Thursday, December 30, 2010

सरकारी विद्रोह सरकार के खिलाफ


गढचिरौली के एडीएम ने जिस तरह से गृहमंत्री के दौरे पर सवाल उठाए है उससे ये साबित हो गया है कि कहीं न कहीं लोगों में सरकार के प्रति गहरी नाराजगी है उसके साथ उनमें अपनी ही सरकार के प्रति एक विरोध भी है। एडीएम राजेन्द्र कनफडे ने जिस तरह से देश के नेताओं की फिजूलखर्ची और उनके सरकारी ठंडे कमरों के निर्णयों पर सवाल उठाए हैं उसे किसी भी रुप में नजरअंदाज नही किया जा सकता। गढचिरौली महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक है जहाँ नक्सलियों का राष्ट्रविरोधी तांडव गाहे बगाहे देखने को मिल ही जाता है। ये सर्वविदित है कि सरकारी नुमाइंदों के द्वारा लगातार कागजी सर्वहितकारी निर्णयों से कुछ समय के लिए तो लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाई जा सकती है लेकिन उन्हें अधिक समय तक खुश नही किया जा सकता।दरअसल जब ये सरकारी निर्णय कागजों से निकलकर जमीन हकीकत को नही छू पाते तो लोगों में रोष बढता है शायद देश में नक्सल समस्या का कारण भी यही हुआ होगा। सामाजिक समानता और शहरों की तरफ लौटो के फौरी नारे के चक्कर में देश की आत्मा कहे जाने वाले गाँवों औऱ उनमें रहने वाले किसान और मजदूर वर्ग को देश की आम आदमी वाली सरकार भुलाती जा रही है।देश के गृहमंत्री का हैलिकॉप्टर गढचिरौली की धरती पर उतरता तो है लेकिन चिदंबरम वहाँ लोगों से मिलने की बजाए उनका हाल जानने की बजाए सरकारी अधिकारियों के साथ बैठकें करके और सीआरपीएफ के कैंप का दौरा करके लौट जाते हैं। सवाल ये उठता है कि जब इसी तरह की बैठकें ही करनी थी तो दौरे का ये दिखावा क्यों? चिदंबरम साहब ने तो अपने स्थानीय कांग्रेसी नेताओं से भी मिलने की जहमत नही उठाई।

पिछले 13 साल में 2 लाख से ज्यादा किसान मौत के आगोश में समा चुके हैं।हजारों करोड के राहत पैकेज के बाद भी किसान खेती के विकल्प के बजाए मिट्टी में मिल जाने के निर्णय को पहले स्वीकार करता है। चिंदबरम ने जिस गढचिरौली का दौरा किया है वो महाराष्ट्र में पडता है औऱ ये वही महाराष्ट्र है जहाँ दो साल पहले देश के प्रधानमंत्री किसानों के विकास के लिए हजारों करोड रुपये का अनुदान देकर गए थे। लेकिन वो अनुदान सिर्फ कागजों मे ही बंटता नजर आया। महाराष्ट्र से आने वाले देश के कृषि कम क्रिकेट मंत्री मंहगे खिलाडियों के लंच औऱ डीनर में तो आसानी से नजर आ जाते हैं लेकिन विदर्भ में किसान की मौत पर उसके भूखे मरते बच्चों पर वो एक नजर डालने की जहमत भी नही उठाते।जमीन पर उतरकर उसकी हकीकत को जानना और सरकारी अधिकारियों की फाईलों के आधार पर निर्णय लेने में फर्क होता है। गढचिरौली में गृहमंत्री का दौरा भी निश्चित तौर पर नक्सलियों के लिए संजीवनी साबित होगा क्योंकि अब नक्सलियों को लोगों को ये समझाने में आसानी होगी कि उनके मंत्री उनके होकर भी उनके हित में नही सोच सकते। मंत्री जी सैनिकों से मिलकर चले गए लेकिन उन सैनिकों की गोली के शिकार होने वाले परिवारों का क्या? उनकी तो सुध लेने वाला भी कोई नही है न ही नक्सली औऱ न ही उनकी लोकतांत्रिक सरकार। इन परिवारों को नक्सली इनकी ही तरह लगते हैं शायद यही कारण है कि हमें कई बार गावों में लोगों के कांधों पर बंदूके लटकी नजर आ जाती है। गढचिरौली के एडीएम पर नक्सली समर्थक होने के आरोप भी लगते रहे हैं लेकिन जिस तरह उन्होंने एक मंत्री के दौरे को आधार बनाकर सरकारी नितियों पर कटाक्ष किया है वो वाक्ये में चर्चा का विषय बन गया है।एडीएम के सवाल मौका है सरकार के लिए आत्मचिंतन का। लेकिन आत्मचिंतन तो वो करता है जिनमें आत्मा होती है इनकी तो आत्मा भी मर चुकी है। इन्हें सिर्फ पैसा बनाने का मौका चाहिए वो चाहे कामनवेल्थ गेम्स के माध्यम से मिल जाए या 2 जी स्पेक्ट्रम के घोटाले से। जनता लगातार परेशान है,मंहगाई,भ्रष्टाचार,सामाजिक असमानता,बेरोजगारी,महिलाओं पर ज्यादत्ती इन सभी परेशानियों से आदमी तिल तिल कर मर रहा है। सरकार इनके उन्मूलन के लिए नितियाँ भी बनाती है लेकिन उनका कार्यान्वयन ठीक से हो रहा है या नही उसका ध्यान रखना भी सरकार का ही काम है। दुर्भाग्य से सरकार उसी पर ध्यान नही दे रही है इसी कारण देश में कलमाडी और राजा जैसे लोग पैदा हो रहे हैं। देश में करीब 24 करोड परिवार हैं जिनमें 11 करोड के लगभग एपीएल,4 करोड के लगभग बीपीएल, ढाई करोड के आसपास अंत्योदय कार्ड धारक हैं। बाकि बचे परिवारों का कोई आंकडा नही है। क्या सरकार ने कभी राशन की दुकानों पर जाकर देखा कि वहाँ कितने परिवारों को राशन का वितरण इसी श्रेणी से हो रहा जिसका आंकडा सरकार दे रही है। शायद सरकार देखना ही नही चाहती क्योंकि भ्रष्टाचार का हिस्सा हर स्तर पर बंटा हुआ है।

राजनीतिक मजबूरियाँ भी अजीब चीज होती है किसी नेता या मंत्री के हाथ बांध देती है। शायद यही कारण है कि देश के प्रधानमंत्री को भी जाँच के दायरे में आना पड रहा है। लेकिन ये पारदर्शिता नही है औऱ ये कोई बहादुरी का काम भी नही है। उस देश के भविष्य का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नही है जिसमें प्रधानमंत्री पर ही भ्रष्टाचार के पोषण के आरोप लग रहे हों। एडीएम राजेंद्र कनफडे की नसीहत ने एक नई चर्चा को जन्म दिया है। उस चर्चा को ठंडा न होने देना ही सरकार की नाक में नकेल साबित होगा। ऐसा भी मुमकिन है कि बहुत जल्द हमें ये समाचार सुनने को मिले कि नक्सलियों से सांठगाँठ के आरोप में एडीएम राजेंद्र कनफडे को उनके पद से हटा दिया गया है।

Tuesday, December 14, 2010

अनुपमा की हत्या,हर घर में अनुपमा


मोहब्बत का अंजाम ये हुआ कि जंगल में प्रेमिका से पत्नी बनी अनुपमा की लाश के टुकड़े मिले। मोहब्बत का ये अंजाम शायद अनुपमा ने सोचा न होगा। अनुपमा ने मोहब्बत तो की मगर उसने इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नही दिया कि आखिर वो मोहब्बत किससे कर रही है।बात देहरादून में हुई अनुपमा की हत्या की हो रही है जिसमें हत्यारा कोई और नही बल्कि अनुपमा का पत्ति ही निकला। पत्नी के हत्यारे पत्ति तो हमारे देश में कई मिल जाएंगे लेकिन राजेश गुलाटी नाम के इस शख्स ने मोहब्बत करने वालों के लिए एक मिसाल कायम कर दी। राजेश गुलाटी ने जिस तरह से अपनी पत्नी की हत्या की है वो वाक्ये में ही वीभत्स है। ये घटना ये सोचने पर भी मजबूर करती है आखिर पत्नी की लाश के साथ कोई व्यक्ति दो महीने कैसे बिता सकता है। इस घटना ने पूरे देश में हाहाकार मचा दिया है। मीडिया वाले भी बेचारे लगे हुए थे गैंगरेप की खबरों में, उन्हें भी खिलवाड़ करने के लिए विषय मिल गया। वैसे राजेश ने इसी मामले में कुछ अच्छा किया कि मीडिया को कुछ दिन खेलने के लिए खबर दे दी। मीडिया में बार बार दिखाई जाने वाली खबर ने आधुनिक प्रेमी युगलों के मन मे एक दूसरे के लिए शंका पैदा कर दी है। अब प्रेमिका प्रेमी के शादी के प्रस्ताव के बाद कहती है कि कहीं अनुपमा की तरह मुझे भी तो मार नही दोगे!प्रेमिका प्रेमी से पूछती है कि जानू ये बताओ कि अगर हम झगड़ा करेगें तो तुम मुझे मनाओगे या काटकर फैंक दोगे।प्रेमिका का ये इमोशनल अत्याचार काफी हास्यास्पद लगता है औऱ उसके साथ गंभीर भी लगता है कि आखिर प्रेमिका को ये पूछने की जरुपत पड़ क्यों रही है? राजेश जैसे लवर कन्वर्टेड पत्ति का ये चेहरा भी हो सकती है अनुपमा ने ये सोचा भी नही होगा। एक फिल्म देखकर राजेश ने अनुपमा की फिल्मी स्टाईल में हत्या कर दी। बड़े इत्मीनान राजेश ने पत्नी के टुकड़े जंगल तक पहुँचाए वाया फ्रीज। दरअसल ये सीधे तौर पर ये इंगित करता है कि लोगों में भावनाएं लगभग मर चुकी है औऱ उन्हें खत्म करने में भौतिकवादी चीजों ने बड़ी भूमिका निभाई है।इस खबर को देखकर ये भी मालूम होता है कि संभ्रात जिंदगी जी तो जा सकती है लेकिन आपके मरने के बाद आपके पड़ोसी को भी ये खबर नही लगेगी कि पड़ोस में रहने वाले अनुपमा जैसों की मौत हो चुकी है।अब लोगों के अंदर भावनाएं मर चुकी है उनके पड़ोस की एक महिला कई दिनों से घर में दिखाई नही देती लेकिन लोगों को कोई मतलब नही है। खैर टीवी चैनलों में तरह तरह के ग्राफिक्स औऱ क्रोमास् के साथ दिखाई जाने वाली देश की इस भयानक कहानी को दिखाकर लोगों को सोचने पर तो मजबूर कर ही दिया है। राजेश ने अपने इकबालिया बयान में एक बात कही कि अक्सर उसका पत्नी से झगडा होता रहता था। शायद यही झगड़ा अनुपमा की मौत का कारण भी बना। अनुपमा ने थाने में एक रिपोर्ट लिखवाकर ही इतिश्री मान ली मगर उसने उस घरेलू हिंसा के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाया हो ऐसा नही नजर नही आता।शायद अनुपमा कोई बडा कदम उठाती तो आज वो अपने पत्ति की हैवानियत का बखान करने में के लिए हमारे सामने खड़ी होती। ये मामला घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं को आवाज उठाने के लिए भी प्रेरित करेगा। दशहरे को रावण वध की जगह राजेश मे मन में एक हैवान ने जन्म लिया।उसी हैवान ने राजेश को ये हरकत करने के लिए प्रेरित किया। अब राजेश खुद को बचाने के लिए और जनता की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ये कहता फिर रहा है कि उसने अनुपमा की हत्या बच्चों कि लिए की।उसका ये बयान गले से नही उतरता अब उन्ही बच्चों ने राजेश के खिलाफ गवाही दी। बच्चों का सहारा लेकर राजेश बच नही सकता। सरकार को भी ये नियम बनाने चाहिए कि घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए महिलाओं को प्रेरित किया जाए। एयरकंडिशन कमरों में घरेलू हिंसा एक्ट पर चर्चा से महिलाएं सुरक्षित नही हो सकती उनकी सुरक्षा के लिए जागरुकता और मॉनिटरिंग की जरुरत है। इसी का अभाव है कि अनुपमा जैसी महिलाओं को जान गंवानी पडती है। ईश्वर अनुपमा की आत्मा को शांति दे।और उसके हत्यारे पत्ति को कड़ी से कडी सजा मिले। सरकारी महकमों को सदबुद्धि मिले कि वो मॉनिटरिंग करें क्योंकि भारत की ये सच्चाई है कि यहाँ लगभग हर घर में एक अनुपमा रहती है।

