Friday, July 17, 2015

यौनकर्मी मां को नई दिशा देता सुप्रीम कोर्ट का फैसला

एक अर्से से जीबी रोड पर काम करने वाली शीला 3 साल के बच्चे की मां है। ब्वॉयफ्रेंड ने धोखा दिया और अब शीला ही बच्चे की परवरिश कर रही है। बोलती है कि मेरा बेटा बड़ा आदमी बनेगा। बहुत पढ़ाना चाहती है उसे। लेकिन एक डर उसके मन में अचानक कोंध जाता है। पूछती है कि बिना बाप के नाम के आखिर कैसे दुनिया में नाम कर पाएगा? स्कूल में पिता का नाम, नौकरी में पिता का नाम और जहां देखो पहले पूछते हैं पिता का नाम क्या है। सवाल उठाती है, क्या उस भगोड़े पिता का नाम लिखवाऊं, जिसने जिम्मेदारियों के डर से मुंह चुरा लिया? समाज को आईना दिखाता हुआ एक सवाल भी जड़ देती है, इस तथाकथित सभ्य समाज में कौन अपनाएगा मेरे बेटे को? कौन धंधेवाली की औलाद को नाम देगा? इस झकझोर देने वाले सवाल से थोड़ा और आगे बढ़कर सोचें तो हजारों यौनकर्मियों की संताने बिना पिता के नाम के जीवन व्यतीत कर रही है। मानो मां का तो कोई अस्तित्व ही नही पिता के बिना?

पितृसत्तात्मक और पुरूषवादी मानसिकता से परे देश की न्यायिक व्यवस्था की ओर झांकती कुछ निगाहें एक उम्मीद की किरण लेकर आई। इस महीने के पहले सप्ताह में आए माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय की मानें तो बिना शादी किए मां बनी महिला को अब अपने बच्चे का मुख्य अभिभावक बनने का अधिकार मिलेगा। जस्टिस विक्रमजीत सेन और ए.एम. सप्रे की बेंच ने सिर्फ पुरातनपंथी और गैर जरूरी व्यवस्था को ही नही नकारा बल्कि उन्होंने सैकड़ों बिन ब्याही और अकेली रह रही माओं को अपने बच्चे की मुख्य अभिभावक बनने का रास्ता साफ किया। यौनकर्मियों के अधिकारों और उनके सम्मान के लिए काम करने वाले संगठन ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स के मुख्य सलाहकार स्मरजीत जाना की मानें तो देश में तकरीबन 30 लाख से ज्यादा संख्या में यौनकर्मियां हैं जिसमें से हजारों यौनकर्मियों को अपने बच्चे के पिता की पहचान को लेकर लगातार संघर्ष करने पड़ रहे हैं।

65 हजार से ज्यादा यौनकर्मियों के संगठन दुर्बार महिला समन्वय कमिटी के संघर्ष ने इस दिशा में एक नई इबारत पिछले 10 साल पहले ही लिख दी। दुर्बार की सचिव भारती डे बताती हैं कि एक दशक पहले ही यौनकर्मियों ने अपनी संघर्ष की बदौलत पश्चिम बंगाल में इस अधिकार को हासिल किया। वो अपना उदाहरण पेश करते हुए बताती हैं कि एक दशक पहले जब वो अपने बच्चों का एडमिशन स्कूल में कराने गई तो उनसे उनके पति का नाम जाहिर करने की बात कही गई। मां की पहचान के संघर्ष की शुरूआत वहीं से हुई। यौनकर्मियों ने शिक्षा मंत्री से मिलकर ये सुनिश्चित करवाया कि मां भी बच्चे की मुख्य अभिभावक हो सकती है।

हर बच्चे का हक है कि उसे जिम्मेदार आसरा मिले। उसके विकास के लिए अनुकूल माहौल के साथ बच्चे को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का हक मिले। एक बड़े समूह के तौर पर देखें तो यौनकर्मियों के बच्चे बड़ी संख्या में इस सुविधा से वंचित हैं और सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था कई मायनों में उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। दरअसल बिना ब्याही या अकेले अपना जीवन यापन कर रही मां के लिए सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला महिला के सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया एक सराहनीय कदम तो है ही इसके साथ ही संविधान की कुछ धाराओं पर पुन: विचार करने के लिए एक सुधारवादी परिचर्चा या बहस की ओर भी इशारा करता है। जिम्मेदारी सिर्फ यहीं खत्म नही हो जाती बल्कि यहां से शुरू होती है कि इस दिशा में समाज के हर वर्ग को महिलाओं की स्वस्थ समाज के लिए भागीदारी और उसकी सामाजिक स्थिति को सदृढ करने की दिशा में और क्या प्रयास किए जा सकते हैं।

बच्चों और महिलाओं के प्रति समाज की सोच में कोई 2 मिनट मेगी सरीखे क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा रखना व्यर्थ होगा लेकिन हमें ऐसी आशा है कि धीरे धीरे ही सही मगर सही दिशा में बदलाव होगा या हो रहा है। महिलाओं के आंदोलन, उनके संघर्ष और समाज के प्रति उनकी भागीदारी को पहचान देना उतना ही जरूरी है जितना रोटी, कपड़ा, मकान और संतुलित स्वास्थ्य। न्यायिक प्रणाली तो अपना काम कर ही रही है उसके साथ राजनीतिक औऱ सामाजिक स्तर पर भी औरत के हक और पहचान के लिए बुलंद आवाज़ की जरूरत है। इस दिशा में हम जेडीयू के अध्यक्ष श्री शरद यादव के संसद के आगामी मानसून सत्र में महिला के मुख्य अभिभावक संबंधी प्राइवेट बिल लाने की घोषणा का भी बेहद स्वागत करते हैं और उनसे अपील भी करते हैं कि वो महिलाओं के विभिन्न समूहों को चर्चा के लिए आमंत्रित करें ताकि उनके प्रयास को सामूहिक समर्थन मिल सके। ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स की अध्यक्ष कुसुम के अनुसार बहुत जल्द यौनकर्मियों का एक प्रतिनिधिमंडल श्री शरद यादव से मिलकर अपने सुझावों की एक प्रति उन्हें सौंपेगा।


बेशक सिर्फ न्यायालय के फैसले से व्यवस्था की सोच में बदलाव नही आएगा, मगर सुप्रीम कोर्ट ने बदबूदार व्यवस्था से भरे रास्ते को साफ करने की दिशा में एक सराहनीय कदम तो उठा ही दिया है। हमें स्वागत करना चाहिए और संघर्ष को और तेज़ करना चाहिए ताकि हम संविधान की मुख्य अवधारणा के अनुरूप समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना कर पाएं। 

