Friday, September 9, 2011

अन्ना के आंदोलन का पूरक “वंदे मातरम”


चहुँ ओर वंदे मातरम का शोरजहाँ तक भी नज़र जाती है वहाँ तक तीन रंग का राष्ट्रीय ध्वज ही नजर आता है..कुछ इसी तरह का नज़ारा है रामलीला मैदान का..रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे अन्ना हजारे जब वंदे मातरम का जयघोष मंच से लगाते हैं तो जैसे संपूर्ण रामलीला मैदान माँ भारती के इस जयघोष में खुद को सम्मिलित कर लेता है। भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन में अन्ना को खूब समर्थन मिल रहा है लेकिन इस आंदोलन में जो एक बात गौर करने की है वो ये है कि अन्ना के इस आंदोलन में भारत माता की जय और वंदे मातरम के जो जयकारे लग रहे हैं वो जयकारे आज तक हिंदुवादी संगठनों के प्रदर्शनों में लगते रहे हैं हालांकि वंदे मातरम का स्वर रामलीला मैदान ही नही बल्कि टेलीविजन के माध्यम से हमारे घरों को भी गूंजित कर रहा है। वंदे मातरम एक विवादित शब्द भी रहा है इससे इन्कार नही किया जा सकता। लेकिन सभी बातों पर सत्ताधीशों की तरफ से आपत्ति उठाई जा रही है लेकिन सिर्फ यही शब्द है जिस पर आपत्ति के स्वर मुखर नही हो रहे। हालांकि कुछेक लोग अन्ना के आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जनता का जोश उनके प्रयोजन को धत्ता बता रहा है। दरअसल भारत माँ का वंदन ही वंदे मातरम को परिभाषित करता है..और सच ये भी है कि मातृभूमि की जयजयकार करने में किसी को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए..लेकिन मुझे वो दौर भी याद है जब वंदे मातरम को ऐच्छिक करने की भी बात हो रही थी..लेकिन आज समय है कि हर ओर भारत माता की जय और वंदे मातरम का स्वर गूंज रहा है..इससे पहले ये स्वर 90 के दशक या उससे पहले जे.पी.के कांग्रेस और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में सबसे ज्यादा सुनने को मिला था। आज समाज का हर वर्ग जहाँ खड़ा है वहीं से वंदे मातरम का जयकारा लगाकर खुद को कृतार्थ कर रहा है। वंदे मातरम का स्वर उसे ये अहसास दिला रहा है कि उसने भ्रष्टाचार विरोधी इस मुहिम में अपनी भूमिका अदा कर दी..वंदे मातरम पर विवाद व्यर्थ की बात रही है। लोगों के जोश और उनकी जुंबा से बारंबार निकले इस शब्द से यही साबित होता है कि वंदे मातरम हमारी नसों में बसा हुआ है। जो कि हमारी जान जाने के बाद ही खत्म हो पाएगा। वंदे मातरम वो शब्द है जो कि खुद ही एक क्रांति है..क्रांतिकारियों ने इन दो शब्दों को जुबां पर सजाकर बड़ी-बड़ी क्रांतियों में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया..ये दो शब्द भारत की आज़ादी के लिए उदघोषणाओं के अलंकार साबित होते थे..आजादी के मतवाले नए जोश के संचार के लिए भारत माता की जय के नारे लगाते थे। आज फिर वही दौर आया है, ज्यादा फर्क नही है उस दौर में और इस दौर में। अन्ना ये बार-बार कहते हैं कि आज आजादी के 64 साल बाद भी हम आज़ाद नही हो पाए हैं। और उसके तुरंत बाद वंदे मातरम का जयकारा लगाते हैं। दरअसल मैं इसे एक संकेत के तौर पर देखता हूँ कि देश का एक बहुत बड़ा वर्ग अभी भी अपनी आज़ादी को कागजी स्वीकार करता है। भारत माता के गौरवगान को सार्वभौमिक स्तर पर पहुँचाने में वंदे मातरम का उदघोष सशक्त रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना जब अपनी आजादी को कई बार झूठी साबित करते रहे हैं तो उससे सत्ताधीशों की चूलें हिलने लगती है क्योंकि बार-बार लाल किले की प्राचीर से आजाद होने की बात सामने आती है, तो अन्ना के रामलीला मैदान से दिए भाषण सत्ताधीशों के उस किताबी भाषण को धत्ता बता देते हैं। सरकारी नुमाइंदे संविधान की लाज बचाने की बात करते रहते हैं लेकिन सभी जानते हैं कि भारत की चुनावी प्रक्रिया जिसका जिक्र संविधान में प्रमुखता से किया गया है, उसमें कितनी धांधली होती है। शराब की बोतलों पर भारत में नेता तय होते भी कई बार देखा गया है। लेकिन कुछ लोग अभी भी जानते हैं कि अगर प्रयास किया जाए तो सच्ची आज़ादी पाई जा सकती है। और अन्ना का आंदोलन उसी तरफ अग्रसर है। आंदोलन में लगने वाले उदघोष लोगों में एक नई ऊर्जा का संचार करते है। रामलीला मैदान का आंदोलन एक नई आजादी की तलाश है और इससे ये साबित होती है कि जब भी आजादी की बात आएगी वंदे मातरम का स्वर गुंजायमान होगा।

