ज्योतिष के ज्ञान से परे
अगर आशाओं, आकांक्षाओं और विश्वास के आधार पर कुछ निर्णय लिए जाए तो वो कई फैसलों
पर भारी साबित हो सकते हैं। बेशक उनमें सत्यता और तर्कों का आधार कम हो लेकिन फिर
भी विश्वास कई बार सकारात्मक परिणामों के आधार पर और मजबूत होता जाता है। कुछ ऐसा
ही हो रहा है अबके बरस। आज़ादी के साल में चलते हैं। साल की शुरूआत बुधवार से हुई।
आशाएं थी कि एक आज़ाद सवेरा इस वर्ष देखने को मिलेगा। आज़ादी की हवा में सांस लेने
का मौका मिलेगा। हमारे चुने हुए लोगों की सरकार होगी। 200 साल की गुलामी और
जुल्मों का सफर थम जाएगा। हुआ भी वैसा ही, 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र
राष्ट्र के रुप में दुनिया के मानचित्र पर अलंकृत हुआ। अब देश के नागरिक कह सकते
थे कि हम आज़ाद भारत के नागरिक हैं।
वर्ष 2014 भी कुछ कहता
है। ये वर्ष भी साल 1947 की तरह बुधवार से ही शुरु हुआ। यानी आज़ादी वाला साल लौट
आया। ये महज़ एक संयोग भर ही हो सकता है कि इस साल देश में आम चुनाव हो रहे हैं।
जहाँ देश की सत्ता पर कौन काबिज़ होगा, इसका फैसला देश की जनता कर रही है। संयोग
बेशक हो, लेकिन हवाएं बदलाव का बिगुल बजा रही है। बदलाव सत्ता का। व्यवस्था का। राजनीतिक
पंडितों के गणितों से लेकर सामाजिक क्षेत्र में विचरण करने वाले बुद्धिजीवियों के
दिमाग भी बदलाव का संकेत दे रहे हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानो की आत्महत्याएं,
महिलाओं के साथ अपमानजनक कृत्य, देश की असुरक्षित सीमाएं और देश की आर्थिक हालत को
लगा मियादी बुखार देश के हर नागरिक को झकझोर रहा है। सवाल सत्ता में बैठे उन लोगों
से किए जा रहे हैं जिन्हें बड़े भरोसे के साथ लोगों ने चुना था, ताकि रामराज्य न
सही उसके जैसा मॉडल तो देश में कार्यान्वित हो सके। लेकिन जब नतीजा आया तो रावणराज
से तुलना भी अतुलनीय लगी। कोयले की कालिख ने कई सफेदपोशों का काला मुंह हो या
खेल-खेल में कॉमनमैन की जेब का पैसा हड़पने की कवायद में फंसे मंत्रियों की छुपन
छुपाई का खेल हो। ये पब्लिक सब जानती थी और जानती है। इसलिए इस बार परिवर्तन की
बयार बह रही है। इस बार का शोर भी नायाब है, जिसमें प्रत्येक आवाज़ साफ साफ कह रही
है कि सिर्फ सत्ता परिवर्तन नही व्यवस्था परिवर्तन भी चाहिए।
वर्ष 1947 में सामान्य आदमी खुश था कि हमारे लोगों के द्वारा सत्ता चलेगी। अब
कोई हमारे ही बीच का आएगा। बाबू राजेंद्र प्रसाद, नेहरू, पटेल, सर्वपल्ली
राधाकृष्णन, अंबेडकर अपने ही तो थे। जिन्होंने निरंकुश हो चुकी सत्ता को पलटने का
प्रयास ही नही किया बल्कि नवभारत के निर्माण की जिम्मेदारी भी अपने मजबूत कंधों पर
उठाई। हालात आज भी कुछ ऐसे ही हैं, बल्कि ऐसा लग रहा है कि इतिहास खुद को दोहरा
रहा है। आज हमारा प्रतिनिधित्व करने के लिए वो लोग तैयार हैं जो पिछले कई वर्षों
से निरंकुश हो चुकी सत्ता के खिलाफ संघर्ष ही नही कर रहे अपितु अब राष्ट्र द्वारा
दी गई जिम्मेदारियों को भी अपने कंधों पर लेने के लिए तैयार हैं। ऐसे व्यक्ति आज
देश का प्रतिनिधित्व करने के प्रयासों में लगे हैं। दिलचस्प है कि उनके प्रयासों
को राष्ट्र सिर्फ सराह ही नही रहा उसके साथ उन प्रयासों में अपने प्रयास भी
सम्मिलित कर रहा है ताकि वैभवशाली भारत को पुन: ढूंढा
जा सके। खैर मेरा मानना है कि कई बार संयोग भी कुछ इशारे करते हैं। देश की जनता
अपने विवेक से इन्हें समझे और व्यवस्था परिवर्तन की एक नई इबारत लिखे जिसमें एक
चाय बेचने वाला या बोझा उठाने वाला भी राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर सके।
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