Tuesday, July 1, 2014

रात की संतानें पलती है जहाँ

बिपासा ने अपनी नन्ही उंगलियों से मेरा हाथ थामा। ठीक से मेरी उंगलियाँ तक भी नही पकड़ पा रही थी। भईया आओ हमारा खाना कहाँ बनता है दिखाती हूँ आपको। पिपासा जैसी और भी नन्ही परियाँ थी वहाँ। पीछे से मनीष आया भईया चलो आपकी चाय वहाँ रखी है। सभी बच्चे मुझे ले जाने लगे। आप यहीँ रुकोगे ना आज”? मनीष ने बड़े स्नेह के साथ पूछा। बड़ी आशाएं थी उसकी आँखों में, बड़े आदरभाव से उसने पूछा। शाम की ट्रेन से दिल्ली ना लौटना होता तो वक्त जरुर बिताता उन बच्चों के बीच जिन्हें लोग कहते हैं कि इनकी माँ धंधा करती है। मैं इन्हें कहता हूँ अंधेरें में उजाले की किरण।

बहुत जल्दी घुल मिल गया था मैं इन बच्चों के साथ। नन्हे मनीष के मन में लालच आया, बोला भईया आज यहीं रुक जाओ फुटबाल खेलेंगे, टीवीs देखेंगे, तालाब में भी नहाऐंगे। बचपन का लालच तो ऐसा ही होता है। खैर मनीष ने अभी भी मेरा हाथ थामा हुआ था, मानो कहीं चला जाऊंगा उन्हें छोड़कर, कभी ना आने के लिए। बारुईपुर स्थित राहुल विद्या निकेतन, पश्चिम बंगाल के साउथ 24 परगना का वो स्थान जहाँ रात की संताने पलती हैं, अंधेरे पर विजय पाने के लिए। अपने सपनों को साकार करने के लिए। दुर्बार महिला समन्वय कमिटी, जोकि यौनकर्मियों द्वारा संचालित यौनकर्मियों का सबसे बड़ा संगठन है वही निकेतन को भी संचालित करता है। विशाल क्षेत्र में फैला हुआ राहुल विद्या निकेतन, लेकिन एकदम व्यवस्थित। हॉस्टल, टीवी रुम, किचन, बड़े से ग्राऊंड में दुर्बार स्पोर्ट्स एकेडमी, खेत, हरियाली और दो तालाब। मनीष ने कहा कि एक तालाब में लड़के नहाते हैं और एक तालाब में लड़कियाँ। हालांकि नहाने का उचित प्रबंध है लेकिन फिर भी तालाब को नज़र अंदाज नही किया गया। शहर की धूल धक्कड़ और तथाकथित सभ्य समाज की हीन नज़रों से दूर ये बच्चे प्रकृति की गोद में ढेरों सपनों को पूरा करने के लिए हर पल जागने और जगाने के लिए संघर्षशील हैं। बेहतर से बेहतर गाइड भी उन बच्चों के सामने पानी भरे, अगर इनकी निकेतन के बारे में जानकारी को परख ले तो। बाहर से आने वाले लोगों को ये बच्चे निकेतन के हर कौने से कुछ इस तरह रुबरु करवाते हैं मानों निकेतन के हर कौने से इन्होंने बात की हो। मैं दावे से कह सकता हूँ कि आपको संदेह हो जाएगा कि आप इस छल कपट से दूर दुनिया को महज़ कुछ घंटो से जानते हैं।  
धीमान की उम्र कोई 14 साल होगी। फुटबाल से नही खेलता ये बच्चा बल्कि फुटबाल के साथ खेलता है। गारंटी देता हूँ जब तक इसके पास फुटबाल रहेगी आपकी आंखें भी फुटबाल पर टिकी रहेंगी। वैसे तो भारत में फुटबाल को काफी हल्के में लिया जाता है मगर धीमान फुटबॉलर बनना चाहता है। टीवी वाले कमरे में फुटबॉल विश्वकप का पूरा विवरण, फुटबॉल के सितारों के साथ लगा है। धीमान ने तान दिया मुझपर एक सवाल। बताइए कौन जितेगा इस बार? मैंने कहा जर्मनी। इतना कहना भर था कि उसने तो ब्राजील को विजेता बनाते हुए उसके प्लेयर्स के नाम तक गिनवा दिए। उनकी परफोर्मेंस पर बात शुरु कर दी। मौन ही था मैं। सही सोचा था मैनें, ये बच्चा फुटबॉल के साथ खेलता है। ये जानकर और ज्यादा खुशी हुई कि निकेतन के ग्राउंड में खेलते-खेलते यहाँ के बच्चे अपनी मेहनत के आसरे होमलेस फुटबॉल लीग में भारत का विदेशों में प्रतिनिधित्व तक कर आए हैं। मैनचेस्टर क्लब तक में ट्रेनिंग ले रहे हैं यहाँ के नौनिहाल। स्लम शॉकर खेलने के लिए भारत का भ्रमण कर रहे हैं। कोई पुलिस अधिकारी, तो कोई डांसर, कोई मेरी तरह सोशल वर्कर तो कोई टीवी और फिल्म में एक्टिंग करना चाहता है। ढेरों आशाएं और आकांक्षाएं पाले ये बच्चे मुस्कुराहट के साथ आपसे दिल लगा बैठेंगे।
निकेतन के केयरटेकर सुशांतो जी बताते हैं कि दिनचर्या की शुरुआत प्रार्थना से होती है और इन 48   बच्चों को सही वक्त पर भोजन मिले इसकी जिम्मेदारी का एहसास यहाँ काम करने वाली महिलाओं को अच्छी तरह से है। वक्त पर बच्चों को स्कूल भेजना, उनकी देखभाल करना और उनके बचपने को संभाल कर रखने में, यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों का विशेष योगदान है। माँ का स्नेह और उसकी ममता तो निश्चित तौर पर माँ ही दे सकती है मगर उस प्रयास में कमी नही छोड़ी जाती जिससे बच्चों को माँ की कमी महसूस हो। जब भी बच्चे चाहते हैं माँ के पास जाते हैं और माँ को भी ये अधिकार है कि वो दुलार के लिए बच्चों को गले लगाए। समय-समय पर विशेष कैंपों के माध्यम से प्रतिभा उन्नयन के कार्यक्रम की जानकारी भी इन बच्चों के साथ साझा की जाती है। मैं नही भूल सकता उस संगठन को जोकि इन बच्चों को साथ लेकर इन्हें एक पहचान दिलवाने के लिए प्रयासरत है। आमरा पदातिक’, ये संगठन भी यौनकर्मियों के बच्चों द्वारा ही संचालित होता है। कह सकते हैं कि बच्चों में सांगठनिक भाव का जन्म हो और उनमें नेतृत्व क्षमता का विकास हो इसके लिए आमरा पदातिक प्रशंसनीय कार्य कर रहा है। बच्चे की प्रतिभा को पहचान कर उसे निखारने का दायित्व दुर्बार से जुड़े अनेक संगठनों के माध्यम से निरंतर जारी है। राहुल विद्या निकेतन उस स्थिति के लिए भी तैयार है जब किसी बच्चे के साथ कोई दुर्भावनापूर्ण व्यवहार हो। आमरा पदातिक के जिम्मेदार कार्यकर्ताओं का एक ग्रुप है जो इस पर नज़र रखता है। हालांकि वो बात अलग है कि पिछले 12 सालों में निकेतन के आदर्श इतने खोखले नही हुए कि यहाँ किसी भी तरह के उत्पीड़न का मामला सामने आया हो। बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा, आधुनिक शिक्षा प्रणाली का ज्ञान, खेल में पारंगत होने के गुर सिखाने की जिम्मेदारी अनुभवी मार्गदर्शकों पर है। कुछ दानादाता भी इन बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए अपनी चिंताएं व्यक्त करते हैं और अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ सहयोग भी करते हैं।
नाज़ायज नही होते ये नौनिहाल पर फिर भी समाज की सोच का दायरा इन्हें नाज़ायज की श्रेणी में डाल देता है। इन बच्चों के जीवन में सुधार और समान अवसर उपलब्ध कराने के प्रयासों में राजनीतिक इच्छाशक्ति भी कमज़ोर साबित हुई है। खैर इस बात को नज़रअंदाज नही किया जा सकता कि देश में योजनाएं वोट प्रतिशत को देखकर बनती हैं। निश्चित तौर पर राहुल विद्या निकेतन और दुर्बार जैसी संस्थाएं प्रशंसा की पात्र हैं मगर जरुरत आशाओं और आकांक्षाओं से भरे निकेतन के भीतर के संसार को निष्पक्ष भाव से समझने की भी है। आखिर क्यों घर का पता सोनागाछी हो तो विद्यालय प्रशासन की नज़रे हीन हो जाती है? सामाजिक व्यवस्थाओं की त्रासदी देखिए कि यौनकर्मी की कोख से पैदा होने वाला बच्चा स्वत: ही दलाल हो जाता है। क्या कभी किसी सरकारी अधिकारी ने ये जानने का प्रयास किया कि क्यों रेड लाइट इलाकों में स्कूल ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या में इज़ाफा हो रहा है? एक अलग ही संप्रदाय में विभाजित कर दिया जाता है यौनकर्मी के पूरे परिवेश को, उसके परिवार को। बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक विकास पर खर्च होने वाला फंड कागज़ों के आंकड़ों में ही खत्म हो जाता है। आखिर क्यों जरुरत पड़ती है इन बच्चों को अपना पता बदलकर किसी निकेतन का पता देने की? ऐसे कई सवाल राहुल विद्या निकेतन हम सबसे पूछता है, जिसके पास जवाब हो एक नई क्रांति की शुरुआत कर सकता है।