आखिर इन दो शब्दों में है क्या! ये जानना तो और भी ज्यादा जरूरी है। चलिए एक नज़र डालते हैं वंदे मातरम के गौरवशाली इतिहास पर.. देशभक्ति के गीतों की त्रिवेणी का अंतिम गीत है वंदे मातरम्.. जो भारत का राष्ट्रीय गीत है। इसे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने बंगाली व संस्कृत मिश्रित भाषा मे लिखा था। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पद्य 1876 में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पद्य में केवल मातृ-भूमि की वन्दना है। उन्होंने 1882 में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बंगला में लिखा और इस गीत को उसमें सम्मिलित किया बाद में 1952 में इसी उपन्यास पर आनंदमठ नाम की फिल्म बनी। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पद्य बंगला भाषा में जोड़े गये, इन बाद के पद्य में दुर्गा की स्तुति है। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और 1870 में जब अंग्रेजी हूकमत ने God save the King/Queen गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पैराग्राफ 1876 में संस्कृत में लिखे। 1937 में इस गीत के बारे में कांग्रेस में बहस हुई और जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता वाली समिति ने इसके पहले दो पैराग्राफ को ही मान्यता दी। इस समिति में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद भी थे।इस गीत को पहले पहल 7 सितम्बर 1905 में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। 2005 में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में 1 साल के समारोह का आयोजन किया गया। यह 7 सितम्बर को समाप्त हुआ। इस समापन का अभिनन्दन करने के लिये मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को 7 सितम्बर 2006 में स्कूलों में गाने की बात की। हालांकि बाद में अर्जुन सिंह ने संसद में कह दिया कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, जिसे गाना हो गाए, न गाना हो, न गाए।

स्वतंत्रता संग्राम में भी ये गीत आजादी के मतवालों का तराना बने। बसंती चोले में रंगने की ख्वाहिश रखने वाले भारत माता के वीर सपूतों ने स्वतंत्र भारत की नींव रखने के लिए वंदे मातरम का सहारा लिया। आज फिर इतिहास ने खुद को दोहराया है। दिल्ली के रामलीला मैदान में क्रांति की मशाल थामे अन्ना हजारे ने समूचे देश को वंदे मातरम के उदघोष में रंग दिया है। दरअसल वंदे मातरम वो शब्द है जो भारत माता के प्रति श्रद्धा भाव को व्यक्त करता है। भारत को माँ कहने के बाद हम स्वाभाविक तौर परवसुधैव कुटुम्बकम के विचार में सम्मिलित हो जाते हैं। क्योंकि जिसकी जुंबा पर भारत को माँ कहने की बात आती है तो हम सभी भाई बहन बन जाते हैं। इस तरह ये शब्द सामाजिक तौर पर भी सामंजस्य और एकत्व के विचार का प्रसार करते हैं। अन्ना के आंदोलन ने निश्चित तौर पर देश में एकात्म की भावना का संचार किया है। लेकिन सत्ता के चाटुकार कुछ लोग इस आंदोलन को सांप्रदायिक रंग देना चाहते हैं लेकिन उन्हें ये समझ लेना चाहिए कि सीनों में आग जल चुकी है। हिमालय से निकलने वाली क्रांति की ये गंगा अब अपनी मंजिल पर आकर ही रूकेगी क्योंकि देश की सरकार में वो बूता नही है कि इस धारा को काट सके ।


