Tuesday, April 24, 2012

ये पप्पू कब पास होगा?


     15 अप्रैल की सुबह दिल्ली के मिज़ाज में बदलाव की सुबह थी, ये सुबह दरअसल 5 सालों बाद आई। 15 दिनों तक गलियों में भोंपूओं का शोर, प्रचार की चिल्लपौं, पैसा कमाने की कवायद में लगे अस्थाई रोजगारी लोगों की धमाचौकड़ी कम हो चुकी थी, भला हो चुनाव आयोग का..अरे माफ कीजिएगा, अपने शब्द वापस लेता हूँ। दिल्ली में नगर निगम के चुनाव और 2423 उम्मीदवारों की किस्मत 15 अप्रैल को बंद होने वाली थी मशीनों में। लोग पप्पू न बने और दबंगई से अपने मताधिकार का प्रयोग करें इसके लिए लाखों रूपये खर्च किए गए चुनाव आयोग ने लोगों की जागरूकता पर। बड़े-बड़े होर्डिंग्स, पोस्टर, टीवी प्रचार, अखबारों में विज्ञापन और न जाने कितनी ही जागरूक संस्थाओं ने वोटिंग के प्रति जागरूकता संबंधी अभियान चलाया। लेकिन वोटिंग हुई 55 प्रतिशत के करीब। ये है चुनाव आयोग की पहली हार। करीब 45 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग नही किया, यानि परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नही आया। दूसरी हार तब हुई जब मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। कहते हैं शिक्षा सभी अज्ञानताओं को परास्त करने का बूता रखती है। लेकिन अहम हो जाता है कि चुनाव आयोग के द्वारा जिस तरह से चुनावी शिक्षा का प्रचार किया जाना था वो नही हो पाया। मैं ये बात सिर्फ हवा में ही नही कह रहा बल्कि मैं स्वयं इसका भुक्तभोगी बना, जब मुझे चुनाव अधिकारियों की अज्ञानता का शिकार होना पड़ा और मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। अखबार के माध्यम से भी मैनें चुनाव अधिकारियों को शिक्षित करने का प्रयास किया मगर चुनाव अधिकारी हैं कि अपनी अज्ञानता का बखान गौरवपूर्ण ढंग से किए जा रहे थे।
       लोकतंत्र में हमें अधिकार है कि हम अपनी मर्जी से अपने नुमाइंदों को चुने और संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया इसका पुरजोर समर्थन करती है कि हम सोच कर, समझकर ही अपने मताधिकार का प्रयोग करें। अंधों में काना राजा वाली कहावत लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कम से कम कागज़ी तौर पर तो चरितार्थ नही होती। कागज़ी तौर पर इसलिए प्रयोग किया क्योंकि कई लोग कहेंगे कि कागज़ों में लोकतंत्र अलग होता है और लोकतंत्र की जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है। खैर छोड़िए विषयांतर नही करूंगा। लोकतंत्र में हालांकि ये अधिकार नही है कि हम उम्मीदवार को सिरे से नकार सकें और वोटिंग मशीन में कोई उम्मीदवार पसंद नही का बटन दबाकर चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बने। लेकिन दिल्ली चुनाव आयोग ने इस बार बंदोबस्त किया था कि जो भी मतदाता किसी भी उम्मीदवार को पसंद नही करता वो रजिस्टर 11A में अपनी नापसंदगी दर्ज कर सकता है। समाचार चैनलों पर पत्रकार चुनाव आयोग की जमकर बखिया उधेड़ रहे थे। दरअसल रजिस्टर 11A के बारे में जो जागरूकता अभियान चलाया जाना था वो अभियान ठीक ढंग से नही चलाया गया, जिसकी वजह से कई लोग या तो इस नए प्रावधान के तहत अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाए या अंधो में काने राजा को चुने चले गए। अपने वार्ड-39 के 17 उम्मीदवारों का तुलनात्मक अध्ययन करके मैंने निर्णय लिया मैं भी राईट टू रिफ्यूजका प्रयोग करूंगा। बढ़ चला मतदान केंद्र की तरफ कुछ लोगों को जाते जाते इस अधिकार के प्रति जागरूक भी किया। मतदान केंद्र पहुँचने पर पता चला कि पीठासीन अधिकारी को इस नए प्रावधान के बारे में जानकारी ही नही हैं। मैं इस अज्ञानता को लोकतंत्र के दुर्भाग्य के तौर पर देखता हूँ। खैर बुलाया गया सेक्टर ऑफिसर को, दिलचस्प है कि उन्हें भी इस बारे में जानकारी नही थी। मैनें कहा आप अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पूछ लीजिए मगर बडा बेआबरू करके उन्होंने मुझे वहाँ से चले जाने को कहा। खैर मैं वहाँ से चला गया, और अपने साथ नवभारत टाइम्स की एक प्रति ले आया जहाँ रजिस्टर 11A की पूरी जानकारी दी गई थी। मैनें वो प्रति पीठासीन अधिकारी को दिखाई तो उन्होंने फिर सेक्टर ऑफिसर को फोन करके बुलाया। मुझे आश्वासन मिला कि मैं इंतजार करूं, सेक्टर ऑफिसर 10 मिनट में आ रही हैं। वो 10 मिनट अब 35 मिनट में बदल चुके थे, अगले 2 मिनट बाद सेक्टर ऑफिसर पहुँची और मुझे देखकर भागना शुरू कर दिया। टीवी पत्रकारों ने उनको भागते हुए अपने कैमरे में कैद भी किया और दाग दिए सवाल। लेकिन नही मिला सवालों का जवाब (विडियो देखने के लिए यूट्यूब पर https://www.youtube.com/watch?v=KBAop6hxUcw या “Right To Refuse..I couldn't Vote”)। सेक्टर ऑफिसर ने कहा कि उन्हें ट्रेनिंग के दौरान इस प्रावधान के बारे में जानकारी ही नही दी गई। सवाल ये है कि चुनाव आयोग ट्रेनिंग में जानकारी देने का सच बोल रहा था या ये सेक्टर अधिकारी जानकारी न देने का झूठ बोल रही थी? खैर नतीजा ये निकला कि मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। अशिक्षित और अज्ञानी में फर्क होता है, लेकिन यहाँ मौजूद चुनाव अधिकारी चुनावी प्रावधानों के प्रति अशिक्षित तो थे ही इसके साथ साथ वो अज्ञानी भी थे क्योंकि उन्हें ये भी मालूम नही था कि रजिस्टर 11A होता क्या है। ये वही रजिस्टर होता है जिसमें मतदान से पहले मतदाताओं के हस्ताक्षर लिए जाते हैं। चुनाव अधिकारियों ने अपनी अज्ञानता में चुनाव आयोग को ही पप्पू साबित कर दिया। अब सवाल ये है कि ये पप्पू कब पास होगा? और इसके साथ एक राय कि पहले खुद दबंग बनो तभी दबंगई का बखान करना अच्छा लगता है।