Thursday, May 1, 2014

आज़ाद भारत का साल, फिर लौटा।

ज्योतिष के ज्ञान से परे अगर आशाओं, आकांक्षाओं और विश्वास के आधार पर कुछ निर्णय लिए जाए तो वो कई फैसलों पर भारी साबित हो सकते हैं। बेशक उनमें सत्यता और तर्कों का आधार कम हो लेकिन फिर भी विश्वास कई बार सकारात्मक परिणामों के आधार पर और मजबूत होता जाता है। कुछ ऐसा ही हो रहा है अबके बरस। आज़ादी के साल में चलते हैं। साल की शुरूआत बुधवार से हुई। आशाएं थी कि एक आज़ाद सवेरा इस वर्ष देखने को मिलेगा। आज़ादी की हवा में सांस लेने का मौका मिलेगा। हमारे चुने हुए लोगों की सरकार होगी। 200 साल की गुलामी और जुल्मों का सफर थम जाएगा। हुआ भी वैसा ही, 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में दुनिया के मानचित्र पर अलंकृत हुआ। अब देश के नागरिक कह सकते थे कि हम आज़ाद भारत के नागरिक हैं।
वर्ष 2014 भी कुछ कहता है। ये वर्ष भी साल 1947 की तरह बुधवार से ही शुरु हुआ। यानी आज़ादी वाला साल लौट आया। ये महज़ एक संयोग भर ही हो सकता है कि इस साल देश में आम चुनाव हो रहे हैं। जहाँ देश की सत्ता पर कौन काबिज़ होगा, इसका फैसला देश की जनता कर रही है। संयोग बेशक हो, लेकिन हवाएं बदलाव का बिगुल बजा रही है। बदलाव सत्ता का। व्यवस्था का। राजनीतिक पंडितों के गणितों से लेकर सामाजिक क्षेत्र में विचरण करने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग भी बदलाव का संकेत दे रहे हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानो की आत्महत्याएं, महिलाओं के साथ अपमानजनक कृत्य, देश की असुरक्षित सीमाएं और देश की आर्थिक हालत को लगा मियादी बुखार देश के हर नागरिक को झकझोर रहा है। सवाल सत्ता में बैठे उन लोगों से किए जा रहे हैं जिन्हें बड़े भरोसे के साथ लोगों ने चुना था, ताकि रामराज्य न सही उसके जैसा मॉडल तो देश में कार्यान्वित हो सके। लेकिन जब नतीजा आया तो रावणराज से तुलना भी अतुलनीय लगी। कोयले की कालिख ने कई सफेदपोशों का काला मुंह हो या खेल-खेल में कॉमनमैन की जेब का पैसा हड़पने की कवायद में फंसे मंत्रियों की छुपन छुपाई का खेल हो। ये पब्लिक सब जानती थी और जानती है। इसलिए इस बार परिवर्तन की बयार बह रही है। इस बार का शोर भी नायाब है, जिसमें प्रत्येक आवाज़ साफ साफ कह रही है कि सिर्फ सत्ता परिवर्तन नही व्यवस्था परिवर्तन भी चाहिए।
वर्ष 1947 में सामान्य आदमी खुश था कि हमारे लोगों के द्वारा सत्ता चलेगी। अब कोई हमारे ही बीच का आएगा। बाबू राजेंद्र प्रसाद, नेहरू, पटेल, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, अंबेडकर अपने ही तो थे। जिन्होंने निरंकुश हो चुकी सत्ता को पलटने का प्रयास ही नही किया बल्कि नवभारत के निर्माण की जिम्मेदारी भी अपने मजबूत कंधों पर उठाई। हालात आज भी कुछ ऐसे ही हैं, बल्कि ऐसा लग रहा है कि इतिहास खुद को दोहरा रहा है। आज हमारा प्रतिनिधित्व करने के लिए वो लोग तैयार हैं जो पिछले कई वर्षों से निरंकुश हो चुकी सत्ता के खिलाफ संघर्ष ही नही कर रहे अपितु अब राष्ट्र द्वारा दी गई जिम्मेदारियों को भी अपने कंधों पर लेने के लिए तैयार हैं। ऐसे व्यक्ति आज देश का प्रतिनिधित्व करने के प्रयासों में लगे हैं। दिलचस्प है कि उनके प्रयासों को राष्ट्र सिर्फ सराह ही नही रहा उसके साथ उन प्रयासों में अपने प्रयास भी सम्मिलित कर रहा है ताकि वैभवशाली भारत को पुन: ढूंढा जा सके। खैर मेरा मानना है कि कई बार संयोग भी कुछ इशारे करते हैं। देश की जनता अपने विवेक से इन्हें समझे और व्यवस्था परिवर्तन की एक नई इबारत लिखे जिसमें एक चाय बेचने वाला या बोझा उठाने वाला भी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सके।

