बिपासा ने अपनी नन्ही
उंगलियों से मेरा हाथ थामा। ठीक से मेरी उंगलियाँ तक भी नही पकड़ पा रही थी। “भईया आओ हमारा खाना कहाँ
बनता है दिखाती हूँ आपको”। पिपासा जैसी और भी नन्ही परियाँ थी वहाँ। पीछे से मनीष आया “भईया चलो आपकी चाय वहाँ रखी
है”। सभी बच्चे मुझे ले जाने लगे। “आप यहीँ रुकोगे ना आज”? मनीष ने बड़े स्नेह के साथ पूछा। बड़ी आशाएं थी उसकी आँखों में, बड़े
आदरभाव से उसने पूछा। शाम की ट्रेन से दिल्ली ना लौटना होता तो वक्त जरुर बिताता
उन बच्चों के बीच जिन्हें लोग कहते हैं कि इनकी माँ धंधा करती है। मैं इन्हें कहता
हूँ अंधेरें में उजाले की किरण।
बहुत जल्दी घुल मिल गया
था मैं इन बच्चों के साथ। नन्हे मनीष के मन में लालच आया, बोला भईया आज यहीं रुक
जाओ फुटबाल खेलेंगे, टीवीs देखेंगे, तालाब में भी नहाऐंगे। बचपन का लालच तो ऐसा ही
होता है। खैर मनीष ने अभी भी मेरा हाथ थामा हुआ था, मानो कहीं चला जाऊंगा उन्हें
छोड़कर, कभी ना आने के लिए। बारुईपुर स्थित ‘राहुल विद्या निकेतन’, पश्चिम बंगाल के साउथ 24 परगना का वो स्थान
जहाँ रात की संताने पलती हैं, अंधेरे पर विजय पाने के लिए। अपने सपनों को साकार
करने के लिए। दुर्बार महिला समन्वय कमिटी, जोकि यौनकर्मियों द्वारा संचालित
यौनकर्मियों का सबसे बड़ा संगठन है वही निकेतन को भी संचालित करता है। विशाल
क्षेत्र में फैला हुआ राहुल विद्या निकेतन, लेकिन एकदम व्यवस्थित। हॉस्टल, टीवी
रुम, किचन, बड़े से ग्राऊंड में दुर्बार स्पोर्ट्स एकेडमी, खेत, हरियाली और दो
तालाब। मनीष ने कहा कि एक तालाब में लड़के नहाते हैं और एक तालाब में लड़कियाँ।
हालांकि नहाने का उचित प्रबंध है लेकिन फिर भी तालाब को नज़र अंदाज नही किया गया।
शहर की धूल धक्कड़ और तथाकथित सभ्य समाज की हीन नज़रों से दूर ये बच्चे प्रकृति की
गोद में ढेरों सपनों को पूरा करने के लिए हर पल जागने और जगाने के लिए संघर्षशील
हैं। बेहतर से बेहतर गाइड भी उन बच्चों के सामने पानी भरे, अगर इनकी निकेतन के
बारे में जानकारी को परख ले तो। बाहर से आने वाले लोगों को ये बच्चे निकेतन के हर
कौने से कुछ इस तरह रुबरु करवाते हैं मानों निकेतन के हर कौने से इन्होंने बात की
हो। मैं दावे से कह सकता हूँ कि आपको संदेह हो जाएगा कि आप इस छल कपट से दूर
दुनिया को महज़ कुछ घंटो से जानते हैं।
धीमान की उम्र कोई 14
साल होगी। फुटबाल से नही खेलता ये बच्चा बल्कि फुटबाल के साथ खेलता है। गारंटी
देता हूँ जब तक इसके पास फुटबाल रहेगी आपकी आंखें भी फुटबाल पर टिकी रहेंगी। वैसे
तो भारत में फुटबाल को काफी हल्के में लिया जाता है मगर धीमान फुटबॉलर बनना चाहता
है। टीवी वाले कमरे में फुटबॉल विश्वकप का पूरा विवरण, फुटबॉल के सितारों के साथ
लगा है। धीमान ने तान दिया मुझपर एक सवाल। बताइए कौन जितेगा इस बार? मैंने कहा जर्मनी। इतना
कहना भर था कि उसने तो ब्राजील को विजेता बनाते हुए उसके प्लेयर्स के नाम तक गिनवा
दिए। उनकी परफोर्मेंस पर बात शुरु कर दी। मौन ही था मैं। सही सोचा था मैनें, ये
बच्चा फुटबॉल के साथ खेलता है। ये जानकर और ज्यादा खुशी हुई कि निकेतन के ग्राउंड
में खेलते-खेलते यहाँ के बच्चे अपनी मेहनत के आसरे होमलेस फुटबॉल लीग में भारत का
विदेशों में प्रतिनिधित्व तक कर आए हैं। मैनचेस्टर क्लब तक में ट्रेनिंग ले रहे
हैं यहाँ के नौनिहाल। स्लम शॉकर खेलने के लिए भारत का भ्रमण कर रहे हैं। कोई पुलिस
अधिकारी, तो कोई डांसर, कोई मेरी तरह सोशल वर्कर तो कोई टीवी और फिल्म में एक्टिंग
करना चाहता है। ढेरों आशाएं और आकांक्षाएं पाले ये बच्चे मुस्कुराहट के साथ आपसे