Wednesday, April 18, 2012

कॉफी हाऊस कॉलिंग


शाह आलम भाई के अनुभवों का फायदा मुझे पिछले करीब 10 महीने से मिल रहा है। वो मेरे सहकर्मी और सहयोगी भी हैं। आज जब कनॉट प्लेस में बिना किसी काम के पहुँचा तो मन हुआ कि कॉफी हाऊस चला जाए। सबसे पहले जहन में शाह आलम भाई की तस्वीर उभर आई, जेब से फौरन मोबाइल निकाला और मिला दिया उनका नंबर। हाल चाल लेने के बाद कॉफी हाऊस का पता चल पाया। हालांकि कॉफी हाऊस की जानकारी मुझे पहले भी थी लेकिन शाह भाई ने मुझे बताया था कि अब इंडियन कॉफी हाऊस जोकि 1957 के बाद से ही अस्तित्व में आ चुका था अब उसके साथ बुजुर्ग शब्द जुड़ गया है।

खैर मैने शाह भाई से जानना चाहा कि युवाओं का कॉफी हाऊस कहाँ है तो वो भी ठीक से बता नही पाए। खैर सोचा अभी बुजुर्गों के कॉफी हाऊस में ही चल लेते हैं, सो पहुँच गए। कॉफी हाऊस में कदम रखते ही दिल का एक और अरमान पूरा हो चला था। मोहन सिंह प्लेस का ये कॉफी हाऊस कई पन्नों पर खुद को दर्ज करा चुका है। कॉफी हाऊस में इक्का दुक्का बूढे अंग्रेजी अखबार पढ रहे थे। एक युवा जोड़ा कुछ गुफ्तगु करने में मशरूफ था। दो ऑफिशियल लोग ख्वाबों की ऊंची मीनारों के आसरे अपने-अपने उज्जवल भविष्य की इमारत को खड़ा करने की कवायद में जुटे हुए थे। एक भ्रांति तो दूर हो गई कि कॉफी हाऊस पर सिर्फ बुजुर्गों का ही कब्जा नही है उस पर युवाओं का भी बराबर का हक है।

कई सोफे फट चुके हैं। पंखे भी चलने के दौरान बेकग्राऊंड स्कोर देते रहते हैं। लेकिन फिर भी एक शांति है जिसकी तलाश में मेरे जैसे कई खिंचे चले आते हैं। बैठ गया, मेन्यू पर नज़र डाली तो दिल खुश हो गया मतलब की जगह और मतलबी रेटों को देखकर लगा चलो एक नया अड्डा ढूंढने में कामयाबी मिली। आर्डर दिया कोल्ड क्रीम कॉफी का और अखबार के आसरे देश और दुनिया के हालातों से रूबरू होने की कवायद की शुरूआत कर दी। तीन लोग आकर मेरे बगल वाले सोफे पर बैठ गए। मैं अखबार में मशरूफ था अचानक तेज स्वर सुनाई दिया “वामपंथ अब एक विचार नही रहा बल्कि राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का साधन रह गया है” वामपंथी मित्र को बुरा लगा तो उसने भी कांग्रेस और दक्षिणपंथियों की बखिया उधेड़नी शुरू कर दी। सिलसिला चल चुका था कभी हंसी तो कभी रोष। लेकिन फिर भी चर्चा संतुलित और स्वस्थ। तीन विचारधाराओं का संगम होता देखा कॉफी हाऊस में। जामिया के फाऊंटेन लॉन, दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी और जे.एन.यू के गंगा ढाबा पर अक्सर बहस का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला मगर उस बहस का अंतिम परिणाम विवादित विषयों का निपटारा न होकर एक नए विवाद को मन में घर कर देना भर रह जाता था लेकिन कॉफी हाऊस की उस बहस में निपटारा भी था, विवाद भी था, समस्याओं का समाधान और हंसी का पिटारा भी था।