Saturday, December 29, 2012

संभल जाओ, संभाल लो। वरना विरोध तो होगा


              राष्ट्रीय पटल अपनी गर्जना करने वाले विषयों की गूंज जब गली मोहल्लों, चौपालों में भी पहुंच जाती है तो समझिए कि मामला अब सचमे राष्ट्रीय हो चला है। महिलाएं घरों के सामने खड़ी होकर या मर्द चौक चौराहों पर खड़े होकर चर्चा करने लगते हैं तो मामला वाक्ये में गंभीरता की तरफ बढ़ जाता है। फिर हम कह सकते हैं कि उस विषय का सरोकार अब समाज के निचले तबके तक भी पहुंच रहा है। एक मजदूर जो कि पूरे दिन रिक्शा खींचता है, साइकिल पर कई किलोमीटर का रास्ता तय करके कारखानों में अपना पसीना बहाने पहुंच जाता है। वो शख्स घर पहुंचकर खाना खाता है और सो जाता है। फिर सुबह उठता है और अपने काम धंधे पर लौट जाता है। उसे नही है परवाह इंडिया गेट पर होने वाले धरने प्रदर्शनों की। एक लड़की की अस्मत लूटती है तो किस तरह के कानून संवैधानिक पटल के आसरे अपने मूर्त रूप में लौट रहे होते हैं उसका सरोकार उसे नही होता। लेकिन जब वही मजदूर किस्म का व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर के विषयों की चर्चा में शामिल होता है तो समझिए मामला गंभीर हो चला है। दिल्ली के गैंगरेप मामले में भी कुछ इसी तरह की चीजें सामने आ रही हैं। मीडिया में आने वाले प्रदर्शन के बाद सत्ता विरोधी और क्रूरता विरोधी आवाज़ अब चौक चौराहों और घर के सामने बैठी महिलाओं में भी होनी शुरू हो चुकी हैं। पीड़िता की मौत ने विरोध के स्वर में गुस्से को और बढ़ा दिया है मानों ये स्थिति इंडिया गेट पर प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज के बाद उठे बवाल से भी कहीं ज्यादा गुस्सैल है। मेरे मायनों में ये गुस्सा दिल्ली के लुटियन ज़ोन में होने वाले विरोधों से भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यहां बात अब मीडिया में आने वाले प्रदर्शनों से हटकर भी होने लगी है। सूदुर गांवो में दौरा कर लीजिए या झुग्गियों में रहने वाले लोगों का हाल जान लीजिए सभी तरफ से एक ही आवाज़ आएगी कि पीड़िता के साथ दुष्कर्म करने वाले लोगों को सरेराह फांसी पर लटका दिया जाए। वहीं बीच में से एक स्वर ये भी उठेगा कि फांसी पर लटकाने से क्या होगा! बलात्कारियों के गुप्तांगों को ही काटकर उन्हें नपुंसक बना देना चाहिए। इस तरह का स्वर हर जगह से उठ रहा है। खैर लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्या सज़ा सही है और क्या गलत ये तो सरकारी नुमाइंदों को सोचना है पर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार ये लोक तो यही चाहता है कि सजा कुछ ऐसी होनी चाहिए कि ब्लात्कारियों को सबक मिले।

