Saturday, May 29, 2010

जम्हूरियत में हैवानी हुकूमत

‘शंभु प्रताप सिहं राठौर’ एक ऐसा नाम जिसे अब हैवानियत का पर्याय माना जाने लगा है.शंभु प्रताप राठौर यानि हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जिनका नाम भारतीय इतिहास में हमेशा के लिए जुड गया है.68 साल की उम्र में 14 साल की बच्ची पर बुरी नज़र डालने वाले इस पुलिस अधिकारी को चंडीगढ़ सेशन कोर्ट से मिली डेढ साल की सजा बेशक कम लगे लेकिन कोर्ट द्वारा दिया गया ये फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक विश्वास तो जगा ही देता है.खैर भारत भूमि पर इस तरह के कैरेक्टर तो पैदा होते ही रहे हैं,वो चाहे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा़ हो या इसी राज्य के मौजुदा सीएम शिबु सोरेन हो.सत्यम के राजू और लालु के चारे घोटाले को भी अभी कोई नही भुला होगा.दरअसल भारतीय व्यवस्था मे इस तरह के मामले पहले नही है बल्कि ऐसा लगातार होता रहा है.भारतीय न्याय व्यवस्था की कमजोरी का फायदा कैसे उठाया जाए उसे ये कानून जानने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं.देश में इस तरह के लोगों का लगातार पैदा होना देश के लिए एक गलत संदेश है.ये तो वो मामले हैं जो जनता कि हिम्मत से सामने आ गए लेकिन कई ऐसे मामले है जो सिर्फ दिल में या कागजों मे सिमट कर रह जाते हैं.सामाजिक बंधन कई चीखों को सिसकियों में बदल देते हैं और एक दिन परिणाम आता है रुचिका गिरहौत्रा सरीखा..खैर यहाँ तो आन्नद प्रकाश है जो रुचिका को इंसाफ दिलाने के लिए जद्दोजहद में लगे हुए हैं लेकिन उन सैकडो रुचिकाओं का क्या होगा जो कोर्ट तो क्या थाने तक भी नही पहुँच पाती.ऐसा इसलिए देखने में आता है क्योंकि कोर्ट की लंबी-लंबी तारीखों को कोई झेलना नही चाहता.देश में जहाँ नवरात्रों के दौरान कन्याओ के पूजन की प्रथा है उसी देश में उन कन्याओं को हवस का शिकार बनते भी देखा जाता है.दुखद विषय है कि एक तरफ तो सरकार के प्रयास इस तरह की समाजविरोधी गतिविधियों को रोक नही पा रहे है दूसरी तरफ जब अपराध हो रहे हैं तो उनकी स्वीकारोक्ती भी नही हो पाती.सिर्फ जाँच का भरोसा दिला कर छोड दिया जाता है.अगर मामला किसी भी तरफ हाईप्रोफाईल हो तो दबाने के भरसक प्रयास भी किए जाते हैं. एक तो बडी अजीब न्याय व्यवस्था है कि तीन तरह की कोर्ट मे मामले के निपटारे के लिए जद्दोजहद की जाती है.अपराध एक और सुनवाई तीन बार.बढिया है..और हम इतराते नही थकते की हम दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र है.क्या करना है ऐसे लोकतंत्र का जिसमें लोक के अधिकारों को कुछ संभ्रात लोगों द्वारा कुचल दिया जाता है.मूलभूत समस्याओं को दबाकर कुछ सुविधाओं का ढिंढोरा पिटना हमारी आदत बन चुकी है.शायद यही कारण है कि समस्याऐं और भी ज्यादा विकराल रुप में हमारे सामने खडी हो रही हैं.इन समस्याओ को अगर नजरअंदाज करने की कोशिश की जाएगी तो स्वाभाविक है कि एक दिन कुठाओं का ज्वार तो फूट ही जाएगा.इसकी गूंज सुनाई देने लगी है..सावधान

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