर,
सूर्य के तेज सा,
छा जा तू चमन पर,
नपुंसकों के बीच में,
मर्दानगी बघार दे,
राष्ट्र के लिए जीएं,
मारें राष्ट्र के लिए,
ये भावना तू मन में धर,
रवि सा तू प्रखर संवर,
वो सुबह फिर से आएगी,
ये भूमि खिलखिलाएगी,
कलियुग का ये प्रमाण है,
शक्ति ही विद्दमान है,
कुटुंब को परे हटा,
ये मातृभु पुकारती,
जो सींचे खून से इसे,
ये उसको ही दुलारती..

Sunday, May 16, 2010

तबीयत से पत्थर तो उछालो.

हम भारतीय भी विचित्र प्राणी हैं हमारी हार को तो हम बर्दाश्त नही कर सकते लेकिन जब हार जाते है और हमारा चिर प्रतिदंद्दी मैदान मे होता है तो हम उसके जीतने की भी दुआ करते हैं. है न अजीब? आखिर हो भी क्यों न, हम है ही विभिन्नता में अपना पन ढूंढने वाले लोग.इसका सबसे बड़ा उदाहरण इन आईपीएल मैचों के दौरान देखने को मिला जब हमारी टीम सेमीफाइनल में भी नही पहुंच पाई लेकिन भारतीयों की रगों में बहने वाले खून को जला देने वाली टीम पाकिस्तान का मुकाबला जब आस्ट्रेलिया से होता है तो हम अपनी उंगलियों को क्रास करके बैठ जाते हैं और हवाला देते है कि हम नही तो हमारे द्वीप की टीम ही सही. इस तरह की भावना किसी छोटी मानसिकता वाले व्यक्ति के दिमाग में आ ही नही सकती. खैर कई बार कुंठाओं से भी भरे होते हैं.जैसे ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला जब इंग्लैंड से होता है तो भारतीय इंग्लैंड की जीत की आस लगाता है.दिलचस्प है भारतीय मानसिकता. ऑस्ट्रेलिया की हार उसके विश्व विजेता की छवि को धूमिल करेगी इसलिए इंग्लैंड को जीतना चाहिए.200 सालों की गुलामी को हम अचानक भुला बैठते हैं.दरअसल हमारी भावनाओं पर हमारा अंकुश नही रहता.अपने विचार को निरंतर बदलना आदत बन चुकी है.दरअसल हमारी मानसिकता कुछ अन्य लोग निर्धारित करते हैं.मीडिया द्वारा वाहवाही पर ढोल पीटे जाते हैं और उसकी मुखालफत पर हम जूतों का हार भी तैयार करते हैं. एक निश्चित और निर्धारित सोच का अभाव हमारे अंदर निरंतर नज़र आता है.बहानेबाजी के आसरे सहूलियतों को पा लेना ही एकमात्र उद्देश्य हो गया है.इस बहानेबाजी और असमान सोच को भली भांति जानते हुए भी जोखिम उठाना समझदारी से समझौता है.खैर विश्वभर को अपनी बादशाहत के तले दबाने वाले अंग्रेजों की एक और जीत पर बेशक खुशी मनाई जाए लेकिन ये खुशी संतुष्टि है न की हर्ष का विषय.संतुष्टि इसलिए क्योंकि ऑस्ट्रलिया की टीम हार गई. टीम वर्क ने इंग्लैंड को पहला वर्ल्ड कप तो दिला दिया लेकिन ये संकेत है सत्ता परिवर्तन का.इसलिए भारतीयों को मजबूत होकर अपनी जीत की इच्छा ही करनी चाहिए.सिर्फ बयानबाज़ी इस इच्छा की पूर्ति नही करेगी.

Saturday, May 15, 2010

ganga behti ho kyon ..bhupen hazarika ভূপেন হাজৰিকা

कौन हो तुम?

हम तो चले थे बडे इतराके,

लेकिन हमें क्या पता था,

इस दुनिया में सभी,अपनी ऐंठ में जीते है,

माँ के कहने पर बचकर तो चले थे इस दलदल से,

मगर इसी में देखा एक खिला कमल,

सोचा पा लिया जाए उसे,

मगर वो निकला,

कबीर की माया ठगनी,

सोचा बदला जाए,

इस दुनिया को,लेकिन आज मैं पूछता हुँ,

कौन हो तुम,क्या नाम है तुम्हारा,

क्या हम पहले मिले हैं कहीं,

अब समझ आ गया,यही दुनिया का सच है.

थोड़ा डिपलोमेटिक हो जाएं.

आज ऐसा लगा जैसे कोई छुट गया,
हाथ का खिलौना,हाथ में ही टुट गया,
चले थे नई इबारत लिखने,
लेकिन दुनिया बडी बेगैरत निकली,
टाँग खिंचकर नीचे गिरा दिया,
हाथ बढाया था कि,
कोई शायद पकडेगा,
पकड़ा तो था मगर काट दिया गया,
हाथ कटते भी दुख नही हुआ,
सोचा कोई सहारा बनेगा,
लेकिन जिसे साथी बनाया,
वही धोखेबाज़ निकला अब समझ आया कि,
साहब थोडा डिपलोमेटिक होते,
तो ज्यादा तरक्की कर पाते,
कटा हाथ लिए नही घुमते,
हाथ बचाने का फन सीख जाते कोशिश करुँगा थोडा,
डिपलोमेटिक हो जाऊँ,
क्योंकि मैं भी बड़ा आदमी बनना चाहता हुँ।
आशा है बन पाऊँ...

बस ही जीती थी....

दिल्ली के सबसे खूबसूरत और साफ सुथरे इलाके दिल्ली छावनी की साफ सुथरी सड़क के बगल से रेलवे लाइन से गुजरती हुई ट्रेन की रफ्तार मेरी बस की रफ्तार से कम प्रतीत हो रही थी.अचानक स्टैंड आया और बस धीमी हो गई.वहीं दूसरी तरफ ट्रेन आगे निकल गई.दरअसल ये आगे पीछे का खेल निरंतर यूँ ही चलता रहता है.अगर अपने सफर मे रुके तो यूहीं पीछे हो जाओगे यही संदेश उस दिन मुझे वो ट्रेन दे गई.लेकिन उस बस की धीमी गति होने के कारणों पर भी नज़र डाली जाए तो इसमें बस की सामाजिक भावना को नज़रअंदाज नही किया जा सकता.दरअसल बस धीमी हुई थी इंतजार में खड़े उन लोगों के लिए जो कई लोगों को निरंतर चलते रहने के लिए प्रेरित करते है.बस धीमी हुई थी उन लोगों के लिए जो समय से अपने गंतव्य तक पहुँचना चाहते हैं.तो मन में विचार आया कि क्या सही में वो बस हार गई थी उस अकडू ट्रेन से.मन में सवाल घुमाया तो पाया कि इस रेस में जीत ट्रेन की नही बल्कि उस बस की हुई है जो धीमी तो हुई मगर समाज को साथ लेने के लिए.ये जीत थी उन स्वार्थी तत्वों पर जो खालिस अकेले की जीत को ही अंतिम विजय मान लेते हैं.थोड़ा रुककर समाज को साथ लेकर चलना अगर हार है तो मैं ऐसी हार को स्वीकारता हुँ.अगर आज के नजरिए से देखा जाए तो ट्रेन हारी नही,लेकिन मेरे नजरिए के सोचा जाए तो बस ही जीती थी..