                जब बातें सोशल नेटवर्किंग साइट्स से निकलकर सोशल या गूढ़ सामाजिक हो जाएं(गूढ़ इसलिए लिखा क्योंकि सामाजिक होने और गूढ़ सामाजिक होने में यथार्थपरक फर्क है) तो समझ जाना चाहिए कि सत्ता विरोधी लहर अब राशन की दुकान में मापतोल को लेकर लड़ रही महिला तक भी पहुंच चुकी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की दुहाई देकर विरोध प्रदर्शनों के हिंसक प्रदर्शनों को गलत तो ठहराया जा सकता है लेकिन दुष्कर्मियों के विरोध में धमनियों में उबाल मार रहे खून को कैसे शांत किया जा सकता है। चलिए मान लिया जाए अन्नायपूर्ण और लोकअहितकारी इस व्यवस्था का विकल्प अराजक व्यवस्था नही हो सकता, मगर ये कौन देखेगा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था तो खुद ही आईसीयू में अंतिम सांसें गिन रही है। जिस व्यवस्था में लोगों के द्वारा सरकार का चुनाव होता हो वहां लोग ही सुरक्षित नही होंगे तो क्या तो वो लोकहितकारी व्यवस्था रहेगी और क्या ही सामाजिक उत्थान के अपने लक्ष्यों को वो सत्ता पूरा कर पाएगी? ऐसा नही कि बलात्कार पहली बार हुआ हो या उसे मीडिया ने पहली बार प्रमुखता से उठाया हो, वक्त-वक्त पर मीडिया अपनी जागरूकता दिखाता रहता है। समाज में छुपे बर्बर रूप को भी उजागर करता रहता है लेकिन सत्ता के गलियारों से सिर्फ आश्वासनों की राजनीत ही होती है। संपादकों को विशेष बैठकों में बुलाकर सत्ता विरोधी मीडिया प्रकल्पों को भी सरकार शांत कर देती है। लेकिन इस बार मामला जरा गंभीर हो चला है। सरकारी तंत्र सुरक्षित वातावरण देने में असफल रहा है और इसकी भी कोई गारंटी नही है कि आने वाले वक्त में भी हम सुरक्षित रहे पाएंगे। बलात्कार की घटनाएं अभी भी हो रही है। सवाल है आखिर क्यों? दरअसल ये सवाल हमेशा यूहीं सरकारी तंत्र के सामने मुंह बाए खड़ा रहेगा। नही मिल पाएगा इस सवाल का जवाब हमें। अब मामला गैंगरेप का है तो कुछ आरोपियों को पकड़कर जेल में डाल दिया जाएगा। कुछ मामले थानों में आसानी दर्ज हो जाएंगे लेकिन कुछ वक्त बाद क्या होगा, जब वसंत विहार गैंगरेप की चिता का आंच ठंडी हो जाएगी? चलिए आप गैंगरेप बंद कर देंगे, क्या हत्याएं बंद हो जाएंगी? लूट की वारदातों को ग्रहण कब लगेगा? बसों में जेबें कटनी कब बंद होंगी? हमारे नलों में नियमित रूप से पानी कब आएगा? सड़कों के गड्ढे कब भरेंगे? कब बहन-बेटियां रात को 10 बजे बस स्टैंड पर पहुंचने पर अपने भाई को फोन करके नही बुलाएंगी? कब वो स्वावलंबन के साथ अकेली घर लौट पाएंगी?

             सवाल कई हैं। जिन प्रश्नों को ऊपर उठाया है ये सभी जिम्मेदारियां सरकार की ही है। सरकार का दायित्व है इन्हें पूरा करना लेकिन आज तक सरकार सिर्फ पंगु बनी हुई है। और मैं भरोसे के साथ कहता हूं कि सरकार हमेशा पंगु बनी रहेगी। तो सुन लो सत्ता के दलालों अगर हालात नही बदले तो प्रदर्शन फिर होगा। इंडिया गेट की सड़कें फिर जाम होंगी। मेट्रो स्टेशन बंद करने पर भी लोग अपने वाहनों से या पैदल ही पहुंचंगे। नही पहुंच पाए तो हर सड़क राजपथ होगी और हर मोहल्ला जनपथ। विरोध तो होगा। संभल जाओ और संभाल लो। अब आवाज़ एलिट क्लास से नही आम आदमी के ह्रदय से निकल रही है।

Saturday, October 27, 2012

लो प्रोफाइल मौत की हाईप्रोफाइल पत्रकारिता


  बेचारा नाइट रिपोर्टर अपनी रात की नींद खराब करके एक लड़की की संदिग्ध मौत के मामले में स्टोरी कवर करने गया। लड़की की मौत की स्टोरी असाइनमेंट पर पहुंच गई..जिस तरह से स्टोरी असाइनमेंट टेबल पर आई..उसी रूप में वो आऊटपुट को खबर के रूप में ढालने के लिए मेल कर दी गई..रिपोर्टर आया..बताया 12 साल की लड़की की संदिग्ध हालत में मौत का मामला है..प्रोड्यूसर ने जानना चाहा कि लड़की मलाईदार तबके से ताल्लुक रखती है या गरीब या कहें लो प्रोफाइल है..रिपोर्टर ने फोन घुमाया, पता लगाया..लड़की मजदूर की बेटी थी..पिछले एक महीने से अपने भाई के साथ प्रह्लादपुर में रह रही थी..प्रोड्यूसर को बताया..जवाब आया..छोड़ो..लो प्रोफाइल है..लोगों की लाशों पर खबरों का ये लो और हाईप्रोफाइल होना पत्रकारिता की हाईप्रोफाइल कहानी बयां करता है..

Friday, May 11, 2012

दबी कुचली नीतियां और आधुनिक कचरे का निपटारा

सोफे पर बैठे-बैठे हम खबरों की दुनिया से निकलकर फिल्मी दुनिया में घूमने लगते हैं। रिमोट के बटन के आसरे चैनल बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कंप्यूटर पर उंगलियों के आसरे हम दुनियाभर  में होने वाली गतिविधियों को महसूस कर सकते हैं। दो दशक पहले तक जिंदगी इतनी आसान नही थी। लेकिन अब वक्त बदल गया है क्योंकि अब हमारे पास इलैक्ट्रोनिक साधनों की भरमार है। जहाँ इन इलैक्ट्रोनिक साधनों के आसरे लोगों की जिंदगी कठिनाईयों और लेटलतीफी से बाहर निकली, वहीं इनके बढ़ते इस्तेमाल ने लोगों के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा  भी पैदा कर दिया। और ये खतरा है ई-वेस्ट। आखिर क्या है ये ई-वेस्ट, क्यों आज इस विषय पर चर्चा हो रही है और क्या जरूरत पड़ी सरकार को ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन)अधिनियम 2011 को लागू करने की।

इलैक्ट्रोनिक साधनों के बिना जिंदगी गुजारना किसी भयावह सपने से कम नही है। बिना कंप्यूटर के ऑफिसो में काम नामुमकिन होता जा रहा है, घरों में बच्चे विडियोगेम खेलने के लिए कंप्यूटरों का इस्तेमाल करने लगे हैं, स्कूली सिलेबसों में कंप्यूटर जरूरी हो गया है। तेजी से बढ़ते कंप्यूटरमेनिया  से ई-वेस्ट में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जहाँ पहले एक कंप्यूटर की उम्र 7 से 8 साल हुआ करती थी वहीं वो घटकर 3से 4 साल हो गई है। देश में अभी करीब 8 करोड़ कंप्यूटर हैं और आप जानकर चौंक जाएंगे कि अगले पाँच साल में इसकी संख्या बढ़कर दोगुनी से भी ज्यादा हो जाएगी। लोगों के घरों में मनोरंजन के साधन टेलीविजन की आबादी भी 2015 तक बढ़कर 24 करोड़ के आसपास पहुँच जाएगी। वहीं बात की जाए मोबाइल्स की तो भारत में इसके यूजर भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग 70 करोड़ मोबाइल इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ई-वेस्ट का प्रबंधन करने वाली कंपनियों का मानना है  कि किसी मोबाइल फोन को 98 फीसदी तक रिसाइकिल किया जा सकता है, उसी तरह कंप्यूटर की रिसाइकिलिंग भी कई तरह के नए उत्पादों को जन्म दे सकती है। मेमोरी डिवाइस, एमपी3 प्लेयर और आईपॉड, ई-वेस्ट में निश्चित तौर पर इज़ाफा करते हैं।

