हम तो चले थे बडे इतराके,
लेकिन हमें क्या पता था,
इस दुनिया में सभी,अपनी ऐंठ में जीते है,
माँ के कहने पर बचकर तो चले थे इस दलदल से,
मगर इसी में देखा एक खिला कमल,
सोचा पा लिया जाए उसे,
मगर वो निकला,
कबीर की माया ठगनी,
सोचा बदला जाए,
इस दुनिया को,लेकिन आज मैं पूछता हुँ,
कौन हो तुम,क्या नाम है तुम्हारा,
क्या हम पहले मिले हैं कहीं,
अब समझ आ गया,यही दुनिया का सच है.
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