आंखों का क्या है, वो तो धोखा भी दे सकती है लेकिन उन आंखो के पीछे एक नजर भी तो होती है, तो क्या वो भी झूठ बोल रही है..दिल में बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं...क्या करूं मोहब्बत है न तुमसे..इसलिए बता भी नही सकता और जता भी नही सकता। बात करना चाहूँ तो तुम्हारी मसरूफियत आड़े आ जाती है...कमबख्त अंधेरे से भरी रात भी तो साथ नही देती, कुछ कहना चाहता हूँ तो तुम्हारा फोन बंद मिलता है। हाँ रात में एक फायदा तो है और वो ये कि जिस चांद को मैं निहार रहा होता हूँ उस चाँद को तुम भी निहार सकती हो..बस ये ही तालुक्कात रह जाते हैं तुम्हारे और हमारे बीच रात ढलते-ढलते।
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