ई-वेस्ट के बढ़ते इस्तेमाल ने बाजार को एक नया कारोबार खोलने के लिए भी प्रेरित किया है। इलैक्ट्रोनिक साधनों के बढ़ते इस्तेमाल और उसके बाद उससे  होने वाले खतरों को देखते हुए विशेषज्ञों ने वेस्ट मैनेजमेंट का रास्ता सबके सामने रखा। इलैक्ट्रोनिक कचरे को फिर से इस्तेमाल करने का तरीका है वेस्ट मैनेजमेंट। इसमें कचरे को नष्ट करने की बजाए उसे रिसाइकिल किया जाता है। इलैक्ट्रोनिक कचरा पैदा करने के मामले में अव्वल देश होने के नाते  ये जरूरी होता है कि भारत सरकार इसे लेकर कुछ प्रयास करे। इसी कड़ी में मंगलवार को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना प्रभावी हो गई। मंगलवार से प्रभावी हुए ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन) अधिनियम 2011 के प्रावधान के मुताबिक जो कंपनियां इलेक्ट्रोनिक उत्पाद बनाती हैं उसे सही ढंग से रिसाइकल करने की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। इसके लिए कंपनियों को जगह- जगह कुछ ऐसे सेंटर खोलने होंगे जहाँ इन उत्पादों की कलेक्शन हो सके। इतना ही नही इन रिसाइकल केंद्रों के प्रति लोगो को जागरूक करने का काम भी निर्माता कंपनियों को ही करना होगा। अहम बात ये है कि यह कानून एक साल पहले ही बन गया था लेकिन कंपनियों ने अब तक रिसाइकिलिंग सेंटर्स के बारे में जागरूकता संबंधी कार्यक्रम चलाए हों ऐसा प्रतीत नही होता। दिलचस्प बात तो ये है कि कंपनियाँ अभी तक ये भी सुनिश्चित नही कर पाई है कि जो लोग ई-कचरा कंपनियों को लौटाएंगे उसके एवज उन्हें कितनी कीमत दी जाएगी। कंपनियाँ इस सामान को मुफ्त में लेना चाहती हैं लेकिन गौरतलब है कि जब कबाड़ी भी हमसे ई-कचरा ले जाता है तो वो भी उसकी कुछ कीमत अदा करता है तो बड़ा सवाल ये है कि कंपनियाँ इससे क्यों इंकार कर रही हैं?

हालांकि इस मामले में कंपनियां कहती हैं कि उन्हें ई-वेस्ट को रिसाइकिल करने में खर्चा करना पड़ेगा। अगर सरकारी पक्ष पर ध्यान दें तो पाएंगे कि सरकार  भी इस मामले में लोगों को जागरूक करने में विफल ही रही है। लोग अभी भी ई-कचरे के निपटान को लेकर जागरूक नही है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 3.5 लाख टन ई-कचरा सालान दिल्ली में इकट्ठा होता है और उस कचरे का अवैज्ञानिक ढंग से निपटारा किया जा रहा है। दरअसल कचरे के अवैज्ञानिक ढंग से निपटान करने की वजह से पर्यावरण और लोगों को काफी नुकसान हो रहा है। गौर करने की बात ये है ई-कचरे के अवैज्ञानिक तरीके से निपटारा होने के एवज में पर्यावरण एवं संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई तक का प्रावधान है। दोषी पाए जाने पर 5 साल तक की सज़ा और 1 लाख रूपये के जुर्माने तक का प्रावधान है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ई-कचरे के निपटारा एक गोरखधंधा बन गया है और कई जिंदगियों को नाश करने पर तुला हुआ है।

जनसंख्या का लगातार बढ़ना और  आर्थिक विकास की राह पर दौड़ते भारत के सामने इस कचरे का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है। कार्बनिक उत्पाद, गंदगी और धूल लगभग 80 फीसदी कचरे को पैदा करते है। बढ़ती जनसंख्या की वजह से इस कचरे को पैदा होने से रोका तो नही जा सकता लेकिन इसका मैनेजमेंट करके इसका सही इस्तेमाल जरूर किया जा सकता है। एक्सर्ट्स के अनुसार तीन तरीकों से इलैक्ट्रोनिक कचरे को मैनेज किया जा सकता है। पहला तरीका है जमीन में गड्ढा खोदकर कचरा गाडना, दूसरा है कचरे को इकट्ठा करके उसे जलाना और तीसरा और सबसे कारगर तरीका है कचरे को रिसाइकिल करके फिर से इस्तेमाल करना। विशेषज्ञ इस तरीके को सबसे कारगर समझते हैं। देश में सन् 2000 से पहले कचरे को रिसाइकिल करने की नीति नही थी। लेकिन उसी साल सरकार ने इस पर सोचना शुरू किया।

वेस्ट मैनेजमेंट की नीतियाँ समाज के हर तबके के हिसाब से अलग-अलग बनाई गई। ये नीतियाँ विकसित और विकासशील देशों के लिए अलग है और शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए अलग। औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी अलग से नीतियाँ बनाई गई, इन नीतियों पर कुछ देशों में तो काम हो रहा है लेकिन भारत में  इस ओर न के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में कचरा इकट्ठा करने के लिए म्युनिसिपैलिटी हर एक मकान मालिक को तीन तरह के डस्टबिन देती है, जिनमें रिसाइकिल होने वाला कचरा, साधारण कचरा और बगीचे का कचरा अलग-अलग डाला जाता है। वहीं कनाडा में सारे शहर का कूड़ा इकट्ठा कर उसे रिसाइकिल किया जाता है। कनाडा में गाँवों में ट्रांसफर स्टेशन बनाकर कचरा रिसाइकिल केंद्रों को भेजा जाता है।  दरअसल भारत में इस तरह के प्रयोगों की तरफ ज्यादा ध्यान नही दिया जाता। कुछ एनजीओ भी इस विषय पर काम कर रहे हैं लेकिन भारत में इस प्रयास को जागरूकता के अभाव में वो कामयाबी नही मिल पा रही जो विदेशों में मिल रही है.। ई-वेस्ट मैनेजमेंट को कारोबार के तौर पर भी कई कंपनियाँ अपना रही है और देश में जिस तरह से इलैक्ट्रोनिक साधनों का प्रयोग बढ़ रहा है  उससे इन कंपनियों के सुनहरे भविष्य को लेकर कोई आशंका नज़र नही आती।