दिल लगा बैठेंगे।
निकेतन के केयरटेकर
सुशांतो जी बताते हैं कि दिनचर्या की शुरुआत प्रार्थना से होती है और इन 48 बच्चों
को सही वक्त पर भोजन मिले इसकी जिम्मेदारी का एहसास यहाँ काम करने वाली महिलाओं को
अच्छी तरह से है। वक्त पर बच्चों को स्कूल भेजना, उनकी देखभाल करना और उनके बचपने
को संभाल कर रखने में, यहाँ काम करने वाले कर्मचारियों का विशेष योगदान है। माँ का
स्नेह और उसकी ममता तो निश्चित तौर पर माँ ही दे सकती है मगर उस प्रयास में कमी
नही छोड़ी जाती जिससे बच्चों को माँ की कमी महसूस हो। जब भी बच्चे चाहते हैं माँ
के पास जाते हैं और माँ को भी ये अधिकार है कि वो दुलार के लिए बच्चों को गले
लगाए। समय-समय पर विशेष कैंपों के माध्यम से प्रतिभा उन्नयन के कार्यक्रम की
जानकारी भी इन बच्चों के साथ साझा की जाती है। मैं नही भूल सकता उस संगठन को जोकि
इन बच्चों को साथ लेकर इन्हें एक पहचान दिलवाने के लिए प्रयासरत है। ‘आमरा पदातिक’, ये संगठन भी यौनकर्मियों
के बच्चों द्वारा ही संचालित होता है। कह सकते हैं कि बच्चों में सांगठनिक भाव का
जन्म हो और उनमें नेतृत्व क्षमता का विकास हो इसके लिए आमरा पदातिक प्रशंसनीय
कार्य कर रहा है। बच्चे की प्रतिभा को पहचान कर उसे निखारने का दायित्व दुर्बार से
जुड़े अनेक संगठनों के माध्यम से निरंतर जारी है। राहुल विद्या निकेतन उस स्थिति
के लिए भी तैयार है जब किसी बच्चे के साथ कोई दुर्भावनापूर्ण व्यवहार हो। आमरा पदातिक
के जिम्मेदार कार्यकर्ताओं का एक ग्रुप है जो इस पर नज़र रखता है। हालांकि वो बात
अलग है कि पिछले 12 सालों में निकेतन के आदर्श इतने खोखले नही हुए कि यहाँ किसी भी
तरह के उत्पीड़न का मामला सामने आया हो। बच्चों को कंप्यूटर शिक्षा, आधुनिक शिक्षा
प्रणाली का ज्ञान, खेल में पारंगत होने के गुर सिखाने की जिम्मेदारी अनुभवी
मार्गदर्शकों पर है। कुछ दानादाता भी इन बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए अपनी
चिंताएं व्यक्त करते हैं और अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ सहयोग भी करते हैं।
नाज़ायज नही होते ये नौनिहाल पर फिर भी समाज की सोच का दायरा इन्हें नाज़ायज
की श्रेणी में डाल देता है। इन बच्चों के जीवन में सुधार और समान अवसर उपलब्ध
कराने के प्रयासों में राजनीतिक इच्छाशक्ति भी कमज़ोर साबित हुई है। खैर इस बात को
नज़रअंदाज नही किया जा सकता कि देश में योजनाएं वोट प्रतिशत को देखकर बनती हैं। निश्चित
तौर पर राहुल विद्या निकेतन और दुर्बार जैसी संस्थाएं प्रशंसा की पात्र हैं मगर
जरुरत आशाओं और आकांक्षाओं से भरे निकेतन के भीतर के संसार को निष्पक्ष भाव से
समझने की भी है। आखिर क्यों घर का पता सोनागाछी हो तो विद्यालय प्रशासन की नज़रे
हीन हो जाती है? सामाजिक व्यवस्थाओं की
त्रासदी देखिए कि यौनकर्मी की कोख से पैदा होने वाला बच्चा स्वत: ही दलाल
हो जाता है। क्या कभी किसी सरकारी अधिकारी ने ये जानने का प्रयास किया कि क्यों
रेड लाइट इलाकों में स्कूल ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या में इज़ाफा हो रहा है? एक
अलग ही संप्रदाय में विभाजित कर दिया जाता है यौनकर्मी के पूरे परिवेश को, उसके
परिवार को। बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक विकास पर खर्च होने वाला फंड
कागज़ों के आंकड़ों में ही खत्म हो जाता है। आखिर क्यों जरुरत पड़ती है इन बच्चों
को अपना पता बदलकर किसी निकेतन का पता देने की? ऐसे कई
सवाल राहुल विद्या निकेतन हम सबसे पूछता है, जिसके पास जवाब हो एक नई क्रांति की
शुरुआत कर सकता है।