कॉफी के कप में कई विचारों को ढूंढ-ढूंढकर निकालने वाले भी देखने के मिल जाते हैं यहाँ। काफी खुला हुआ है यहाँ का एरिया लेकिन भीड़ नजर नही आती, कई कॉफी के अड्डे खुल गए हैं ना ! अब लोग कॉफी की तुलना हॉट सन्नी लियोन से करते हैं और कॉफी हाऊस का मिज़ाज बताता है कि सन्नी लियोन पर सिर्फ चर्चा तो यहाँ हो सकती है लेकिन फूहड़ता का फ्लेवर यहाँ की कॉफी में नही मिल सकता। शायद इसलिए भीड़ कम ही नज़र आती है! शहर की तेज़-तर्रार और सिर झन्न कर देने वाली जिंदगी में सूकूं के दो पल बिताना बहुत जरूरी है। विचारों के जन्म के लिए जिस आत्मिक और बौद्धिक शांति की आवश्यकता होती है उसकी प्राप्ति मेरे लिहाज से यहाँ हो सकती है। बाथरूम की भयानक बदबू हालांकि इस मामले में अपवाद हो सकती है लेकिन कौन सा हमें बाथरूम में बैठकर कॉफी पीनी है। लेकिन सफाई हो जाए तो बेहतर ही होता है। क्योंकि कई बार शौचालय में भी सोच का सृजन होता है।

मंडी हाऊस, कटवारिया सराय, नार्थ कैंपस, जामिया का फाऊंटेन पार्क, जे.एन.यू. का ढाबा, मुखर्जी नगर, क्रिश्चियन कॉलोनी और न जाने ऐसी ही कितनी जगहें, रचनात्मक लोगों के सोचने विचारने और टाइम पास करने के अड्डे में शुमार हैं। उसी तरह मोहन सिंह प्लेस का ये कॉफी हाऊस अपने आप में परिपूर्ण है एक सामाजिक सोच विकसित करने के लिए जहाँ टेबल पर आपके सामने पानी और कॉफी एक आर्डर पर आ जाते है। और क्या चाहिए, सरकार के दावों की हवा निकालते शिगुफे, और कभी-कभी तो किस्सों कहानियों के कथानक और मेरे जैसे कुछ लिखने वालों के लिए लिखने का बहाना ये कॉफी हाऊस गाहे-बगाहे बन ही जाता है। 2 घंटे कॉफी हाऊस में बैठना मेरे लिए एक अविस्मरणीय अनुभव रहा जिसको शब्दों में बयाँ करना जरा मुश्किल है लेकिन मुझे भरोसा है कॉफी हाऊस की इस पहली कॉफी की महक, वेटर का वो सादा लिवाज़ सिर पर ताज़ की तरह सजती नेहरू टोपी, और सबसे अहम विचारधाराओं के संगम की ये अवधारणा मेरे ज़हन में रचनात्मक रूप में सदैव व्याप्त रहेगी।

Wednesday, April 11, 2012

आंखों का क्या है, वो तो धोखा भी दे सकती है लेकिन उन आंखो के पीछे एक नजर भी तो होती है, तो क्या वो भी झूठ बोल रही है..दिल में बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं...क्या करूं मोहब्बत है न तुमसे..इसलिए बता भी नही सकता और जता भी नही सकता। बात करना चाहूँ तो तुम्हारी मसरूफियत आड़े आ जाती है...कमबख्त अंधेरे से भरी रात भी तो साथ नही देती, कुछ कहना चाहता हूँ तो तुम्हारा फोन बंद मिलता है। हाँ रात में एक फायदा तो है और वो ये कि जिस चांद को मैं निहार रहा होता हू उस चाँद को तुम भी निहार सकती हो..बस ये ही तालुक्कात रह जाते हैं तुम्हारे और हमारे बीच रात ढलते-ढलते।

Friday, April 6, 2012

वसंत की हत्या


पगडंडियों पर ग्रील लग गई है,

हरा पेंट भी हो गया है

विकास नज़र आता है, चलिए अच्छा है।

सुना है पगडंडियों के बनने से पहले

पेड़ थे यहाँ, कई पौधों के आसरे,

राहगीर रास्ता तय करते थे,

कंक्रीट की सड़कों ने,

रास्ता तो पक्का कर दिया,

लेकिन छिन गया,

कई परिंदों का घर,

हरे पत्तों की सौंधी खुशबू

शहर हैं बाबू,

वसंत की रोज़ हत्या होती है यहाँ!