Thursday, May 12, 2011

पियक्कड़ पिता और बारात का नागिन नाच


अबे उस प्रेस वाले के जाके चांटा मार, इतनी देर हो गई साला प्रेस कर रहा है या कोयले की फैक्ट्री से कोयला निकाल रहा है..अबे हाँ यार वहाँ दुल्हा घोड़े पर चढ़ गया यहाँ कपड़े प्रेस होकर नही आए। इतना कहते ही राहुल फिर से अपने चेहरे पर पाऊडर पोतने में मशगूल हो गया। दरअसल ये सारी कवायद राहुल के जिगरी दोस्त और मेरे हालिया बने दोस्त सुमित की शादी के लिए थी। उसी हड़बडी में राहुल बेचारे प्रेस वाले पर बरस रहा था। ये भी बताना जरूरी है कि एक अनुमान के मुताबिक उस दिन दिल्ली में 15 हजार शादियाँ थी। अंदाजा लगाना मुश्किल नही है कि उस प्रेस वाले का उस दिन क्या हाल होगा। राहुल जैसे न जाने कितने छोकरों की कॉलर की क्रीज़ बैठाने में उसकी कोयले की प्रेस धकाधक लगी होगी। मज़े की बात तो ये है कि राहुल की हड़बड़ाहट ने उसे गालियों का शहंशाह बना दिया था। बेचारा ग्रेजुएट राहुल ये भी भूल गया कि दुल्हा घोड़े पर नही घोड़ी पर बैठकर अपनी दुल्हन को लाता है। खैर राहुल के कपड़े आ गए और उसने उन्हें पहन भी लिया। राहुल बिना पूछे ही सारी बातों का जवाब दे रहा था उससे किसी ने नही पूछा कि नए कपड़े क्यों नही लाया, पर उसने बता दिया कि उसे नए कपड़े खरीदने का टाइम नही मिला। दिलचस्प है..राहुल कोई काम नही करता, ग्रेजुएशन के बाद पिछले एक साल से खाली है फिर भी कहता है टाइम नही मिला। खैर ये भी सच है कि खाली बैठना भी आजकल बिजी होना कहलाता है। बहरहाल आगे बढ़ते हैं। ये तो सुमित की शादी का ट्रैलर था जिसमें राहुल को दिखाया गया है लेकिन द ग्रेट इंडियन मैरिज ड्रामा तो अभी बाकी है। राहुल का फोन दनादन बज रहा था..आखिर उसे चाहने वालों की फेहरिस्त भी तो कम नही है ना। मैं बेकार में राहुल के पीछे ऐसे घूम रहा था मानों की मैं उसका शार्गिद हो गया। हाँ घूमना भी मजबूरी था। खैर एक घंटे के फैशन के बाद हम पहुँच गए सुमित की बारात में शामिल बस के पास। बस खचाखच भर चुकी थी। ऑफिस में काम ज्यादा कर लिया था इसलिए सोचा था कि बारात में नही जाऊंगा लेकिन राहुल की जिद ने मजबूर कर दिया। खैर फिर सोचा कि बस में पहले ही सीट पर जाकर बैठ जाऊंगा लेकिन मेरी टाइमिंग ने मुझे खड़ा होने पर मजबूर कर दिया। उस टाइम मन तो ऐसा कर रहा था कि राहुल को गालियाँ सुना दूँ। लेकिन क्या करूँ कमबख्त दोस्ती का ख्याल आ गया। बारात की बस में दिलचस्प ये था कि सीटों पर वही लोग ज्यादा तादात में बैठे थे जो सुमित के गाँव से आए थे। दरअसल गाँव के और शहर के लोगों में फर्क करने में देर नही लगती। शहरी फूहड़ता और ग्रामीण भोलापन(आगे भोलापन मेरी समझ आ गया) दोनों के बीच गहरी खाई होती है। खैर बस चली..बसवाला ताव में आ गया और उसने स्टीरियो के माध्यम से मुन्नी को बदनाम और शीला की जवानी का बखान करना शुरू कर दिया। अगर मेरा अंदाजा सही है तो आधे घंटे के सफर में कम से कम 3 बार उसने मुन्नी को बदनाम किया। उसी आधे घंटे में दो बार तो शीला की जवानी का भी प्रदर्शन हुआ होगा। मन में आया कि गुलिस्तां का बर्बाद करने में तो एक ही उल्लू काफी होता लेकिन यहाँ बस में तो उल्लूओं की पूरी जमात भरी थी..मुझे गुलिस्तां का अंजाम समझने में देर नही लगी। खैर मुन्नी और शीला एक साथ हों और सलमान और अक्षय न आए ऐसा तो हो ही नही सकता। बस में बैठे कई लौंडे खड़े होकर संकरे से पायदान में डाँस करने लगे। उनका डांस तो ऐसा था गोयाकि कई बार डांसर्स को शर्म आ जाए। खैर इस ढीले कैरेक्टर के साथ बारात पहुँच गई अपने गंतव्य स्थल तक। आहें भरते हुए लोग बस से उतरना शुरू ही हुए थे कि एक अजीब सी हंसी ने सबको चौंका दिया। धीरे-धीरे हंसी का शोर बढ़ता गया..