Tuesday, December 7, 2010

अनकहे मगर जरुरी मुद्दे


फ्रांस के राष्ट्रपति का दौरा इस बार अविस्मरणीय बन गया है अव्वल तो उनके साथ उनकी पत्नी और पूर्व मॉडल कार्ला ब्रूनी भारत आई है और दूसरी कि भारतीय मीडिया अब उन्हें मुगल शासक अकबर की उपाधि से नवाजने लगा है क्योंकि फतेहपुर सीकरी पर अकबर ने भी संतान की दुआ की थी और उसकी वो दुआ पूरी भी हुई थी कुछ ऐसा ही फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने किया। वो भी अपनी पत्नी के साथ पहुँच गए फतेहपुर सीकरी। बेटे की दुआ मांगने। साथ ही ब्रूनी ने अपने बड़े बेटे की सलामती की दुआ भी मांगी। दरअसल देखा जाए तो इस बार फ्रांस के राष्ट्रपति एक राष्ट्राध्यक्ष कम एक याचक ज्यादा लग रहे थे। कयास लगाए जा रहे कि भारत के बड़े बाजार को देखकर जो पहल अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने की थी उसकी तरफ फ्रांस भी बढ रहा है। सरकोजी की भारत यात्रा को उसी कड़ी में रखकर देखा जा रहा है। वो अपने देश की तकनीक बेचकर भारत से खूब सारा पैसा बटोर लेना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता के लिए सरकोजी ने भारत का समर्थन भी किया उसके साथ पाकिस्तान को आतंक पर लगाम लगाने की नसीहत भी दी। सरकोजी को इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि उनके अपने देश फ्रांस में सिखों के साथ जो अन्याय हो रहा है वो असहनीय है। भारत की जनसंख्या में एक बहुत बडा तबका सिख संप्रदाय से संबंध रखता है इसके साथ ही सरकोजी जिस प्रधानमंत्री से हाथ मिलाएंगे वो खुद भी सिख है, इसलिए सिखों के हितों को नजरअंदाज करके भारत से दोस्ती का हाथ बढाना देश में रहने वाले सिखों की भावनाओं से खिलवाड़ है। हमे उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिखों के विषय पर सरकोजी से बात जरुर करेंगे। कूटनीतिक स्तर पर इस विषय पर बात करना निश्चित तौर पर फ्रांस के सिखों के लिए एक अच्छा संदेश होगा। आने वाले समय में अगर फ्रांस में सिखों के हालात कुछ सुधरते हैं तो, फ्रांस के राष्ट्रपति का ये भारत दौरा सफल माना जाएगा।

Tuesday, November 30, 2010

गद्दारों के खिलाफ जनता ही हथियार

चंडीगढ के बाद कोलकाता में भी अलगाववादी नेता मीरवाईज को मुंह की खानी पडी।दरअसल ये तो ट्रेलर है।लोकतंत्र की दुश्वारियों के चलते मीरवाईज देश में बकवास कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह से उसे कश्मीर के बाहर विरोध का सामना करना पड रहा है उससे मीरवाईज झल्ला गए है।ये आश्चर्य नही होना चाहिए अगर मीरवाईज के कश्मीर पहुँचने के बाद कश्मीर की फिजा फिर गर्म हो जाए। देशद्रोहियों को सजा देना सत्ता के दलालों के बस की बात नही है उन्हें तो सजा जनता ही दे सकती है। अरुंधति राय औऱ गिलानी के खिलाफ मुक्दमा दायर करने की अनुमति ने ये साबित कर दिया है जनता को देश को बचाने के लिए फिर से रक्त शिराओं में उबाल लाना पड़ेगा।वरना कानून की देवी तो वैसे भी आंखों पर पट्टी बांधे सिर्फ ख़ड़ी ही रहती है।सार्वजनिक स्तर पर जनता को ही इन देशद्रोहियों के खिलाफ खडे होकर विरोध करना पड़ेगा।केस दर्ज होगा तो फिजूल में प्रचार मिलेगा ये वाहियात बात कहकर देश के गृहमंत्री ने अपना पिंड तो छुटा लिया लेकिन क्या वो इसकी गारंटी देने के लिए तैयार हैं कि अरुंधति औऱ गिलानी फिर कहीं बकवास नही करेंगे। दरअसल सत्ता में भी इन देशद्रोहियों की अच्छी खासी पकड है जिसके कारण ये लोग हमेशा से बचते आए हैं। वोट बैंक की राजनीति भी इन मामलों में गंभीर भूमिका निभाती है। बहुत दुख की बात है कि जो काम कार्यपालिका को करना चाहिए था उस बात का संज्ञान पहले न्यायपालिका ने लिया। लेकिन सरकार को भी ये समझ जाना चाहिए कि देश की जनता को ज्यादा समय तक गुमराह नही किया जा सकता देशप्रमियों को जहाँ भी मौका मिलेगा वो राष्ट्रदोहियों का विरोध करने में पीछे नही हटेंगे। वैसे तो गृहमंत्री आतंकवाद को रंग देने में कोई कसर नही छोडते अब सवाल ये उठता है कि वो अरुंधती औऱ गिलानी को किस रंग का आतंकवादी मानेंगे ? वहीं मंत्री जी से हमारा सवाल कि हम आपके परिवार के बारे में अपशब्द कहना कबसे शुरु करें?

Tuesday, November 16, 2010

संघ विरोधी कांग्रेसी उतावलापन


राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पूर्व प्रमुख कुप्हल्ली सीतारमैया सुदर्शन के सोनिया संबंधी बयान से कांग्रेस तिलमिलाई घूम रही है उसके कार्यकर्ताओं के हिंसक विरोध ने ये साबित कर दिया कि हिंसा कांग्रेस के खून में कूट कूट कर भरी हुई है। एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी होने के नाते काग्रेंस के सिपहसालारों को सुदर्शन की टिप्पणी का जवाब शालीन अंदाज में देना चाहिए था लेकिन संघ कार्यालय पर हिंसात्मक प्रदर्शन करके कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अपनी उदंडता का ही परिचय दिया है। दरअसल कुछ समय से कांग्रेस लगातार देश की जनता के हमले से जूझ रही है। उस पर लगने वाले घोटालों के आरोपों ने जनता के सामने उसकी लोकप्रियता को एक करारा झटका दिया है। कामनवेल्थ घोटाले,आदर्श सोसाईटी घोटाला,और अरबों रुपयों के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने कांग्रेस की कलई खोल के ऱख दी है। इन घोटालों ने राजीव गाँधी के समय हुए बोफोर्स घोटाले को याद दिला दिया। कांग्रेस की साख पर उस समय भी ऐसा ही बट्टा लगा था जैसा आलम आज नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि लगातार घोटालों में नाम आने के कारण कांग्रेस अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है। ये सर्वविदित है कि 10 नवंबर को संघ के राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन से कांग्रेस बुरी तरह घबराई हुई है उसे डर है कि एक तरफ तो राजनीतिक तौर पर उसका विरोध हो ही रहा है उसके साथ दुनिया के सबसे बड़े जनसंगठन ने भी सड़को पर उतर कर उसका विरोध किया है। दरअसल कांग्रेस इस बात को भली भांति जानती है कि संघ का सडकों पर उतरना कांग्रेस के लिए बडा खतरा हो सकता है।

