
‘चहुँ ओर वंदे मातरम का शोर’ जहाँ तक भी नज़र जाती है वहाँ तक तीन रंग का राष्ट्रीय ध्वज ही नजर आता है..कुछ इसी तरह का नज़ारा है रामलीला मैदान का..रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे अन्ना हजारे जब वंदे मातरम का जयघोष मंच से लगाते हैं तो जैसे संपूर्ण रामलीला मैदान माँ भारती के इस जयघोष में खुद को सम्मिलित कर लेता है। भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन में अन्ना को खूब समर्थन मिल रहा है लेकिन इस आंदोलन में जो एक बात गौर करने की है वो ये है कि अन्ना के इस आंदोलन में भारत माता की जय और वंदे मातरम के जो जयकारे लग रहे हैं वो जयकारे आज तक हिंदुवादी संगठनों के प्रदर्शनों में लगते रहे हैं हालांकि वंदे मातरम का स्वर रामलीला मैदान ही नही बल्कि टेलीविजन के माध्यम से हमारे घरों को भी गूंजित कर रहा है। वंदे मातरम एक विवादित शब्द भी रहा है इससे इन्कार नही किया जा सकता। लेकिन सभी बातों पर सत्ताधीशों की तरफ से आपत्ति उठाई जा रही है लेकिन सिर्फ यही शब्द है जिस पर आपत्ति के स्वर मुखर नही हो रहे। हालांकि कुछेक लोग अन्ना के आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जनता का जोश उनके प्रयोजन को धत्ता बता रहा है। दरअसल भारत माँ का वंदन ही वंदे मातरम को परिभाषित करता है..और सच ये भी है कि मातृभूमि की जयजयकार करने में किसी को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए..लेकिन मुझे वो दौर भी याद है जब वंदे मातरम को ऐच्छिक करने की भी बात हो रही थी..लेकिन आज समय है कि हर ओर भारत माता की जय और वंदे मातरम का स्वर गूंज रहा है..इससे पहले ये स्वर 90 के दशक या उससे पहले जे.पी.के कांग्रेस और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में सबसे ज्यादा सुनने को मिला था। आज समाज का हर वर्ग जहाँ खड़ा है वहीं से वंदे मातरम का जयकारा लगाकर खुद को कृतार्थ कर रहा है। वंदे मातरम का स्वर उसे ये अहसास दिला रहा है कि उसने भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम में अपनी भूमिका अदा कर दी..वंदे मातरम पर विवाद व्यर्थ की बात रही है। लोगों के जोश और उनकी जुंबा से बारंबार निकले इस शब्द से यही साबित होता है कि वंदे मातरम हमारी नसों में बसा हुआ है। जो कि हमारी जान जाने के बाद ही खत्म हो पाएगा। वंदे मातरम वो शब्द है जो कि खुद ही एक क्रांति है..क्रांतिकारियों ने इन दो शब्दों को जुबां पर सजाकर बड़ी-बड़ी क्रांतियों में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया..ये दो शब्द भारत की आज़ादी के लिए उदघोषणाओं के अलंकार साबित होते थे..आजादी के मतवाले नए जोश के संचार के लिए भारत माता की जय के नारे लगाते थे। आज फिर वही दौर आया है, ज्यादा फर्क नही है उस दौर में और इस दौर में। अन्ना ये बार-बार कहते हैं कि आज आजादी के 64 साल बाद भी हम आज़ाद नही हो पाए हैं। और उसके तुरंत बाद वंदे मातरम का जयकारा लगाते हैं। दरअसल मैं इसे एक संकेत के तौर पर देखता हूँ कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी अपनी आज़ादी को कागजी स्वीकार करता है। भारत माता के गौरवगान को सार्वभौमिक स्तर पर पहुँचाने में वंदे मातरम का उदघोष सशक्त रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना जब अपनी आजादी को कई बार झूठी साबित करते रहे हैं तो उससे सत्ताधीशों की चूलें हिलने लगती है क्योंकि बार-बार लाल किले की प्राचीर से आजाद होने की बात सामने आती है, तो अन्ना के रामलीला मैदान से दिए भाषण सत्ताधीशों के उस किताबी भाषण को धत्ता बता देते हैं। सरकारी नुमाइंदे संविधान की लाज बचाने की बात करते रहते हैं लेकिन सभी जानते हैं कि भारत की चुनावी प्रक्रिया जिसका जिक्र संविधान में प्रमुखता से किया गया है, उसमें कितनी धांधली होती है। शराब की बोतलों पर भारत में नेता तय होते भी कई बार देखा गया है। लेकिन कुछ लोग अभी भी जानते हैं कि अगर प्रयास किया जाए तो सच्ची आज़ादी पाई जा सकती है। और अन्ना का आंदोलन उसी तरफ अग्रसर है। आंदोलन में लगने वाले उदघोष लोगों में एक नई ऊर्जा का संचार करते है। रामलीला मैदान का आंदोलन एक नई आजादी की तलाश है और इससे ये साबित होती है कि जब भी आजादी की बात आएगी ‘वंदे मातरम’ का स्वर गुंजायमान होगा।
