एक अर्से से जीबी रोड पर
काम करने वाली शीला 3 साल के बच्चे की मां है। ब्वॉयफ्रेंड ने धोखा दिया और अब
शीला ही बच्चे की परवरिश कर रही है। बोलती है कि मेरा बेटा बड़ा आदमी बनेगा। बहुत
पढ़ाना चाहती है उसे। लेकिन एक डर उसके मन में अचानक कोंध जाता है। पूछती है कि
बिना बाप के नाम के आखिर कैसे दुनिया में नाम कर पाएगा? स्कूल में पिता का नाम, नौकरी में पिता का
नाम और जहां देखो पहले पूछते हैं “पिता का नाम क्या है”। सवाल उठाती है, क्या उस भगोड़े पिता का नाम लिखवाऊं, जिसने जिम्मेदारियों
के डर से मुंह चुरा लिया? समाज को आईना दिखाता हुआ एक सवाल भी जड़ देती है, इस तथाकथित सभ्य समाज में
कौन अपनाएगा मेरे बेटे को? कौन धंधेवाली की औलाद को नाम देगा? इस झकझोर देने वाले सवाल से थोड़ा और आगे
बढ़कर सोचें तो हजारों यौनकर्मियों की संताने बिना पिता के नाम के जीवन व्यतीत कर
रही है। मानो मां का तो कोई अस्तित्व ही नही पिता के बिना?
पितृसत्तात्मक और
पुरूषवादी मानसिकता से परे देश की न्यायिक व्यवस्था की ओर झांकती कुछ निगाहें एक
उम्मीद की किरण लेकर आई। इस महीने के पहले सप्ताह में आए माननीय उच्चतम न्यायालय
के निर्णय की मानें तो बिना शादी किए मां बनी महिला को अब अपने बच्चे का मुख्य
अभिभावक बनने का अधिकार मिलेगा। जस्टिस विक्रमजीत सेन और ए.एम. सप्रे की बेंच ने
सिर्फ पुरातनपंथी और गैर जरूरी व्यवस्था को ही नही नकारा बल्कि उन्होंने सैकड़ों
बिन ब्याही और अकेली रह रही माओं को अपने बच्चे की मुख्य अभिभावक बनने का रास्ता
साफ किया। यौनकर्मियों के अधिकारों और उनके सम्मान के लिए काम करने वाले संगठन ऑल
इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स के मुख्य सलाहकार स्मरजीत जाना की मानें तो देश
में तकरीबन 30 लाख से ज्यादा संख्या में
यौनकर्मियां हैं जिसमें से हजारों यौनकर्मियों को अपने बच्चे के पिता की पहचान को
लेकर लगातार संघर्ष करने पड़ रहे हैं।
65 हजार से ज्यादा
यौनकर्मियों के संगठन दुर्बार महिला समन्वय कमिटी के संघर्ष ने इस दिशा में एक नई
इबारत पिछले 10 साल पहले ही लिख दी। दुर्बार की सचिव भारती डे बताती हैं कि एक दशक
पहले ही यौनकर्मियों ने अपनी संघर्ष की बदौलत पश्चिम बंगाल में इस अधिकार को हासिल
किया। वो अपना उदाहरण पेश करते हुए बताती हैं कि एक दशक पहले जब वो अपने बच्चों का
एडमिशन स्कूल में कराने गई तो उनसे उनके पति का नाम जाहिर करने की बात कही गई। मां
की पहचान के संघर्ष की शुरूआत वहीं से हुई। यौनकर्मियों ने शिक्षा मंत्री से मिलकर
ये सुनिश्चित करवाया कि मां भी बच्चे की मुख्य अभिभावक हो सकती है।
हर बच्चे का हक है कि
उसे जिम्मेदार आसरा मिले। उसके विकास के लिए अनुकूल माहौल के साथ बच्चे को
सम्मानपूर्वक जीवन जीने का हक मिले। एक बड़े समूह के तौर पर देखें तो यौनकर्मियों
के बच्चे बड़ी संख्या में इस सुविधा से वंचित हैं और सामाजिक और प्रशासनिक
व्यवस्था कई मायनों में उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। दरअसल बिना ब्याही या
अकेले अपना जीवन यापन कर रही मां के लिए सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला महिला के
सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक सराहनीय कदम तो है ही इसके साथ ही संविधान की
कुछ धाराओं पर पुन: विचार करने के लिए एक सुधारवादी परिचर्चा या बहस की ओर भी इशारा करता है। जिम्मेदारी
सिर्फ यहीं खत्म नही हो जाती बल्कि यहां से शुरू होती है कि इस दिशा में समाज के
हर वर्ग को महिलाओं की स्वस्थ समाज के लिए भागीदारी और उसकी सामाजिक स्थिति को
सदृढ करने की दिशा में और क्या प्रयास किए जा सकते हैं।
बच्चों और महिलाओं के
प्रति समाज की सोच में कोई 2 मिनट मेगी सरीखे क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा रखना
व्यर्थ होगा लेकिन हमें ऐसी आशा है कि धीरे धीरे ही सही मगर सही दिशा में बदलाव
होगा या हो रहा है। महिलाओं के आंदोलन, उनके संघर्ष और समाज के प्रति उनकी
भागीदारी को पहचान देना उतना ही जरूरी है जितना रोटी, कपड़ा, मकान और संतुलित
स्वास्थ्य। न्यायिक प्रणाली तो अपना काम कर ही रही है उसके साथ राजनीतिक औऱ
सामाजिक स्तर पर भी औरत के हक और पहचान के लिए बुलंद आवाज़ की जरूरत है। इस दिशा
में हम जेडीयू के अध्यक्ष श्री शरद यादव के संसद के आगामी मानसून सत्र में महिला
के मुख्य अभिभावक संबंधी प्राइवेट बिल लाने की घोषणा का भी बेहद स्वागत करते हैं
और उनसे अपील भी करते हैं कि वो महिलाओं के विभिन्न समूहों को चर्चा के लिए
आमंत्रित करें ताकि उनके प्रयास को सामूहिक समर्थन मिल सके। ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ
सेक्स वर्कर्स की अध्यक्ष कुसुम के अनुसार बहुत जल्द यौनकर्मियों का एक
प्रतिनिधिमंडल श्री शरद यादव से मिलकर अपने सुझावों की एक प्रति उन्हें सौंपेगा।
बेशक सिर्फ न्यायालय के
फैसले से व्यवस्था की सोच में बदलाव नही आएगा, मगर सुप्रीम कोर्ट ने बदबूदार
व्यवस्था से भरे रास्ते को साफ करने की दिशा में एक सराहनीय कदम तो उठा ही दिया
है। हमें स्वागत करना चाहिए और संघर्ष को और तेज़ करना चाहिए ताकि हम संविधान की
मुख्य अवधारणा के अनुरूप समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना
कर पाएं।
