15 अप्रैल की सुबह दिल्ली के मिज़ाज में बदलाव की
सुबह थी, ये सुबह दरअसल 5 सालों बाद आई। 15 दिनों तक गलियों में भोंपूओं का शोर,
प्रचार की चिल्लपौं, पैसा कमाने की कवायद में लगे अस्थाई रोजगारी लोगों की
धमाचौकड़ी कम हो चुकी थी, भला हो चुनाव आयोग का..अरे माफ कीजिएगा, अपने शब्द वापस
लेता हूँ। दिल्ली में नगर निगम के चुनाव और 2423 उम्मीदवारों की किस्मत 15 अप्रैल
को बंद होने वाली थी मशीनों में। लोग पप्पू न बने और दबंगई से अपने मताधिकार का
प्रयोग करें इसके लिए लाखों रूपये खर्च किए गए चुनाव आयोग ने लोगों की जागरूकता
पर। बड़े-बड़े होर्डिंग्स, पोस्टर, टीवी प्रचार, अखबारों में विज्ञापन और न जाने
कितनी ही जागरूक संस्थाओं ने वोटिंग के प्रति जागरूकता संबंधी अभियान चलाया। लेकिन
वोटिंग हुई 55 प्रतिशत के करीब। ये है चुनाव आयोग की पहली हार। करीब 45 फीसदी
लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग नही किया, यानि परिणाम उम्मीदों के अनुरूप नही
आया। दूसरी हार तब हुई जब मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। कहते हैं
शिक्षा सभी अज्ञानताओं को परास्त करने का बूता रखती है। लेकिन अहम हो जाता है कि
चुनाव आयोग के द्वारा जिस तरह से चुनावी शिक्षा का प्रचार किया जाना था वो नही हो
पाया। मैं ये बात सिर्फ हवा में ही नही कह रहा बल्कि मैं स्वयं इसका भुक्तभोगी
बना, जब मुझे चुनाव अधिकारियों की अज्ञानता का शिकार होना पड़ा और मैं अपने
मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। अखबार के माध्यम से भी मैनें चुनाव अधिकारियों को
शिक्षित करने का प्रयास किया मगर चुनाव अधिकारी हैं कि अपनी अज्ञानता का बखान
गौरवपूर्ण ढंग से किए जा रहे थे।
लोकतंत्र में हमें अधिकार है कि
हम अपनी मर्जी से अपने नुमाइंदों को चुने और संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया
इसका पुरजोर समर्थन करती है कि हम सोच कर, समझकर ही अपने मताधिकार का प्रयोग करें।
अंधों में काना राजा वाली कहावत लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कम से कम कागज़ी तौर पर
तो चरितार्थ नही होती। कागज़ी तौर पर इसलिए प्रयोग किया क्योंकि कई लोग कहेंगे कि
कागज़ों में लोकतंत्र अलग होता है और लोकतंत्र की जमीनी हकीकत कुछ और ही होती है।
खैर छोड़िए विषयांतर नही करूंगा। लोकतंत्र में हालांकि ये अधिकार नही है कि हम
उम्मीदवार को सिरे से नकार सकें और वोटिंग मशीन में कोई उम्मीदवार पसंद नही का बटन
दबाकर चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बने। लेकिन दिल्ली चुनाव आयोग ने इस बार
बंदोबस्त किया था कि जो भी मतदाता किसी भी उम्मीदवार को पसंद नही करता वो रजिस्टर
11A में
अपनी नापसंदगी दर्ज कर सकता है। समाचार चैनलों पर पत्रकार चुनाव आयोग की जमकर
बखिया उधेड़ रहे थे। दरअसल रजिस्टर 11A के बारे में जो जागरूकता अभियान चलाया जाना था वो
अभियान ठीक ढंग से नही चलाया गया, जिसकी वजह से कई लोग या तो इस नए प्रावधान के
तहत अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाए या अंधो में काने राजा को चुने चले गए।
अपने वार्ड-39 के 17 उम्मीदवारों का तुलनात्मक अध्ययन करके मैंने निर्णय लिया मैं
भी “राईट
टू रिफ्यूज” का
प्रयोग करूंगा। बढ़ चला मतदान केंद्र की तरफ कुछ लोगों को जाते जाते इस अधिकार के
प्रति जागरूक भी किया। मतदान केंद्र पहुँचने पर पता चला कि पीठासीन अधिकारी को इस
नए प्रावधान के बारे में जानकारी ही नही हैं। मैं इस अज्ञानता को लोकतंत्र के
दुर्भाग्य के तौर पर देखता हूँ। खैर बुलाया गया सेक्टर ऑफिसर को, दिलचस्प है कि
उन्हें भी इस बारे में जानकारी नही थी। मैनें कहा आप अपने वरिष्ठ अधिकारियों से
पूछ लीजिए मगर बडा बेआबरू करके उन्होंने मुझे वहाँ से चले जाने को कहा। खैर मैं
वहाँ से चला गया, और अपने साथ नवभारत टाइम्स की एक प्रति ले आया जहाँ रजिस्टर 11A की
पूरी जानकारी दी गई थी। मैनें वो प्रति पीठासीन अधिकारी को दिखाई तो उन्होंने फिर
सेक्टर ऑफिसर को फोन करके बुलाया। मुझे आश्वासन मिला कि मैं इंतजार करूं, सेक्टर
ऑफिसर 10 मिनट में आ रही हैं। वो 10 मिनट अब 35 मिनट में बदल चुके थे, अगले 2 मिनट
बाद सेक्टर ऑफिसर पहुँची और मुझे देखकर भागना शुरू कर दिया। टीवी पत्रकारों ने
उनको भागते हुए अपने कैमरे में कैद भी किया और दाग दिए सवाल। लेकिन नही मिला
सवालों का जवाब (विडियो देखने के लिए यूट्यूब पर https://www.youtube.com/watch?v=KBAop6hxUcw या “Right To Refuse..I
couldn't Vote”)। सेक्टर ऑफिसर ने कहा कि उन्हें ट्रेनिंग के दौरान
इस प्रावधान के बारे में जानकारी ही नही दी गई। सवाल ये है कि चुनाव आयोग ट्रेनिंग
में जानकारी देने का सच बोल रहा था या ये सेक्टर अधिकारी जानकारी न देने का झूठ
बोल रही थी? खैर
नतीजा ये निकला कि मैं अपने मताधिकार का प्रयोग नही कर पाया। अशिक्षित और अज्ञानी
में फर्क होता है, लेकिन यहाँ मौजूद चुनाव अधिकारी चुनावी प्रावधानों के प्रति
अशिक्षित तो थे ही इसके साथ साथ वो अज्ञानी भी थे क्योंकि उन्हें ये भी मालूम नही
था कि रजिस्टर 11A होता
क्या है। ये वही रजिस्टर होता है जिसमें मतदान से पहले मतदाताओं के हस्ताक्षर लिए
जाते हैं। चुनाव अधिकारियों ने अपनी अज्ञानता में चुनाव आयोग को ही पप्पू साबित कर
दिया। अब सवाल ये है कि ये पप्पू कब पास होगा? और इसके साथ एक राय कि पहले खुद दबंग बनो तभी दबंगई
का बखान करना अच्छा लगता है।
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