खैर कांग्रेसियों के संघ विरोध ने ये साबित कर दिया है कि कांग्रेसियों के लिए राष्ट्र से बड़ा ओहदा सोनिया गाँधी का है। क्योंकि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त राष्ट्रविरोधियों के खिलाफ न तो काग्रेंसी नेताओ ने कुछ किया और न ही काग्रेंस के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतर कर किसी भी तरह का कोई विरोध प्रदर्शन किया। अरुंधति राय का कश्मीर को भारत से अलग करने संबंधी बयान हो या अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी का भारत की राजधानी दिल्ली में देशविरोधी बयान हो। त्रासदी तो तब हो गई जब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री औऱ काग्रेंस के महासचिव राहुल गाँधी के जिगरी दोस्त उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर को भारत का अंग मानने के मामले में दोबारा विचार करने की बात कह डाली। गौर करने लायक बात ये भी है कि तथाकथित युवराज और काग्रेंस महासचिव राहुल गाँधी को जहाँ उतावालपन दिखाना चाहिए था वहाँ नही दिखाया जहाँ उन्हें बेहद संजीदगी से काम लेना चाहिए था वहाँ उन्होने उतावलापन दिखाकर खुद का मखौल ही उडवाया है। संघ को बिना समझे विवादास्पद टिप्पणी देना और उसकी तुलना राष्ट्रविरोधियों से करना देश की जनता की नजरों में अपराध है जो कि अक्षमय है लेकिन राहुल गाँधी का घमंड देखिए कि उनके मन में जरा भी प्रायश्चित का भाव नही है। राहुल ने ये उस प्रदेश में किया जहाँ उन्हें राजकीय अतिथि का ओहदा मिला था और उस प्रदेश का मुख्यमंत्री स्वंयसेवक भी है। बहरहाल संघ से कांग्रेस की तुलना करना संघ का अपमान है।संघ अपने आप में परिपूर्ण संगठन है और काग्रेंस 125 साल की बूढी होने के बाद भी बचकाना हरकतें कर रही है। खैर काग्रेसियों की ये पुरानी परंपरा रही है कि पहले तो बिना सोचे समझे बोलते हैं उसके बाद उसके छुटभईये नेता सफाई देते फिरते हैं। कुछ ऐसा ही वाकया गृहमंत्री पी.चिदंबरम के भगवा आतंकवाद संबंधी बयान के बाद भी पेश आया जब काग्रेंस ने पी. चिदंबरम के बयान से खुद को अलग कर लिया। कांग्रेस के शासन काल में लगातार जिस तरह के विवाद रहे हैं उसने देश की साख को मिट्टी मे ही मिलाया है और अंतराष्ट्रीय पटल पर भारत को एक कमजोर नितियों वाला देश साबित किया है। काग्रेंस के शासन काल में ही बोफोर्स का दोषी इटालियन क्वात्रोकी देश से आराम से बाहर चला जाता है ,वहीं भोपाल गैस कांड के दोषी वारेन एंडरसन को इज्जत से सरकारी खर्चे से भारत से बाहर ले जाया जाता है। दरअसल कांग्रेस को चलाने की जिम्मेदारी उन हाथों में है जो ये कहा करती थी कि मैं राजनीति में नही आऊंगी बेशक मुझे अपने बच्चों को भीख मांग कर खिलाना पड़े। मैं बात कर रहा हूँ सोनिया गाँधी की। अगर शक है तो सोनिया का विकिपीडिया खोल के देखा जा सकता है। राजनीति के प्रति इस तरह का भाव रखने वाली महिला को 1997 में कांग्रेस की प्राथमिकता दी जाती है और उसके 62 दिनों के अंदर काग्रेंस की अध्यक्ष भी बना दिया जाता है। भई वाह ये तो सिर्फ कांग्रेस में ही संभव है जहाँ देश या पार्टी का संविधान नही, परिवारवाद बडा होता है। आप सोचेंगे कि मैं विषय से भटक रहा हूँ लेकिन नही मैं उस काग्रेंस के हाल बयां कर रहा जिसे अपने नाम के आगे राष्ट्रीय या नेशनल लगाने का कोई अधिकार नही है क्योंकि राष्ट्र जैसी कोई भी भावना उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं में नही है। देश की संपति को नुक्सान पहुंचा कर सोनिया अर्चना करना आखिर कहाँ तक जायज है ? गौर करने की बात ये भी है कि आखिर बार बार क्या बात है कि सोनिया की भारतीय नागरिकता या भारतीयता पर प्रश्न चिह्न लगते रहते हैं खैर ये तो जाँच का विषय है लेकिन सवाल ये है कि जाँच के आदेश देगा कौन? भाजपा का वो जनाधार है नही कि वो सरकार बना पाए न ही उसके पास कोई ऐसा चेहरा है जो जननेता बन पाएगा। भाजपा ने भी जिस तरह से सुदर्शन जी का साथ छोडा है वो भी निंदनीय है अपनी साख पर बट्टा न लगे इसके लिए डरपोक भाजपाईयों ने खुद को सुदर्शन जी से अलग कर लिया। वैसे सोनिया पर इस तरह के आरोप पहली बार नही लगे विभिन्न बुद्धिजीवी भी सोनिया गाँधी की राष्ट्रीयता को लेकर प्रश्नचिह्न लगा चुके हैं। डाक्टर सुबह्रमणय्म स्वामी पिछले 10 से 12 साल से लगातार कांग्रेस औऱ सोनिया गांधी की भूमिका पर शोध कर रहे हैं उन्होनें जो तथ्य जुटाए हैं वो वाक्ये में सराहनीय है। मौका मिले तो इस लिंक पर देखा जा सकता है। http://www.youtube.com/watch?v=SidLY-nSqvA) ।खैर इस सब में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जो उतावलापन दिखाया है उससे कहीं न कहीं देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की साख पर बट्टा तो लग ही गया है।

Monday, October 18, 2010

संघ विरोधी नवजात गाँधी


राहुल गाँधी का हाल ही में आया संघ के संदर्भ में बयान महज राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को ही दर्शाता है.महत्वकांक्षा भी कुछ ऐसी जो कि राहुल को हमेशा राजनीति में बच्चा साबित कर देती है.दरअसल अभी हाल ही में अपने मध्यप्रदेश प्रवास के दौरान राहुल गाँधी ने टीकमगढ में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की तुलना प्रतिबंधित इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया(सिमी) से करने की कोशिश की..उन्होनें कहा कि काग्रेंस में सिर्फ उन्ही का स्वागत है जो कि संघ या सिमी की विचारधारा को न मानता हो.संघ और सिमी की तुलना करना राहुल की अपरिपक्वता,अज्ञानता को ही दर्शाता है. राजनीति के लिहाज से देखा जाए तो कुछ राजनीतिज्ञ इसे मुस्लिम वोट बैंक को हडपने की कवायद भी मान रहे हैं.दरअसल राहुल कुछ समय से काग्रेंस का प्रचार नही कर रहे बल्कि सीधे तौर पर वोट के ही जुगाड में लगे हुए है.उन्हें चाहिए कि वो कांग्रेस की खोई हुई लोकप्रियता को वापस लौटाने का संघर्ष करें, लेकिन राहुल बेचारे खबरों में रहने के लिए विवादास्पद बयानबाजी ही करते नजर आ रहे हैं. और हो भी क्यों न आखिर उन्होनें राजनीति का पाठ भी तो विवादास्पद कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह से ही पढा है.दिग्विजय भी राष्ट्रविरोधियों के समर्थन में कसीदे पढने में गुरेज नही करते.चाहे वो नक्सलियों के प्रति नरम रवैया हो या बटला हाउस एनकाउंटर पर उनकी उठी हुई उंगली.बटला हाउस एनकाउंटर मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्णय को भी दिग्विजय शक की निगाहों से देखते हैं.

राष्ट्र परम वैभव को प्राप्त करे.संघ की शाखा का ये मूल मंत्र है.संघ स्थान पर प्रार्थना करने के दौरान भी संघ के स्वंयसेवक इस भावना को दोहराते हैं.संघ के सरसंघचालक माननीय मोहनराव भागवत अपने वक्तव्यों में हमेशा कहते हैं कि संघ का कार्य ही ऐसा है जिसे समझने के लिए स्वयंसेवकों को भी प्रयास और परिश्रम करना पडता है.संघ का कार्य बाहर से देखकर समझ नही आ सकता.अब जब संघ की रचना,उसकी रुपरेखा को समझने में स्वंयसेवकों को भी कई वर्ष लग जाते हैं तो राजनीति के तथाकथित गाँधीवादी खिलाडी राहुल को संघ को समझने में कितना समय लगेगा ये कोई भी आसानी से समझ सकता है। भगवान खटमलों के डर से पर्वतों और सागर में निवास करते है, इस तरह की भावना एक अज्ञानी के मस्तिष्क के अंदर ही आ सकती है.दरअसल कुछ ऐसी ही मानसिकता का दामन थामें राहुल गाँधी संघ पर टिप्पणी कर रहे हैं.जब तक आप भगवान की शऱण में जाने का प्रयास नही करेंगे तब तक आप भगवान की महिमा को पहचान नही पाएंगे.और स्वाभाविक है आप भगवान पर भी ये आरोप लगाएंगे कि उन्हें खटमलों का डर है.दरअसल इस अज्ञानता में राहुल गाँधी की भी कोई गलती नही है कान्वेंट की शिक्षा पाए राहुल ये सोचने में असमर्थ हैं कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी क्या होता है.इटेलियन माँ के आंचल में पले बढे राहुल भारत माँ के आंचल की ठंडक का अंदाजा नही लगा सकते.. अगर संघ को समझना है तो संघ के अनुभव को लेना होगा..और राहुल तो बिना संघ की शाखा में आए संघ पर धडाधड टिप्पणियाँ किए जा रहे हैं. किसी चीज को जानने के लिए क्या प्राथमिकता होती है वो तो इस बात को भी नही जानते..मैं उन्हें संघ की शाखा में आने का आमंत्रण देता हूँ. मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हुँ कि राहुल जब तीन बार भगवा ध्वज को प्रणाम करेंगे तो कम से कम उनकी अक्ल तो ठिकाने लग ही जाएगी..

दरअसल राहुल की राजनीतिक समझ पर पहली बार सवाल नही उठा उन्होंने जब से जनाधार खोती जा रही कांग्रेस का उद्धार करने का बीड़ा उठाया है तब से ही वो विवादों में ज्यादा रहने लगे हैं.मार्क्सवाद को मृत विचारधारा बताने संबंधी बयान पर भी माकपा महासचिव प्रकाश करात ने उनकी राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े किए थे..