चिंता कि बात तो ये है कि इलैक्ट्रोनिक कचरे ने लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। इलैक्ट्रोनिक कचरा कई तरह की बीमारियों को पैदा करता है, जिनमें सांस से संबंधित बीमारियों के अलावा,स्किन से संबंधित बीमारियाँ, हैपेटाइटिस-बी शामिल है। आपको जानकर हैरानी होगी कि ई-वेस्ट कैंसर तक का खतरा पैदा करने का माद्दा रखता है। इसके अलावा कई तरह की संक्रमित बीमारियों को जन्म देता है ई-वेस्ट। ई-वेस्ट के खतरे को रोकने के लिए कई तरह के प्रोग्राम भी चलाए जा रहे हैं जिनमें स्वास्थ्य कर्मियों, कार्यकर्ताओं और गैरसरकारी संगठनों को शिक्षित किया जा रहा है। इस समस्या का सामना करने के लिए इग्नू ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन के साथ हाथ मिलाकर कई तरह के कार्यक्रमों की शुरूआत भी की है। हालांकि जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता आएगी इस ओर सुधार आएगा, लेकिन ये भी सच्चाई है कि जागरूकता का स्तर जिस गति से बढ़ेगा उस गति से इलैक्ट्रोनिक साधनों के प्रयोग में भी इज़ाफा होगा और ये निश्चित तौर पर गंभीर समस्या को ही जन्म देगा।

ई-वेस्ट के तौर पर ज्यादा चर्चा हमारे देश में नही होती बल्कि भारत ई-वेस्ट उत्पादन के मामले में अव्वल देशों में गिना जाता है। दुनियाभर में 80 प्रतिशत ई-वेस्ट चीन,पाकिस्तान और भारत में पैदा होता है और दुर्भाग्य है कि ई-वेस्ट को मैनेज करने के बारे में सबसे कम जागरूकता इन्हीं देशों मे देखने को मिलती है। ई-वेस्ट निश्चित तौर पर कई बीमारियों को तो जन्म देता ही है उसके साथ पर्यावरण के लिए भी भयानक खतरा पैदा करता है और ये खतरा भारतीयों की बढ़ती तादात के बाद और भी भयानक रूप में सामने आने की कगार पर है। किसी वस्तु को कई बार इस्तेमाल करना भारतीय मानसिकता का पॉजिटिव पहलू है। भारतीय घरों में इलैक्ट्रोनिक साधनों की चिपों में से तांबा और मेटल निकालने का काम जोरों पर होता है और यही मेटल और तांबा मल्टीनेशनल कंपनियों में दोबारा इस्तेमाल के लिए पहुँचता है। दरअसल रिसाइकिलिंग का काम भारत में निचले स्तर पर तो हो रहा है लेकिन इसे ऑर्गेनाइज्ड तौर से करना उतना ही जरूरी है जितना अस्पतालों में दवाइयों का वितरण और बात अस्पताल की आ ही गई है तो हम आपको बता दें कि अस्पतालों से भी बहुत बड़ी मात्रा में ई-कचरा पैदा होता है। मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपने फायदे के लिए भारत के गरीब क्षेत्रों में छोटे स्तर पर इलैक्ट्रोनिक पार्टस की रिसाइकिलिंग करवा रही है जिससे लोगों के स्वास्थ्य को भयंकर खतरा है। दुर्भाग्य है कि इन गैरसंगठित मजदूरों के लिए सरकार के पास किसी भी तरह का कोई ब्लू प्रिंट नही है।

दिल्ली का सीलमपुर ,मुंडका और नेहरू प्लेस, सैकेंड हैंड इलैक्ट्रोनिक पार्टस के एक बहुत बड़े बाजार के रूप में उभर रहे हैं। उसी तरह मुंबई का धारावी इलाका भी गैरसंगठित मजदूरों की फैक्ट्री बन गया है, जहाँ मल्टीनेशनल कंपनियों के सैकड़ों एजेंट अपने ही लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कोड़ी के भाव के खराब हो चुके पार्टस रिसाइकिल होने के बाद हजारों की कीमत का भाव रखते हैं। नदियों की अविरल बहती धारा में बड़े पैमाने पर इन पार्टस का गंदा पानी जहर के रूप में घोला रहा है। सरकार से सवाल है कि क्या ये जनता के अधिकारों का हनन नही है? उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ का हक आखिर इस धंधे में लगे लोगों को किसने दिया? ई-कचरे को जमीन में दबाना या जलाना एक वैकल्पिक उपाय तो हो सकता है लेकिन उस कचरे की रिसाइकिलिंग निश्चित तौर पर एक बेहतर उपाय होगी, लेकिन इसके लिए जरूरत है एक राष्ट्रीय सोच की और सबसे अधिक जागरूकता की। सरकार की पहल, इंतजार ही बढाएगी इसलिए जागरूकता का प्रसार अपने स्तर पर शुरू हो जाना चाहिए। ई-वेस्ट बहुत बड़ा खतरा है, जब तक उसे मैनेज न किया जाए। मैनेज करने के बाद वो निश्चित तौर पर किफायती ही साबित होगा।

Tuesday, April 24, 2012

ये पप्पू कब पास होगा?


