Saturday, May 15, 2010

बस ही जीती थी....

दिल्ली के सबसे खूबसूरत और साफ सुथरे इलाके दिल्ली छावनी की साफ सुथरी सड़क के बगल से रेलवे लाइन से गुजरती हुई ट्रेन की रफ्तार मेरी बस की रफ्तार से कम प्रतीत हो रही थी.अचानक स्टैंड आया और बस धीमी हो गई.वहीं दूसरी तरफ ट्रेन आगे निकल गई.दरअसल ये आगे पीछे का खेल निरंतर यूँ ही चलता रहता है.अगर अपने सफर मे रुके तो यूहीं पीछे हो जाओगे यही संदेश उस दिन मुझे वो ट्रेन दे गई.लेकिन उस बस की धीमी गति होने के कारणों पर भी नज़र डाली जाए तो इसमें बस की सामाजिक भावना को नज़रअंदाज नही किया जा सकता.दरअसल बस धीमी हुई थी इंतजार में खड़े उन लोगों के लिए जो कई लोगों को निरंतर चलते रहने के लिए प्रेरित करते है.बस धीमी हुई थी उन लोगों के लिए जो समय से अपने गंतव्य तक पहुँचना चाहते हैं.तो मन में विचार आया कि क्या सही में वो बस हार गई थी उस अकडू ट्रेन से.मन में सवाल घुमाया तो पाया कि इस रेस में जीत ट्रेन की नही बल्कि उस बस की हुई है जो धीमी तो हुई मगर समाज को साथ लेने के लिए.ये जीत थी उन स्वार्थी तत्वों पर जो खालिस अकेले की जीत को ही अंतिम विजय मान लेते हैं.थोड़ा रुककर समाज को साथ लेकर चलना अगर हार है तो मैं ऐसी हार को स्वीकारता हुँ.अगर आज के नजरिए से देखा जाए तो ट्रेन हारी नही,लेकिन मेरे नजरिए के सोचा जाए तो बस ही जीती थी..

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