वैसे ये तो सच है कि राहुल में अभी राजनीतिक समझ धीरे धीरे बढ रही है लेकिन उन्हें ये हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि आधी अधूरी जानकारी घातक होती है और अगर वो राजनीति में हो तो राजनीतिक करियर भी खत्म हो सकता है.वैसे राहुल राजनीति में अभी नए ही है. हावर्ड और लंदन से पढ़े राहुल का राजनीति मे पदार्पण 1999 में तब हुआ जब वो अपनी माँ सोनिया गाँधी के चुनाव प्रचार में उतरे.लेकिन असल में उन्होनें राजनीति 21 मार्च 2004 से प्रारंभ की जब उन्हें कांग्रेस के उम्मीदवार के रुप में अपने पुरुखों की सीट अमेठी से चुनाव लड़ने का मौका मिला.अपने 6 साल के राजनीतिक करियर के आसरे राहुल 85 साल के संघ पर उंगली उठा रहे हैं. राहुल को तो शायद ये भी नही मालूम होगा कि नेहरु ने भी संघ की राष्ट्रभक्ति पर पहले सवाल उठाए थे लेकिन चीन युद्ध में संघ की देश के प्रति समर्पण भावना को देखते हुए संघ को गणतंत्र दिवस की परेड में आने का न्यौता दिया था.इन सब में एक दिलचस्प बात ये हुई कि संघ ने राहुल के बयान को हलके में ही लिया. दरअसल संघ के स्वयंसेवक जानते हैं कि राहुल के बयान से संघ को कोई नुक्सान नही पहुँच सकता..हालांकि अयोध्या फैसले के बाद संघ की जो सामाजिक सौहार्द बढाने वाली प्रतिक्रिया आई उससे दिग्विजय सिंह ने भी संघ की तारीफ की लेकिन दिग्विजय के बयान से ये साबित हो जाता है कि वो थोथी राजनीति कर रहे हैं. एक तरफ तो उनका चेला संघ के बारे में अनाप-शनाप बककर झूठी लोकप्रियता पाना चाहता है दूसरी तरफ दिग्विजय दबे स्वर में संघ की तारीफ कर रहे हैं..खैर राजनीति में ये तो जायज नही था लेकिन तथाकथित वोट उगाहू राजनीति में आजकल राष्ट्रवादियों के खिलाफ बयानबाजी आम बात हो गई है..खैर कसाई के कोसने से गाय तो मरती है नही.लेकिन इस तरह की बयानबाजी से राहुल का बचपना सामने आ ही जाता है..


Saturday, October 2, 2010

मुल्ला भए मुलायम


एक बार फिर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को मु्ल्ला मुलायम कहने का दिल कर रहा है।वैसे मुलायम ये उपाधि पाकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे होंगे।उन्हें पहली बार इस उपाधि से 90 के दशक में नवाजा गया जब उन्होंने पहली बार अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाई थी।मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति मुलायम पर सदैव हावी रही है।हो भी क्यों न,आखिर उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों की संख्या भी तो सबसे ज्यादा है।यूपी की राजनीति में मुस्लिमों को दरकिनार करके सत्ता का सपना देखना फिजूल की बात जान पड़ती है।मुलायम अपने विरोधाभासी बयानों एक बार फिर फंसते नजर आ रहे हैं क्योंकि अयोध्या का फैसला आने से पहले मुलायम अदालत के फैसले को ही सर्वमान्य बता रहे थे अब जब फैसला आ गया है तो मुलायम उसे मुस्लिम विरोधी बता रहे हैं।वो एक तरफ तो कहते हैं कि देश आस्था से नही संविधान और कानून से चलता है वही दूसरी तरफ वो एक फैसले को धर्म विशेष के खिलाफ बता रहे हैं।वो इलाहाबाद हाईकोर्ट की विश्वसनीयता पर भी उंगली उठा रहे हैं उनका कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय ही सबूतों के आधार पर फैसला करेगा जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो पाएगा।मुलायम तो ऐसे बोल रहे हैं कि जैसे हाईकोर्ट ने फैसला सबूतों के आधार पर न किया हो।दरअसल न्यायपालिका पर इस तरह के आरोप लगाना भी कोर्ट की अवमानना है।संवैधानिक तौर पर असंतु्ष्ट पक्ष को सर्वोच्च न्यायालय में अपील करनें का पूरा अधिकार है लेकिन ये क्या कि आप न्यायालय पर सबूतों के आधार पर फैसला न देने का आरोप लगा दें।मुलायम की मौजूदा बयानबाजी राजनीतिक मजबूरियाँ हो सकती है लेकिन ये बयानाबाजी देश के लोगों खासकर मुसलमानों के मन में न्यायालय के प्रति अविश्वास ही पैदा करेगी।इस अविश्वास के घातक परिणाम भी देश को नुक्सान पहुँचा सकते हैं।देश के प्रत्येक राजनीतिक दल ने हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत किया है और फैसले की संवेदनशीलता को जानते हुए देशवासियों से शांति और सौहार्द बनाए रखने की भी अपील की है।लेकिन देश की फ़िजाओं में मुलायम जहर घोलने पर उतारु हैं।अयोध्या मामला हमेशा से जितना संवेदनशील रहा है उतना ही ये वोट जुगाडू भी रहा है।बेशक हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया हो लेकिन अयोध्या विवाद मर गया या इस पर राजनीति नही होगी ये नही कहा जा सकता।एक तरफ जहाँ मुस्लिमों का एक बहुत बड़ा धड़ा हाईकोर्ट के फैसले को उचित मानकर विवाद को खत्म करने का विचार कर रहा है वहीं मुलायम का ये बयान मु्स्लिम समाज में भारतीय न्यायिक व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा करेगा।मुलायम का ये बयान आगामी विधानसभा चुनाव में जनाधार बटोरने की कवायद के रुप में भी देखा जा सकता है।बहरहाल कुछ भी हो चुनावी प्रपंचों की आड़ में देश के संविधान और न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त से बाहर है.खैर ये अयोध्या है साहब राजनीति का अड्डा कहें तो अतिश्योक्ति नही होगी.

Thursday, August 26, 2010

कुचलते अरमान


हर तरफ विरानियाँ है
कहीं टूटे दरख्त तो कुछ झड़े हुए पत्ते पडे़ हैं
राहों में
कुचले जा रहे हैं
पैरों तले
कुछ एलिट जूते तो
कभी मजदूर की टूटी चप्पलों तले
हर बार कुचल रहा है
उन्हें कोई
पहचान करना जरा मुश्किल है
लेकिन ये जरुर कहा जा सकता है
कि हर कोई कुचल रहा है
किसी दूसरे के अरमानों को.

Saturday, August 21, 2010

स्वतंत्रता बेमानी है !


63 साल बाद भी तिरंगा शान से लाल किले कि प्राचीर पर लहर रहा है.तिरंगे के लहरने का कारण वादियों में चलने वाली हवा है न कि हमारा जोश.वो निरंतर लहरता रहेगा जब तक फिजाओं में हवाऐं चलती रहेंगी.लेकिन आजादी के 63 साल बाद एक प्रश्न उभर कर सामने आ रहा है कि क्या राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में वो शान बची है जो 63 साल पहले हुआ करती थी.आज हम एक गणतंत्र राष्ट्र में जी रहे हैं.लोकतांत्रिक देश होने के नाते यहाँ संविधान सर्वोच्च है. राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को उस परिस्थिति में पहुँचाया जब देश का प्रत्येक नागरिक ये कह सकता कि मैं पूर्ण स्वतंत्र हूँ.लेकिन क्या आज ऐसा है? कुंठाओं ने मन में घर बना लिया है.15 अगस्त या 26 जनवरी हमारे लिए राष्ट्रीय पर्व न रहकर महज छुट्टी का एक दिन बन गए हैं.दरअसल हमें आजादी तो मिली मगर हमें उसे संजोना नही आया.राष्ट्रवादियों और महापुरुषों द्वारा बताई गई बातें हमारे लिए महज किताबी हो गई है.लोकतंत्र को लोकधर्म होना चाहिए था मगर लोगों ने लोकतंत्र को अपने निजी धर्मों के अनुसार बदलना शुरु कर दिया.

15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के प्रथम संबोधन में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जय हिंद का नारा लगाते हुए कहा था कि देश में स्थिरता आएगी और गरीबी दूर होगी.लेकिन आज 63 साल की जवान आजादी के बाद भी गरीबी में मामूली कमी ही आ पाई है.इन 63 सालों के बीच देश में अस्थिरता भी बढी है.सांप्रदायिकता,आतंकवाद, नक्सलवाद,रंगभेद, वंशवाद, दलित उत्पीडन के रुप में भारत में अस्थिरता बढी है.गरीबी खत्म हो या न हो गरीब निश्चित रुप से खत्म हो रहा है.जय हिंद का मतलब होता है विजय या जीत.अब सवाल ये उठता है कि क्या जय हिंद का नारा अपनी प्रासंगिकता नही खो रहा है? सुभाष चंद्र बोस ने देश को स्वतंत्रता की सुबह का दर्शन कराने के लिए आजाद हिंद फौज की स्थापना की थी. तब ये नारा सभी देशवासियों की जुबाँ पर चढ गया था. नारा आज भी हमारे देश के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से लगाते हैं मगर सिर्फ क्षणिक जोश जगाने के लिए.भारत की विजय अब सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है.भ्रष्टाचार, असमानता,अशिक्षा ये सभी वो विषय हैं जिन पर चर्चा तो खूब हो रही है मगर समाधान कुछ नही निकल पा रहा.

दरअसल समस्या ये भी रही है कि देश के नागरिकों ने अपनी आजादी को गलत ढंग से अपनाया है.हमें अपने अधिकारों की तो चिंता है मगर अपने उत्तरदायित्वों को हमने पूर्णत भूला दिया है. हमें ये याद है कि हम सड़क पर चलने के लिए आजाद है लेकिन जब हम उस सडक पर कूडा फेंकते है या थूकते हैं तो हमें अपना कर्तव्य याद नही आता कि ये गलत है.स्वतंत्रता में हमारे अधिकारों का तो समावेश होता है उसके साथ हमारे कर्तव्य भी जुडे़ होते हैं.15 अगस्त पर देशभक्ति के गीत सुने जाते है मगर जब बात आती है देश की रक्षा में बलिदान होने की तो हम पड़ोसी की तरफ नज़र उठाकर देखते हैं.वो कहते हैं न कि “भगत सिंह पैदा तो हो मगर पड़ोसी के घर में” हमने अपने अंदर के भगत सिंह की हत्या कर दी है और दुर्भाग्य है कि हमें उस हत्या का पता भी नही है पश्चाताप तो दूर की बात है.