आखिर इन दो शब्दों में है क्या! ये जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है। चलिए एक नज़र डालते हैं वंदे मातरम के गौरवशाली इतिहास पर.. देशभक्ति के गीतों की त्रिवेणी का अंतिम गीत है वंदे मातरम्.. जो भारत का राष्ट्रीय गीत है। इसे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने बंगाली व संस्कृत मिश्रित भाषा मे लिखा था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पद्य 1876 में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पद्य में केवल मातृ-भूमि की वन्दना है। उन्होंने 1882 में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बंगला में लिखा और इस गीत को उसमें सम्मिलित किया बाद में 1952 में इसी उपन्यास पर आनंदमठ नाम की फिल्म बनी। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पद्य बंगला भाषा में जोड़े गये, इन बाद के पद्य में दुर्गा की स्तुति है। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और 1870 में जब अंग्रेजी हूकमत ने God save the King/Queen गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पैराग्राफ 1876 में संस्कृत में लिखे। 1937 में इस गीत के बारे में कांग्रेस में बहस हुई और जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता वाली समिति ने इसके पहले दो पैराग्राफ को ही मान्यता दी। इस समिति में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी थे।इस गीत को पहले पहल 7 सितम्बर 1905 में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। 2005 में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में 1 साल के समारोह का आयोजन किया गया। यह 7 सितम्बर को समाप्त हुआ। इस समापन का अभिनन्दन करने के लिये मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को 7 सितम्बर 2006 में स्कूलों में गाने की बात की। हालांकि बाद में अर्जुन सिंह ने संसद में कह दिया कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, जिसे गाना हो गाए, न गाना हो, न गाए।
स्वतंत्रता संग्राम में भी ये गीत आजादी के मतवालों का तराना बने। बसंती चोले में रंगने की ख्वाहिश रखने वाले भारत माता के वीर सपूतों ने स्वतंत्र भारत की नींव रखने के लिए वंदे मातरम का सहारा लिया। आज फिर इतिहास ने खुद को दोहराया है। दिल्ली के रामलीला मैदान में क्रांति की मशाल थामे अन्ना हजारे ने समूचे देश को वंदे मातरम के उदघोष में रंग दिया है। दरअसल वंदे मातरम वो शब्द है जो भारत माता के प्रति श्रद्धा भाव को व्यक्त करता है। भारत को माँ कहने के बाद हम स्वाभाविक तौर पर“वसुधैव कुटुम्बकम” के विचार में सम्मिलित हो जाते हैं। क्योंकि जिसकी जुंबा पर भारत को माँ कहने की बात आती है तो हम सभी भाई बहन बन जाते हैं। इस तरह ये शब्द सामाजिक तौर पर भी सामंजस्य और एकत्व के विचार का प्रसार करते हैं। अन्ना के आंदोलन ने निश्चित तौर पर देश में एकात्म की भावना का संचार किया है। लेकिन सत्ता के चाटुकार कुछ लोग इस आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देना चाहते हैं लेकिन उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि सीनों में आग जल चुकी है। हिमालय से निकलने वाली क्रांति की ये गंगा अब अपनी मंजिल पर आकर ही रूकेगी क्योंकि देश की सरकार में वो बूता नही है कि इस धारा को काट सके ।




