
राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पूर्व प्रमुख कुप्हल्ली सीतारमैया सुदर्शन के सोनिया संबंधी बयान से कांग्रेस तिलमिलाई घूम रही है उसके कार्यकर्ताओं के हिंसक विरोध ने ये साबित कर दिया कि हिंसा कांग्रेस के खून में कूट कूट कर भरी हुई है। एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी होने के नाते काग्रेंस के सिपहसालारों को सुदर्शन की टिप्पणी का जवाब शालीन अंदाज में देना चाहिए था लेकिन संघ कार्यालय पर हिंसात्मक प्रदर्शन करके कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अपनी उदंडता का ही परिचय दिया है। दरअसल कुछ समय से कांग्रेस लगातार देश की जनता के हमले से जूझ रही है। उस पर लगने वाले घोटालों के आरोपों ने जनता के सामने उसकी लोकप्रियता को एक करारा झटका दिया है। कामनवेल्थ घोटाले,आदर्श सोसाईटी घोटाला,और अरबों रुपयों के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने कांग्रेस की कलई खोल के ऱख दी है। इन घोटालों ने राजीव गाँधी के समय हुए बोफोर्स घोटाले को याद दिला दिया। कांग्रेस की साख पर उस समय भी ऐसा ही बट्टा लगा था जैसा आलम आज नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि लगातार घोटालों में नाम आने के कारण कांग्रेस अपना मानसिक संतुलन खो चुकी है। ये सर्वविदित है कि 10 नवंबर को संघ के राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन से कांग्रेस बुरी तरह घबराई हुई है उसे डर है कि एक तरफ तो राजनीतिक तौर पर उसका विरोध हो ही रहा है उसके साथ दुनिया के सबसे बड़े जनसंगठन ने भी सड़को पर उतर कर उसका विरोध किया है। दरअसल कांग्रेस इस बात को भली भांति जानती है कि संघ का सडकों पर उतरना कांग्रेस के लिए बडा खतरा हो सकता है।
खैर कांग्रेसियों के संघ विरोध ने ये साबित कर दिया है कि कांग्रेसियों के लिए राष्ट्र से बड़ा ओहदा सोनिया गाँधी का है। क्योंकि राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में लिप्त राष्ट्रविरोधियों के खिलाफ न तो काग्रेंसी नेताओ ने कुछ किया और न ही काग्रेंस के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतर कर किसी भी तरह का कोई विरोध प्रदर्शन किया। अरुंधति राय का कश्मीर को भारत से अलग करने संबंधी बयान हो या अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी का भारत की राजधानी दिल्ली में देशविरोधी बयान हो। त्रासदी तो तब हो गई जब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री औऱ काग्रेंस के महासचिव राहुल गाँधी के जिगरी दोस्त उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर को भारत का अंग मानने के मामले में दोबारा विचार करने की बात कह डाली। गौर करने लायक बात ये भी है कि तथाकथित युवराज और काग्रेंस महासचिव राहुल गाँधी को जहाँ उतावालपन दिखाना चाहिए था वहाँ नही दिखाया जहाँ उन्हें बेहद संजीदगी से काम लेना चाहिए था वहाँ उन्होने उतावलापन दिखाकर खुद का मखौल ही उडवाया है। संघ को बिना समझे विवादास्पद टिप्पणी देना और उसकी तुलना राष्ट्रविरोधियों से करना देश की जनता की नजरों में अपराध है जो कि अक्षमय है लेकिन राहुल गाँधी का घमंड देखिए कि उनके मन में जरा भी प्रायश्चित का भाव नही है। राहुल ने ये उस प्रदेश में किया जहाँ उन्हें राजकीय अतिथि का ओहदा मिला था और उस प्रदेश का मुख्यमंत्री स्वंयसेवक भी है। बहरहाल संघ से कांग्रेस की तुलना करना संघ का अपमान है।