आज देश दो भागों में विभाजित हो गया है एक तरफ तो इंडिया है जिसमें देश का संभ्रांत तबका निवास करता है और दूसरी तरफ है भारत, जिसकी आत्मा गाँवों में बसती है. दुख इस बात का है कि इंडिया को तो आजादी मिल गई मगर भारत अब भी अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है.तकनीक का निरंतर विकास तो हो रहा है लेकिन उस तकनीक का फायदा देश के प्रत्येक तबके तक नही पहुँच पा रहा है. देश के ग्रामीण वर्ग के मन में शहरी क्षेत्रों के लोगों के प्रति हीन भावना भर गई है. राजनीतिक प्रयास भी गाँवों को वो तरक्की नही दिला सके जिनकी उन्हें सख्त दरकार थी.करोड़ों के हेर-फेर से हमारे देश के नेता देश को चलाने की कोशिश करने लगे हैं.गाँधी टोपी पहनना कभी शान हुआ करता था लेकिन अब बच्चे कहते हैं कि बेईमान नेता आ रहा है.हमारे देश के कई ऐसे राज्य हैं जो गंभीर आर्थिक और सामाजिक असमानताओं से गुजर रहे हैं. गाँवों तक विकास की गाड़ी पहुँच पाए इसके लिए पंचायतों का गठन किया गया मगर पंचायतों के क्रूर फैसलों ने इन्सान की आजादी को छीनने में भी कोई कसर नही छोडी.

हमारे देश में समय-समय पर सरकारें बदलती रही मगर किसी भी सरकार ने निचले तबके के विकास के लिए पहल की हो ऐसा कहना मुश्किल है.देश के नेताओं ने सबसे पहले उन लोगों के घरों को खुशहाल करने की कोशिश की जो उन्हें चुनावों में फायदा पहुँचा पाएं.स्वतंत्र भारत में राजनीतिज्ञों और उच्च तबके के लोगों ने स्वतंत्रता को मनमाने ढंग से प्रयोग किया.मतदान के समय नोटों का खेल भी हमें देखने को मिल जाता है.लोकतंत्र हमें हमारी सरकार को स्वयं चुनने का विवेक प्रदान करता है मगर होता इसके ठीक विपरीत है. सत्ता तक वही लोग पहुँचते हैं जो चापलूसों की दुनिया में गहरी पकड़ रखते हैं.

आजादी के 6 दशकों के बाद भी हमारे संकल्प संसद के गलियारों से निकलकर देश की सड़कों तक नही आ पाए.इसमें हमारी भी कमियाँ रही कि हम अपने अधिकारों का सही प्रयोग नही कर पाए और कर्तव्यों को भूल गए.देश के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपना सर्वस्व न्यौछावर करना चाहिए,ऐसी भावना हमारे मन में होनी आवश्यक है. हमारा देश विश्व का सबसे युवा देश है और ये सभी को पता है कि विश्व में जितनी भी क्रांति हुई है वो युवाओं के कंधों पर ही हुई है.हम चाहे तो राष्ट्र को एक नई दिशा दे सकते हैं। अपने गौरवमयी इतिहास के आसरे हम अपने वर्तमान और भविष्य को उज्जवल होता हुआ देख सकते हैं। बस आवश्यकता है एक प्रयास की। एक आंदोलन की। देश में एक समान नितियाँ सभी के लिए लागू हो, विकास का पैमाना सभी के लिए एक हो इसके लिए निश्चित तौर पर हमें संघर्ष की आवश्यकता होगी। हमें एक और आजादी की जरुरत है वो है आर्थिक आजादी.सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के प्रत्येक व्यक्ति का पेट भरा हो एक छोटे से लाभ के लिए लोगों के घरों को न उजाडा जाए.ये सब तभी संभव है जब हम अपने उत्तरदायित्वों को प्राथमिकता दें और अधिकार के साथ सवाल करना सीखें.ये सच्ची आजादी का पहला कदम है और ये निश्चित है कि हम जरुर आज़ाद होंगे.

Friday, July 9, 2010

'बाबा की गुफा में


कुछ समय पहले टीवी पर एक विज्ञापन आता था जिसमे एक लडकी एक बुजुर्ग महिला को मंदिर की घंटी अपने फोन के माध्यम से सुनाती है दरअसल ये विज्ञापन एक मोबाईल नेटवर्क का था जो भावनाओं को केवल भुना रहा था और विज्ञापन की सच्चाई पर कुछ संदेह हो सकता है वो विज्ञापन सत्य हो या न हो लेकिन एक बात तो खुश करने वाली है कि आज उस विज्ञापन की तरह बाबा अमरनाथ की गुफा में भी मोबाइल की धुन सुनाई देगी।हजारों लोग अपनी सलामती की खबर अब अपने फोन के माध्यम से अपने परिवार के लोगों तक पहुँचा सकेंगे।कश्मीर का ये क्षेत्र वैसे भी संवेदनशील है और मोबाईल की सुविधा से कम से कम लोगों के मन में एक भय का वातावरण तो कुछ कम होगा गौरव की बात एक और है कि बाबा की गुफा में मोबाइल की शुरुआत करने का श्रेय भारत की सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल को जाता है ये एक अच्छा संदेश है,इससे सरकारी कंपनी की तरफ जनता का विश्वास तो बढेगा ही बल्कि इसके साथ सरकार को राजस्व की भी प्राप्ति होगी घाटी में बीएसएनएल की ये पकड़ सैनिकों के लिए भी स्वाभाविक रुप से एक आशा की किरण बनकर उभरी है।बाबा कि गुफा में सुरक्षित यात्रा कराने का जिम्मा अपने कांधों पर उठाए सैनिक भी अब अपने घर मे बच्चे की किलकारियाँ सुन सकेंगे।उन्हे भी फसल कटने का संदेशा मिल पाएगा बहन की शादी पक्की होने की खबर भी अब उनके कानों को सुनाई देगी। सरकार के इस प्रयास की सराहना सभी को करनी चाहिए।बस आशा ये है कि घाटी में विकास की गति को रोकने वालों के खिलाफ सरकार अपना रुख जरा साफ करेगी।बाबा की गुफा में शुरु होने वाली इस सुविधा के दुरुपयोग की ओर भी सरकार को थोडा ध्यान रखना पडेगा फिलहाल इस नई सेवा का स्वागत करे और जोर से जयकारा लगाकर कहें जय बाबा बर्फानी..........!

Tuesday, July 6, 2010

शक्ति प्रदर्शन ही कश्मीर त्रासदी का हल

जम्मू कश्मीर में जो भयावह हालात अभी बन रहे हैं वो समूचे देश के लिए एक बड़े खतरे को जन्म दे रहें हैं.भारत विरोधी मानसिकता तो हमेशा से कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त रही ही है और उसको समय-समय पर पोषण देने का काम हमारे देश के तथाकथित सेकुलर नेताओं ने किया. कश्मीर मुद्दे पर सिर्फ वार्ता की पेशकश ने भारत की छवि अपने ही देश में याचक के समान कर दी है.भारतीय नेताओं ने आंतरिक कलह के दौरान याचक की तरह अलगाववादियों के सामने सिर्फ हाथ ही फैलाए हैं.कोई ठोस कार्य़वाही करने पर मानवअधिकारी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद कर लेते हैं.सेना को बदनाम करने के नए नए पैंतरे घाटी में अपनाना कोई नई बात नही है.कभी भारतीय सैनिकों पर तथाकथित रुप से निर्दोंषों की हत्या करने के आरोप लगते हैं तो कभी महिलाओं के साथ जोर जबरदस्ती करने के.कश्मीर भारत का हिस्सा है और इस बात को मानने मे किसी भी भारतीय को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए.लेकिन दुर्भाग्य है कि भारतीयों के अंदर राष्ट्रवाद कही न कही दम तोडता जा रहा है अब भारत की युवा पीढी चलताऊ बन चुकी है जिसे हल्के में काम निपटाने में ही आन्नद आने लगा है.समय आ गया है धोनी की शादी का जो युवाओं मे चर्चा का विषय होती है राष्ट्र की बात बेहद पकाऊ विषय होता जा रहा है..कहते हैं कि किसी देश को बर्बाद करना है तो उसकी संस्कृति के प्रति देश के युवाओं मे दुराग्राह की भावना भर दो.अब राजनीति,संस्कृति-सभ्यता,नैतिक मूल्यों पर विचार विमर्श करना दूर की कोडी हो चुकी है.ये देश के लिए संकट की स्थिति है और दुर्भाग्य तो ये है कि देश की सरकार भी इस ओर उदासीनता का भाव रखे हुए है.शायद यही कारण है कि हमें अब राष्ट्रवाद में भी राजनीति नज़र आती है.
जम्मू में दो साल पहले भारतीय एकता की झलक बाबा अमरनाथ यात्रा के दौरान दिखी थी उस तरह के उदाहरण अभी भी हमारे मन में एक विश्वास जगाते है कि संकट के समय हो न हो हम एक हो ही जाएंगे लेकिन ये विश्वास उस समय कमजोर हो जाता है जब हम वामपंथी माओवाद या कहें आतंकवाद या इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकवाद की तरफ अपनी युवा वाहिनी को बढ़ता देखते हैं.कश्मीर के मामले में हमारा पडोसी देश पाकिस्तान भी हमेशा से अपनी टांग अडाता रहा है और ये कहना भी अतिश्योक्ति नही होगी कि भारत में अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने के पीछे या भारत में समय समय पर अशांति फैलाने के लिए पाकिस्तान एक सोची समझी रणनीति के तहत काम करता है.पाकिस्तान द्वारा भारत के अलगाववादियों को आर्थिक मदद भी दी जाती है इसमें भी कोई संदेह नही है.इसी लिए भारत के जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में गोलियों की आवाजें अक्सर सुनाई देती हैं भोले भटके हाथों में बंदूकें दे दी जाती है ताकि समय आने पर वो बंदूके भारत विरोधी आग उगल सकें.भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान तो कश्मीर की गलिय़ों में शौकिया खेल बन चुका है.श्री नगर का लाल चौक तो अक्सर भारत की अस्मिता के बलात्कार का गवाह बना है.भारत का गौरवमयी इतिहास हमें हमेशा सिंहों के समान ललकार सिखाता है मगर दिल्ली का मिमयिना रवैया भारत को नपुंसक बना रहा है.भारतीय सैनिकों को कश्मीर से हटाने के बारे में अक्सर बात होती रहती है लेकिन क्या ये सच नही है कि कश्मीर की मस्जिदों में गद्दारों के रहने के लिए सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था की जाती है औऱ भारतीय सैनिको पर आरोप लगाकर उन्हें वहाँ से हटाने के लिए के प्रपंच किए जाते हैं.कश्मीर में इस समय भारी सुरक्षा बल के होते हुए हालात बेकाबू है तो ऐसा कैसे मान लिया जाए की वहाँ सेना हटाने से हालात सुधर जाएंगे.सिर्फ भाषणों तक ही भारतीय प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था सीमित है.भारतीय गृहमंत्री इस बात को तो मानते है कि अलगाववादियों का पत्थर फैंक अभियान सुनियोजित है जिस पर लगभग 50 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं लेकिन वो इस समस्या का समाधान देने में गच्चा खा जाते हैं.कश्मीर के आतंकियों को तो माफ करके दोबारा पुनर्स्थापित करने की बात तो भारत सरकार ने कह दी मगर उन कश्मीरी पंडितों का दर्द न जाना जो अपनी ही धरती से पराए हो गए.इन सब त्रासदियों को देखकर फिर से सरदार पटेल की याद आती है जो राजनीतिक रुप से तो कम से कम सशक्त थे ही.लेकिन सरदार के नाम पर राजनीति करने वाले ही आज सरदार के आदर्शों और उनकी सोच के साथ खिलवाड कर रहे हैं.संवेदनाओं का भाव तो वोटों के कारण मर चुका है इसलिए 60 वर्षों बाद भी हम अपने ही देश के अभिन्न अंग के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.
क्या हमारे देश की सेना या सुरक्षा एजेसियों पर आज हमें इतना भी भरोसा नही रहा कि वो तिरंगे की आन बचाने के लिए हाथ में हथियार भी न उठा सके.क्या फाइलों के शिमला समझौते अब प्रासंगिक हैं जब भारत माँ की इज्जत तार तार हो रही हो.समाधान की बात होती है तो देश के नीति नियंता सिर्फ कागज के कुछ पन्नों तक सीमित रह जाते हैं.सवाल ये है कि आखिर हमने 60 सालों में इन कागजों को गिनने के अलावा किया ही क्या है?मानवाधिकारों की बात हमेशा की जाती है क्या अपने देश से गद्दारी करने वाला भी मानव होता है जिसने अपने स्वार्थो के लिए अपनी माँ को बेचने का निश्चय कर लिया हो क्या उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि वो भी मानव होंगे.बेशक होगे मानव, लेकिन ऐसे मानव हमें प्यारे नही जो अपनी माँ की छाती में ही खंजर घोंपने की कोशिश करते हैं.हमारे देश मे धार्मिक एकता की बात होती है मेरा सवाल ये है कि कहाँ गए वो एकता के पैरोकार जो शांति के संदेश का दम भरते हैं.अमरनाथ यात्रा पर पत्थर बरसते हैं और फिर भी हम धार्मिक एकता की बात करते हैं.धार्मिक आयोजन के लिए देश की धरती लेने के लिए हमें कीमत चुकानी पडती है उसके साथ संघर्ष भी करना पडता है.और ये कही ओर नही बल्कि कश्मीर में ही हुआ है.महज सौ एकड जमीन के लिए देश के नागरिकों को प्रदर्शन करने पडते हैं.क्या किसी ने किया कोई प्रदर्शन की ये गलत हो रहा है.वो फतवा जारी करने वालों कहाँ गए अब कौन करेगा धार्मिक सौहार्द बिगाडने वालों के खिलाफ फतवा जारी.क्या फतवे सिर्फ धर्म के लिए ही होते हैं देश पर संकट आने पर फतवा आखिर क्यों नही जारी होता? आज जरुरत है एक चुनौती की जो साबित करेगी कि सिंहो को कायर समझना गलती होगी.शिशुपाल ने अब अपनी हदें पार कर ली है कृष्ण को सुदर्शन चलाना ही पडेगा.समय आ गया है भारत को सिरमौर बनाने का जहाँ सिर्फ राष्ट्रवाद होगा माता का आर्शिवाद होगा.क्या हम तैयार है? ये इतना आसान नही है लेकिन ये भी सच है वीर भोग्या वसुंधरा...