     15 अप्रैल की सुबह दिल्ली के मिज़ाज में बदलाव की सुबह थी, ये सुबह दरअसल 5 सालों बाद आई। 15 दिनों तक गलियों में भोंपूओं का शोर, प्रचार की चिल्लपौं, पैसा कमाने की कवायद में लगे अस्थाई रोजगारी लोगों की धमाचौकड़ी कम हो चुकी थी, भला हो चुनाव आयोग का..अरे माफ कीजिएगा, अपने शब्द वापस लेता हूँ। दिल्ली में नगर निगम के चुनाव और 2423 उम्मीदवारों की किस्मत 15 अप्रैल को बंद होने वाली थी मशीनों में। लोग पप्पू न बने और दबंगई से अपने मताधिकार का प्रयोग करें इसके लिए लाखों रूपये खर्च किए गए चुनाव आयोग ने लोगों की जागरूकता पर। बड़े-बड़े होर्डिंग्स, पोस्टर, टीवी प्रचार, अखबारों में विज्ञापन और न जाने कितनी ही जागरूक संस्थाओं ने वोटिंग के प्रति जागरूकता संबंधी अभियान चलाया। लेकिन वोटिंग हुई 55 प्रतिशत के करीब। ये है चुनाव आयोग की पहली हार। करीब 45 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग नही किया, यानि परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नही आया। दूसरी हार तब हुई जब मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। कहते हैं शिक्षा सभी अज्ञानताओं को परास्त करने का बूता रखती है। लेकिन अहम हो जाता है कि चुनाव आयोग के द्वारा जिस तरह से चुनावी शिक्षा का प्रचार किया जाना था वो नही हो पाया। मैं ये बात सिर्फ हवा में ही नही कह रहा बल्कि मैं स्वयं इसका भुक्तभोगी बना, जब मुझे चुनाव अधिकारियों की अज्ञानता का शिकार होना पड़ा और मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। अखबार के माध्यम से भी मैनें चुनाव अधिकारियों को शिक्षित करने का प्रयास किया मगर चुनाव अधिकारी हैं कि अपनी अज्ञानता का बखान गौरवपूर्ण ढंग से किए जा रहे थे।
       लोकतंत्र में हमें अधिकार है कि हम अपनी मर्जी से अपने नुमाइंदों को चुने और संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया इसका पुरजोर समर्थन करती है कि हम सोच कर, समझकर ही अपने मताधिकार का प्रयोग करें। अंधों में काना राजा वाली कहावत लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कम से कम कागज़ी तौर पर तो चरितार्थ नही होती। कागज़ी तौर पर इसलिए प्रयोग किया क्योंकि कई लोग कहेंगे कि कागज़ों में लोकतंत्र अलग होता है और लोकतंत्र की जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है। खैर छोड़िए विषयांतर नही करूंगा। लोकतंत्र में हालांकि ये अधिकार नही है कि हम उम्मीदवार को सिरे से नकार सकें और वोटिंग मशीन में कोई उम्मीदवार पसंद नही का बटन दबाकर चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बने। लेकिन दिल्ली चुनाव आयोग ने इस बार बंदोबस्त किया था कि जो भी मतदाता किसी भी उम्मीदवार को पसंद नही करता वो रजिस्टर 11A में अपनी नापसंदगी दर्ज कर सकता है। समाचार चैनलों पर पत्रकार चुनाव आयोग की जमकर बखिया उधेड़ रहे थे। दरअसल रजिस्टर 11A के बारे में जो जागरूकता अभियान चलाया जाना था वो अभियान ठीक ढंग से नही चलाया गया, जिसकी वजह से कई लोग या तो इस नए प्रावधान के तहत अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाए या अंधो में काने राजा को चुने चले गए। अपने वार्ड-39 के 17 उम्मीदवारों का तुलनात्मक अध्ययन करके मैंने निर्णय लिया मैं भी राईट टू रिफ्यूजका प्रयोग करूंगा। बढ़ चला मतदान केंद्र की तरफ कुछ लोगों को जाते जाते इस अधिकार के प्रति जागरूक भी किया। मतदान केंद्र पहुँचने पर पता चला कि पीठासीन अधिकारी को इस नए प्रावधान के बारे में जानकारी ही नही हैं। मैं इस अज्ञानता को लोकतंत्र के दुर्भाग्य के तौर पर देखता हूँ। खैर बुलाया गया सेक्टर ऑफिसर को, दिलचस्प है कि उन्हें भी इस बारे में जानकारी नही थी। मैनें कहा आप अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पूछ लीजिए मगर बडा बेआबरू करके उन्होंने मुझे वहाँ से चले जाने को कहा। खैर मैं वहाँ से चला गया, और अपने साथ नवभारत टाइम्स की एक प्रति ले आया जहाँ रजिस्टर 11A की पूरी जानकारी दी गई थी। मैनें वो प्रति पीठासीन अधिकारी को दिखाई तो उन्होंने फिर सेक्टर ऑफिसर को फोन करके बुलाया। मुझे आश्वासन मिला कि मैं इंतजार करूं, सेक्टर ऑफिसर 10 मिनट में आ रही हैं। वो 10 मिनट अब 35 मिनट में बदल चुके थे, अगले 2 मिनट बाद सेक्टर ऑफिसर पहुँची और मुझे देखकर भागना शुरू कर दिया। टीवी पत्रकारों ने उनको भागते हुए अपने कैमरे में कैद भी किया और दाग दिए सवाल। लेकिन नही मिला सवालों का जवाब (विडियो देखने के लिए यूट्यूब पर https://www.youtube.com/watch?v=KBAop6hxUcw या “Right To Refuse..I couldn't Vote”)। सेक्टर ऑफिसर ने कहा कि उन्हें ट्रेनिंग के दौरान इस प्रावधान के बारे में जानकारी ही नही दी गई। सवाल ये है कि चुनाव आयोग ट्रेनिंग में जानकारी देने का सच बोल रहा था या ये सेक्टर अधिकारी जानकारी न देने का झूठ बोल रही थी? खैर नतीजा ये निकला कि मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। अशिक्षित और अज्ञानी में फर्क होता है, लेकिन यहाँ मौजूद चुनाव अधिकारी चुनावी प्रावधानों के प्रति अशिक्षित तो थे ही इसके साथ साथ वो अज्ञानी भी थे क्योंकि उन्हें ये भी मालूम नही था कि रजिस्टर 11A होता क्या है। ये वही रजिस्टर होता है जिसमें मतदान से पहले मतदाताओं के हस्ताक्षर लिए जाते हैं। चुनाव अधिकारियों ने अपनी अज्ञानता में चुनाव आयोग को ही पप्पू साबित कर दिया। अब सवाल ये है कि ये पप्पू कब पास होगा? और इसके साथ एक राय कि पहले खुद दबंग बनो तभी दबंगई का बखान करना अच्छा लगता है।