संघ अपने आप में परिपूर्ण संगठन है और काग्रेंस 125 साल की बूढी होने के बाद भी बचकाना हरकतें कर रही है। खैर काग्रेसियों की ये पुरानी परंपरा रही है कि पहले तो बिना सोचे समझे बोलते हैं उसके बाद उसके छुटभईये नेता सफाई देते फिरते हैं। कुछ ऐसा ही वाकया गृहमंत्री पी.चिदंबरम के भगवा आतंकवाद संबंधी बयान के बाद भी पेश आया जब काग्रेंस ने पी. चिदंबरम के बयान से खुद को अलग कर लिया। कांग्रेस के शासन काल में लगातार जिस तरह के विवाद रहे हैं उसने देश की साख को मिट्टी मे ही मिलाया है और अंतराष्ट्रीय पटल पर भारत को एक कमजोर नितियों वाला देश साबित किया है। काग्रेंस के शासन काल में ही बोफोर्स का दोषी इटालियन क्वात्रोकी देश से आराम से बाहर चला जाता है ,वहीं भोपाल गैस कांड के दोषी वारेन एंडरसन को इज्जत से सरकारी खर्चे से भारत से बाहर ले जाया जाता है। दरअसल कांग्रेस को चलाने की जिम्मेदारी उन हाथों में है जो ये कहा करती थी कि मैं राजनीति में नही आऊंगी बेशक मुझे अपने बच्चों को भीख मांग कर खिलाना पड़े। मैं बात कर रहा हूँ सोनिया गाँधी की। अगर शक है तो सोनिया का विकिपीडिया खोल के देखा जा सकता है। राजनीति के प्रति इस तरह का भाव रखने वाली महिला को 1997 में कांग्रेस की प्राथमिकता दी जाती है और उसके 62 दिनों के अंदर काग्रेंस की अध्यक्ष भी बना दिया जाता है। भई वाह ये तो सिर्फ कांग्रेस में ही संभव है जहाँ देश या पार्टी का संविधान नही, परिवारवाद बडा होता है। आप सोचेंगे कि मैं विषय से भटक रहा हूँ लेकिन नही मैं उस काग्रेंस के हाल बयां कर रहा जिसे अपने नाम के आगे राष्ट्रीय या नेशनल लगाने का कोई अधिकार नही है क्योंकि राष्ट्र जैसी कोई भी भावना उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं में नही है। देश की संपति को नुक्सान पहुंचा कर सोनिया अर्चना करना आखिर कहाँ तक जायज है ? गौर करने की बात ये भी है कि आखिर बार बार क्या बात है कि सोनिया की भारतीय नागरिकता या भारतीयता पर प्रश्न चिह्न लगते रहते हैं खैर ये तो जाँच का विषय है लेकिन सवाल ये है कि जाँच के आदेश देगा कौन? भाजपा का वो जनाधार है नही कि वो सरकार बना पाए न ही उसके पास कोई ऐसा चेहरा है जो जननेता बन पाएगा। भाजपा ने भी जिस तरह से सुदर्शन जी का साथ छोडा है वो भी निंदनीय है अपनी साख पर बट्टा न लगे इसके लिए डरपोक भाजपाईयों ने खुद को सुदर्शन जी से अलग कर लिया। वैसे सोनिया पर इस तरह के आरोप पहली बार नही लगे विभिन्न बुद्धिजीवी भी सोनिया गाँधी की राष्ट्रीयता को लेकर प्रश्नचिह्न लगा चुके हैं। डाक्टर सुबह्रमणय्म स्वामी पिछले 10 से 12 साल से लगातार कांग्रेस औऱ सोनिया गांधी की भूमिका पर शोध कर रहे हैं उन्होनें जो तथ्य जुटाए हैं वो वाक्ये में सराहनीय है। मौका मिले तो इस लिंक पर देखा जा सकता है। http://www.youtube.com/watch?v=SidLY-nSqvA) ।खैर इस सब में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जो उतावलापन दिखाया है उससे कहीं न कहीं देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की साख पर बट्टा तो लग ही गया है।
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