Monday, June 28, 2010

हम्माम में सब नंगे या पानी गंदा !


नाइट शिफ्ट में ऑफिस से काम करके सुबह घर लौट रहा था.उस समय आलम ये था कि मेरी आँखे और डीटीसी बस की जर्जर हालत की तेज आवाज युद्धरत थी.मुल्तान नगर की लाल बत्ती पर डीटीसी लाल बत्ती को पार करती हुई निकल गई.पीरागढी पर बस के पहुँचते ही डीटीसी बस के आगे एक ट्रैफिक पुलिस की पीसीआर वैन आकर खड़ी हो गई.मैं भी बस से उतर गया.देखा तो पाया कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी से जुर्माना वसूल करने की कोशिश कर रहा था.देखकर आश्चर्य हुआ कि ऐसा तो होता नही है, मगर हो रहा है तो अच्छा है.ये कवायद सरकार की समानता की नीतियों का समर्थन तो कम से कम कर ही रही है.सरकारी कर्मचारी कोई लाईसेंस प्राप्त कानून भंजक तो है नही ! खैर पुलिसवाले और डीटीसी ड्राइवर का विवाद बढ़ गया.पुलिसवाले का गुस्सा देखकर ड्राइवर थोडा़ नरम पडा और जेब से सौ का नोट निकालकर पुलिसवाले की जेब में डाल दिया.पुलिसवाला झल्लाया तो ड्राइवर ने पचास का एक और नोट निकालकर उसे भी पुलिसवाले की जेब में डाल दिया.पुलिसवाला बस वाले को चेतावनी देकर फौरन निकल गया.
मेरे लिए ये एक अजीब सा ही अनुभव था कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी को रिश्वत दे रहा है मैने ऐसा पहली बार देखा था.भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में रिश्वत एक बेहद सशक्त हथियार है अपने लक्ष्य को भेदने का.बार-बार जागरुकता संबंधी कार्यक्रम जोर मारता है कि शिक्षा भ्रष्ट्राचार का नाश कर सकती है.पर सवाल ये है कि क्या वो दोनो सरकारी कर्मचारी शिक्षित थे? जवाब है नही.क्योंकि शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नही बल्कि नैतिक मूल्यों के प्रति आदर भी है.लेकिन अब नैतिक तो भुला दिया गया है और मूल्य का ही आदर किया जा रहा है.मूल्य चुकाओ और कोई भी काम करवाओ,ये शिगुफा बन गया है.दरअसल भारत में शिक्षा प्रसार सिर्फ 6 घंटो की कवायद ही रह गया है.स्कूल कॉलेजों मे भ्रष्ट्राचार समाप्ति के भाषण सिर्फ वर्किंग ऑवर्स की बात ही रह गई है.सत्य के धरातल पर कुछ और ही बात सामने आती है.हम प्रतिदिन अपने इर्द-गिर्द भ्रष्ट्राचार होता देखते हैं परन्तु उसके खिलाफ आवाज उठाने में कतराते हैं, क्योंकि हमारी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर हमारा विश्वास नही है.वोट देना महज फैशन बन कर रह गया है.और वैसे भी राक्षसों के बीच में भगवान को चुनना तो असंभव ही है.बात होती है एक वोट से दुनिया बदलने की पर सच्चाई ये है कि एक हमेशा से कमजोर होता है.दरअसल भारतीय जनमानस के अंदर राष्ट्र के अस्तित्व को सजाने,संवारने और संरक्षित करने की भावना लगभग मर चुकी है. लोकतंत्र का मतलब ये नही कि लोग अपनी मर्जी से नेता चुने बल्कि लोकतंत्र का उद्देश्य है कि लोग अपनी मर्जी से अच्छा नेता चुने.अब अच्छा नेता क्या है ये समझाने की मुझे जरुरत नही है.राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का भाव ही हमारे मन में होना चाहिए.तभी कुप्रथाएं देश को बचा पाएंगी.लेकिन नीति नियंता कैसे हो इस पर भी विचार होना चाहिए.आप मुझे भी बतायें कि अच्छा नीति नियंता क्या होता है?

Thursday, June 10, 2010

दुर्भावनाओं से भरी जनगणना

जात ही पुछो साधु की,मत पुछिए ज्ञान,
मोल करो मयान का,ऊपर से होती पहचान
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दोहों का मतलब बदलने में समय नही लगता. झुठ,फरेब और ऊपरी दिखावे के आसरे सत्ता के तवे पर राजनीतिक लोग और उनके नुमाइंदे अपनी राजनीतिक रोटियाँ खूब सेकते हैं.दस सालों में एक बार होने वाली जनगणना ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में एक नया विवाद पैदा कर दिया है.जनगणना में अब जाति के आधार पर लोगों की गिनती की जाएगी और ये प्रस्ताव एक ऐसे देश में रखा गया है जो अपने मिजा़ज से धर्मनिरपेक्ष है.लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इसी धर्मनिरपेक्ष देश में पहली बार 1991 में उसी सरकार नें धर्म आधारित जनगणना की पैरवी की थी जिसने देश की स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण में धर्मनिरपेक्षता का भाव डाला था.मैं बात कर रहा हुँ कांग्रेस सरकार की. ये वही कांग्रेस सरकार है जो कि पहले जाति आधारित जनगणना से ना नुकुर कर रही थी और अब समर्थन की मुस्कान से तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों को खुश कर रही है
देश में जाति आधारित जनगणना से निसंदेह जाति व्यवस्था को बल मिलेगा और जनगणना के बाद जो आंकडे़ आएंगे उन पर राजनीतिक गुणा-भाग का जो दौर चालु होगा वो भारतीय संविधान की आत्मा को गहरा आघात पहुँचाएगा.देश की संसद में जाति आधारित जनगणना के मामले में जान फूंकने वालों में जिस यादव तिकड़ी ने गोलबंदी की है वो 70 के दशक के समाजवादी आंदोलन की ही पैदाइश है जिसे राम मनोहर लोहिया लीड कर रहे थे.बड़े दुर्भाग्य की बात है कि यादव तिकडी़ जाति व्यवस्था को बढावा देने का कोई मौका नही छोड़ती औऱ वहीं इनके तथाकथित राजनीतिक पिता राममनोहर लोहिया ने जाति व्यवस्था के जिन्न को बोतल में बंद रखने की ही वकालत की.लेकिन ये राजनीतिक मजबूरियाँ और अस्तित्व को बनाए रखने की कवायद है जो इन्हे जाति व्यवस्था को मजबूत करने की वकालत करने पर मजबूर करती है.दरअसल सपा, राजद,जेडीयू और बसपा ये वो पार्टियाँ है जो मुद्दों के आसरे नही बल्कि अपने जातिगत व धार्मिक प्रपंचों के आसरे सत्ता पर काबिज होने की जोड तोड करते हैं महिला आरक्षण का विरोध ये अपनी पुरुषवादी मानसिकता को संरक्षित करने के लिए करते हैं.आरक्षण की पैरवी करने वाले महिला आरक्षण को सिरे से नकार देते हैं और संसद में जहर खाने तक की धमकी देते हैं. राष्ट्रवाद,अफजल की फांसी,बांग्लादेशी घुसपैठ पर इनकी चुप्पी सिर्फ यही साबित करती है कि राष्ट्रहित इनके लिए नगण्य है.अब जब राष्ट्रहित की भावना ही नही है तो स्वाभाविक है कि अपने निजी स्वार्थ सर्वोपरि हो जाएंगे तभी तो मांग उठती है जातीय जनगणना की, जिसमें हम जान पाएंगे कितने लोग देश में मैला ढोने वाली जात के हैं और कितने पंडिताई कर रहे हैं.इनसे कुछ हो न हो लेकिन नेताओं का बडा फायदा होगा.नेताओं को चुनावों के दौरान राजनीतिक बिसात बिछाने में आसानी हो जाएगी.फिर चुनाव में खडे होने के इच्छुक उम्मीदवारों के बायोडाटा में जातियों का समीकरण भी मायने रखेगा.खैर दुख तो तब होता है जब राष्ट्रीय पार्टियाँ भी जाति आधारित जनगणना का समर्थन करती है. साम्यवादी समाजवाद को भूल जाते हैं,वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को लात मारते हैं और वहीं भाजपाई पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को दरकिनार करके जाति आधारित जनगणना का समर्थन करते हैं.वहीं कांग्रेस की तो पुरानी नीति रही है कि परिस्थितियों को देखकर रंग बदलना.वो भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को सर्वोपरि रखकर देश के माथे पर जातिवादी कलंक लगाना चाहती हैं.
खैर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो देश में 3000 जातियाँ और 25000 उपजातियाँ हैं और जाति आधारित जनगणना के बाद इन जातियों में बढोतरी स्वाभाविक है.21वीं सदी में जाति विहीन समाज की कल्पना को मूर्त रुप देना तो इस तरह की जाति आधारित जनगणना से मुमकिन नही हैं.हम सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के ख्वाब देख रहे हैं और राजनीतिक प्रपंचों से ही सुरक्षित नही है.हम ममता सौढा को एवरेस्ट पर चढता देखते हैं और वहीं मिर्चपुर में दलितों पर अत्याचार को भी सामने पाते हैं.देश में नक्सली मौत का तांडव खेलते हैं,मंहगाई दम निकाल रही है, फिर भी हम जाति व्यवस्था में समय बर्बाद कर रहे हैं. राजनीतिक खिलवाड़ तो देश की जनता से हो ही रहा है लेकिन ये हमेशा जारी रहेगा ऐसा हम होने नही देंगे. राष्ट्रवाद ही इन सारी यातनाओं से हमें मुक्ति दिला सकती है.जातिगत दुर्भावनाओं से ऊपर उठकर ही देश को प्रगति की ओर ले जाया जा सकता है.

Monday, June 7, 2010

महाभारती अंदाज में झा की राजनीति

प्रकाश झा जब भारतीय राजनीति का रस चखने के लिए पिछले लोकसभा चुनाव में रणक्षेत्र में उतरे तो भारी असफलता के साथ उन्हें बौद्धिक धरातल पर निराशा झेलनी पडी होगी.लेकिन फिल्मी राजनीति में प्रकाश झा ने अपना झंडा फहरा ही दिया.बात कि जा रही है उनकी हाल ही में आई मल्टी स्टारर फिल्म राजनीति की.व्यावहारिक राजनीति में तो प्रकाश झा ने कोई परिवर्तन की मशाल नही जलाई लेकिन रील लाईफ में प्रकाश झा ने राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर अपने महाभारती अंदाज में फिल्मी कौरवों के दांत तो खट्टे कर ही दिए.वैसे भी भारतीय फिल्म जगत में प्रकाश झा अपने सामाजिक सरोकारों वाली फिल्मों से ही जाने जाते हैं.जिस तरह युवाओं ने इस फिल्म को रिस्पांस दिया उससे तो यही लगता है कि अब भारतीय दर्शक का स्वाद भी बदल रहा है.प्रकाश झा की राजनीति दुनिया के सबसे बड़े महाकाव्य की भी याद दिलाती है.दरअसल फिल्म राजनीति के पात्र भी महाभारत के पात्रों की तरह सत्ता के इर्द-गिर्द घुमते नज़र आते हैं.कृष्ण की भूमिका में नाना पाटेकर जिस ज्ञान को रणवीर कपूर को बाँट रहे हैं और युद्ध के धर्म का पाठ पढा रहे हैं वो यही साबित करता है कि अधर्म करने वाला अपना ही क्यों न हो उसका संहार ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए.वैसे द्वापर युग में घटित हुई महाभारत की प्रासंगिकता आज के समय में बढ गई है क्योंकि सत्ता मोह और निजी स्वार्थ में अपनों का ही भरोसा तोडना राजनीति का मूल मंत्र बन चुका है.वैसे प्रकाश झा अपनी फिल्म में राजनीति के अपराधीकरण का कोई हल देते हुए नज़र नही आते.उन्होनें राजनीति के विभिन्न पहलुओं को तो छुआ मगर राजनीति के जिस अपराधीकरण के खात्में की बात प्रकाश झा अपने इंटरव्यू में करते हैं उस अपराधीकरण को खत्म करने का विचार प्रकाश झा ने अपनी फिल्म में कहीं भी दिया हो ऐसा नही लगता.भारतीय राजनीति के प्रति देश के युवाओं का रुखापन इस फिल्म को देखकर और अधिक बढेगा क्योंकि प्रकाश झा की राजनीति का मुख्य रणनीतिकार समर प्रताप सिंह उर्फ रणवीर कपूर राजनीति को नापसंद करके भी इस राजनीति का अर्जुन है और जब समर प्रताप की कवायद रंग लाती है और सत्ता पर उसके एक छत्र राज की स्थिति आती है तो वो सबकुछ छोडकर विदेश रवाना हो जाता है, ये अंर्तद्वद एक कमी को भी प्रदर्शित करता प्रतीत होता है.प्रकाश झा की राजनीति भारतीय युवा की पलायनवादी सोच को तो दर्शा ही देती है.रणवीर कपूर में भारत का युवा खुद को देखता है और वो भी राजनीतिक अवसरवादी बनने तक ही खुद को सीमित रखता है.राजनीति को लताडना तो भारतीय युवा को आता है मगर उसकी कीचड़ को साफ करके वो अपने हाथ गंदे नही करना चाहता.दरअसल यही भारतीय राजनीति की विडंबना है कि हम भारतीय कमियाँ निकालने में माहिर हैं.निर्देशक अपनी फिल्म बनाने से पहले किसी न किसी से प्रेरित तो होता ही है, लेकिन उस प्रेरणा को नया रुप देकर संप्रेषणीय बनाना ही कलाकारी है और इस कलाकारी में झा हिट हैं.लेकिन प्रकाश झा की राजनीति सिर्फ एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घुमती कहानी है। इसमें गठबंधन राजनीति का तो पटाक्षेप झा ने किया मगर अंत तक वो सिर्फ एक ही परिवार की राजनीतिक प्रतिदंद्विता तक ही सीमित रहे। लगता है झा महाभारत के पात्रों और उसकी घटनाओं पर ही केंद्रित रह गए.अगर ये फिल्म की सीमित रणनीति है तो ठीक है लेकिन अगर ये भूल है तो अक्षम्य है। खैर उनकी अगली फिल्म ‘आरक्षण’ भी भारतीय राजनीति और सत्ता लोलुपता के यथार्थ को प्रदर्शित करेगी ऐसी आशा तो रखी ही जा सकती है..

Sunday, May 30, 2010

फिर मौका दे

एक दिन मैं अकेला था,
फिर एक दिन दो जान हुआ,
आज फिर वो तन्हाई खाए जाती है
रह-रह कर मुस्कुराते अतीत की याद दिलाती है
सोचा जी लेंगे किसी और की आस में,
सोचा न था तेरी भी आस लगी थी हमसे
सूरज की रोशनी में,
एक उजाला ढूंढना चाहा
रात की तन्हाई में खुद को भुलाना चाहा,
लेकिन,ये हो न सका,

तोडकर किसी की हसरतें
कमब्ख्त दिल रो भी न सका
सोचा इतने कमसब्र नही थे हम
लेकिन तेरी मोहब्बत में,वो भी हो गया,
जो कभी हो न सका
अब मुराद करते हैं,
फरियाद करते हैं,लौट आ,
एक बार फिर जीने का मौका दे,
बिखरी माला को पिरोकर,
एक खूबसुरत तोहफा दे,
वादा रहा तुझसे,
लौट कर फिर न जाऊँगा,
अर्थी पर हुँ एक बार फिर,
तु मिली तो जिंदगी ढूँढ लाऊँगा.

Saturday, May 29, 2010

जम्हूरियत में हैवानी हुकूमत

‘शंभु प्रताप सिहं राठौर’ एक ऐसा नाम जिसे अब हैवानियत का पर्याय माना जाने लगा है.शंभु प्रताप राठौर यानि हरियाणा के पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर जिनका नाम भारतीय इतिहास में हमेशा के लिए जुड गया है.68 साल की उम्र में 14 साल की बच्ची पर बुरी नज़र डालने वाले इस पुलिस अधिकारी को चंडीगढ़ सेशन कोर्ट से मिली डेढ साल की सजा बेशक कम लगे लेकिन कोर्ट द्वारा दिया गया ये फैसला भारतीय न्याय प्रणाली में एक विश्वास तो जगा ही देता है.खैर भारत भूमि पर इस तरह के कैरेक्टर तो पैदा होते ही रहे हैं,वो चाहे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोडा़ हो या इसी राज्य के मौजुदा सीएम शिबु सोरेन हो.सत्यम के राजू और लालु के चारे घोटाले को भी अभी कोई नही भुला होगा.दरअसल भारतीय व्यवस्था मे इस तरह के मामले पहले नही है बल्कि ऐसा लगातार होता रहा है.भारतीय न्याय व्यवस्था की कमजोरी का फायदा कैसे उठाया जाए उसे ये कानून जानने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं.देश में इस तरह के लोगों का लगातार पैदा होना देश के लिए एक गलत संदेश है.ये तो वो मामले हैं जो जनता कि हिम्मत से सामने आ गए लेकिन कई ऐसे मामले है जो सिर्फ दिल में या कागजों मे सिमट कर रह जाते हैं.सामाजिक बंधन कई चीखों को सिसकियों में बदल देते हैं और एक दिन परिणाम आता है रुचिका गिरहौत्रा सरीखा..खैर यहाँ तो आन्नद प्रकाश है जो रुचिका को इंसाफ दिलाने के लिए जद्दोजहद में लगे हुए हैं लेकिन उन सैकडो रुचिकाओं का क्या होगा जो कोर्ट तो क्या थाने तक भी नही पहुँच पाती.ऐसा इसलिए देखने में आता है क्योंकि कोर्ट की लंबी-लंबी तारीखों को कोई झेलना नही चाहता.देश में जहाँ नवरात्रों के दौरान कन्याओ के पूजन की प्रथा है उसी देश में उन कन्याओं को हवस का शिकार बनते भी देखा जाता है.दुखद विषय है कि एक तरफ तो सरकार के प्रयास इस तरह की समाजविरोधी गतिविधियों को रोक नही पा रहे है दूसरी तरफ जब अपराध हो रहे हैं तो उनकी स्वीकारोक्ती भी नही हो पाती.सिर्फ जाँच का भरोसा दिला कर छोड दिया जाता है.अगर मामला किसी भी तरफ हाईप्रोफाईल हो तो दबाने के भरसक प्रयास भी किए जाते हैं. एक तो बडी अजीब न्याय व्यवस्था है कि तीन तरह की कोर्ट मे मामले के निपटारे के लिए जद्दोजहद की जाती है.अपराध एक और सुनवाई तीन बार.बढिया है..और हम इतराते नही थकते की हम दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र है.क्या करना है ऐसे लोकतंत्र का जिसमें लोक के अधिकारों को कुछ संभ्रात लोगों द्वारा कुचल दिया जाता है.मूलभूत समस्याओं को दबाकर कुछ सुविधाओं का ढिंढोरा पिटना हमारी आदत बन चुकी है.शायद यही कारण है कि समस्याऐं और भी ज्यादा विकराल रुप में हमारे सामने खडी हो रही हैं.इन समस्याओ को अगर नजरअंदाज करने की कोशिश की जाएगी तो स्वाभाविक है कि एक दिन कुठाओं का ज्वार तो फूट ही जाएगा.इसकी गूंज सुनाई देने लगी है..सावधान

Tuesday, May 18, 2010

जाग तू प्रहार कर.

उठ,रग में भर जोश नया,
दुश्मन पर तू प्रहार कर,
माँ फिर तुझे पुकारती,
है दर्द से चिंघाड़ती,
धमनियों में ज्वार दे,
रक्त को संचार दे,
शमशीर को धार दे,
रणक्षेत्र में दहाड़ दे,
कपट का तू संहार कर,
लपट सा तू तेज ला,
आर्य की संतान तू,
आर्यवृत है देश तेरा,
गौरवी इतिहास को,
फिर से तू स्मरण कर,
सूर्य के तेज सा,
छा जा तू चमन पर,
नपुंसकों के बीच में,
मर्दानगी बघार दे,
राष्ट्र के लिए जीएं,
मारें राष्ट्र के लिए,
ये भावना तू मन में धर,
रवि सा तू प्रखर संवर,
वो सुबह फिर से आएगी,
ये भूमि खिलखिलाएगी,
कलियुग का ये प्रमाण है,
शक्ति ही विद्दमान है,
कुटुंब को परे हटा,
ये मातृभु पुकारती,
जो सींचे खून से इसे,
ये उसको ही दुलारती..

Sunday, May 16, 2010

तबीयत से पत्थर तो उछालो.

हम भारतीय भी विचित्र प्राणी हैं हमारी हार को तो हम बर्दाश्त नही कर सकते लेकिन जब हार जाते है और हमारा चिर प्रतिदंद्दी मैदान मे होता है तो हम उसके जीतने की भी दुआ करते हैं. है न अजीब? आखिर हो भी क्यों न, हम है ही विभिन्नता में अपना पन ढूंढने वाले लोग.इसका सबसे बड़ा उदाहरण इन आईपीएल मैचों के दौरान देखने को मिला जब हमारी टीम सेमीफाइनल में भी नही पहुंच पाई लेकिन भारतीयों की रगों में बहने वाले खून को जला देने वाली टीम पाकिस्तान का मुकाबला जब आस्ट्रेलिया से होता है तो हम अपनी उंगलियों को क्रास करके बैठ जाते हैं और हवाला देते है कि हम नही तो हमारे द्वीप की टीम ही सही. इस तरह की भावना किसी छोटी मानसिकता वाले व्यक्ति के दिमाग में आ ही नही सकती. खैर कई बार कुंठाओं से भी भरे होते हैं.जैसे ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला जब इंग्लैंड से होता है तो भारतीय इंग्लैंड की जीत की आस लगाता है.दिलचस्प है भारतीय मानसिकता. ऑस्ट्रेलिया की हार उसके विश्व विजेता की छवि को धूमिल करेगी इसलिए इंग्लैंड को जीतना चाहिए.200 सालों की गुलामी को हम अचानक भुला बैठते हैं.दरअसल हमारी भावनाओं पर हमारा अंकुश नही रहता.अपने विचार को निरंतर बदलना आदत बन चुकी है.दरअसल हमारी मानसिकता कुछ अन्य लोग निर्धारित करते हैं.मीडिया द्वारा वाहवाही पर ढोल पीटे जाते हैं और उसकी मुखालफत पर हम जूतों का हार भी तैयार करते हैं. एक निश्चित और निर्धारित सोच का अभाव हमारे अंदर निरंतर नज़र आता है.बहानेबाजी के आसरे सहूलियतों को पा लेना ही एकमात्र उद्देश्य हो गया है.इस बहानेबाजी और असमान सोच को भली भांति जानते हुए भी जोखिम उठाना समझदारी से समझौता है.खैर विश्वभर को अपनी बादशाहत के तले दबाने वाले अंग्रेजों की एक और जीत पर बेशक खुशी मनाई जाए लेकिन ये खुशी संतुष्टि है न की हर्ष का विषय.संतुष्टि इसलिए क्योंकि ऑस्ट्रलिया की टीम हार गई. टीम वर्क ने इंग्लैंड को पहला वर्ल्ड कप तो दिला दिया लेकिन ये संकेत है सत्ता परिवर्तन का.इसलिए भारतीयों को मजबूत होकर अपनी जीत की इच्छा ही करनी चाहिए.सिर्फ बयानबाज़ी इस इच्छा की पूर्ति नही करेगी.

Saturday, May 15, 2010

ganga behti ho kyon ..bhupen hazarika ভূপেন হাজৰিকা

कौन हो तुम?

हम तो चले थे बडे इतराके,

लेकिन हमें क्या पता था,

इस दुनिया में सभी,अपनी ऐंठ में जीते है,

माँ के कहने पर बचकर तो चले थे इस दलदल से,

मगर इसी में देखा एक खिला कमल,

सोचा पा लिया जाए उसे,

मगर वो निकला,

कबीर की माया ठगनी,

सोचा बदला जाए,

इस दुनिया को,लेकिन आज मैं पूछता हुँ,

कौन हो तुम,क्या नाम है तुम्हारा,

क्या हम पहले मिले हैं कहीं,

अब समझ आ गया,यही दुनिया का सच है.

थोड़ा डिपलोमेटिक हो जाएं.

आज ऐसा लगा जैसे कोई छुट गया,
हाथ का खिलौना,हाथ में ही टुट गया,
चले थे नई इबारत लिखने,
लेकिन दुनिया बडी बेगैरत निकली,
टाँग खिंचकर नीचे गिरा दिया,
हाथ बढाया था कि,
कोई शायद पकडेगा,
पकड़ा तो था मगर काट दिया गया,
हाथ कटते भी दुख नही हुआ,
सोचा कोई सहारा बनेगा,
लेकिन जिसे साथी बनाया,
वही धोखेबाज़ निकला अब समझ आया कि,
साहब थोडा डिपलोमेटिक होते,
तो ज्यादा तरक्की कर पाते,
कटा हाथ लिए नही घुमते,
हाथ बचाने का फन सीख जाते कोशिश करुँगा थोडा,
डिपलोमेटिक हो जाऊँ,
क्योंकि मैं भी बड़ा आदमी बनना चाहता हुँ।
आशा है बन पाऊँ...

बस ही जीती थी....

दिल्ली के सबसे खूबसूरत और साफ सुथरे इलाके दिल्ली छावनी की साफ सुथरी सड़क के बगल से रेलवे लाइन से गुजरती हुई ट्रेन की रफ्तार मेरी बस की रफ्तार से कम प्रतीत हो रही थी.अचानक स्टैंड आया और बस धीमी हो गई.वहीं दूसरी तरफ ट्रेन आगे निकल गई.दरअसल ये आगे पीछे का खेल निरंतर यूँ ही चलता रहता है.अगर अपने सफर मे रुके तो यूहीं पीछे हो जाओगे यही संदेश उस दिन मुझे वो ट्रेन दे गई.लेकिन उस बस की धीमी गति होने के कारणों पर भी नज़र डाली जाए तो इसमें बस की सामाजिक भावना को नज़रअंदाज नही किया जा सकता.दरअसल बस धीमी हुई थी इंतजार में खड़े उन लोगों के लिए जो कई लोगों को निरंतर चलते रहने के लिए प्रेरित करते है.बस धीमी हुई थी उन लोगों के लिए जो समय से अपने गंतव्य तक पहुँचना चाहते हैं.तो मन में विचार आया कि क्या सही में वो बस हार गई थी उस अकडू ट्रेन से.मन में सवाल घुमाया तो पाया कि इस रेस में जीत ट्रेन की नही बल्कि उस बस की हुई है जो धीमी तो हुई मगर समाज को साथ लेने के लिए.ये जीत थी उन स्वार्थी तत्वों पर जो खालिस अकेले की जीत को ही अंतिम विजय मान लेते हैं.थोड़ा रुककर समाज को साथ लेकर चलना अगर हार है तो मैं ऐसी हार को स्वीकारता हुँ.अगर आज के नजरिए से देखा जाए तो ट्रेन हारी नही,लेकिन मेरे नजरिए के सोचा जाए तो बस ही जीती थी..