पता चला कि जहाँ बस वाले ने बस रोकी थी वहाँ कीचड़ थी और उस कीचड़ में दो ने तो अपनी पेंट खराब करा ही ली। मुझे भी हंसी आ गई। बेचारे ड्राइवर को भी सज़ा के रूप में दो गालियाँ मिली। खैर बस थोड़ी आगे रोक दी गई। सभी उतरे। और तलाशने लगे कोई कोना..हल्के होने के लिए। कोने की तलाश एक नवनिर्मित घर पर खत्म हुई। सुकुं की आह समझने में देर नही लगी। बारातियों ने अच्छी तराई कर दी थी नवनिर्मित घर की....। 30 मिनट इंतजार के बाद बैंड और ढोल दूल्हे की घुड़चढ़ी के साथ तैयार हो गए। अब बारी थी नागिन डांस की। बैंड की पों-पो के साथ शुरू हुआ नागिन डांस का दौर। अजीब प्रर्तिस्पर्धा का दौर था वो। प्रर्तिस्पर्धा बैंड और ढोल के बीच, और प्रर्तिस्पर्धा शहरी और ग्रामीण डांस के बीच। लेकिन एक दर्शक के तौर पर कह सकता हूँ कि इस डांस की प्रर्तिस्पर्धा में गाँव वालों ने धुआं उठा दिया। डांस तो खैर वो नही था बल्कि वो था ग्रेट इंडियन नागिन डांस। हवा में कुछ इस तरह से वो पैर हिला रहे थे मानो सीधे हवा को चुनौती दे रहे हों। सिर पर नागिन सरीखा फन बनाकर कुछ ऐसे भाव दे रहे थे मानो डस के पूरी बारात को अचेत कर देंगे। कुछ तो इस तरह का डांस कर रहे थे जैसे बदन पर चीटिंयों का हमला हो गया हो। डाँस का ऐसा कोई स्टेप नही था जो सुमित की बारात में अप्लाई नही हुआ। कुछ नए नवेले डांसर्स ने तो स्टेप मारने भी शुरू कर दिए। भई वाह मज़ा आ गया। शक्ल के भाव कुछ ऐसे मानों दस्त लग गए हों। गौर करने वाली बात ये भी थी कि गाँव वाले ज्यादातर बैंड पर अपने नृत्य का प्रदर्शन कर रहे थे वहीं शहरी लौंडे ढोल की चौकड़ी पर पैरों को हवा में उछाल रहे थे। गाँववालों के डांस ने उनके प्रति मेरे भोलेपन वाली विचारधारा को गहरा धक्का पहुँचाया। बस में शहरी लौंडों के डांस को बदतमीजी भरा कहने वाले सुमित के ग्रामीण रिश्तेदारों ने तो यहाँ रायता ही फैला दिया। औरतों के विरोध के बाद एक बुजुर्ग अंकल ने आकर उनके नागिन डांस को पिटारे में बड़ी मुश्किल से बंद किया। लेकिन वो मान जाएं..ऐसा हो नही सकता..5 मिनट बाद फिर एक-दो करके वो आए और सड़क रूपी मंच पर कूदना शुरू कर दिया। लेकिन अब उन्हें कोई रोकने नही आया। शराबियों की पूरी जमात ने तो ऐसा डांस किया मानो सुमित की शादी की सारी खुशी सिर्फ उन्हीं को हुई। अब वो खुशी थी या पव्वे का नशा, वो तो उन नशेड़ियों से अच्छा कोई नही बता सकता। मेरी आंखो के सूक्ष्म निरीक्षण ने मोहब्बत के मोहपाश में बंध चुकी आंखों को भी देखा। कुछ लौंडे और छोरियों की आंखों को देखकर ऐसा लग रहा था कि वो फैशन के लबादे में सिर्फ एक-दूसरे के लिए ही लिपटकर आए हैं। लेकिन उन्हें ये नही पता होगा कि फैशन के दौर में गारंटी की इच्छा फिज़ूल है। चलिए कुछ लड़के लाइन क्लियर होने का इंतजार तो कर ही रहे थे। ये तो पता नही कि उनकी शाख पर चिड़िया बैठी या नही लेकिन इतना कहा जा सकता है कि नज़रों की उड़ान लगातार जारी रही। इन सब घटना-दुर्घटनाओं के साथ बारात पहुँची लड़की पक्ष के दरवाजे पर..लेकिन दरवाजे तक दूल्हे के साथ सिर्फ कुछ ही रिश्तेदार पहुँचे। बाकी पहुँचे उस जगह जहाँ लड़की वालों की तरफ से खाने और नाचने के लिए डी.जे. का इंतजाम किया गया था। दूल्हे के स्वागत के दौरान अजीब वाक्या सामने आया..दूल्हे का पियक्कड़ पिता लड़कीवालों की दहलीज से टकराकर धड़ाम से गिर गया। और मजे की बात देखिए कि उसे उठाने के लिए सबसे पहले उसके पियक्कड़ दोस्तों का हाथ बढ़ा। अचानक बेकग्राऊंड आवाज़ निकली लो हो गया स्वागत, दंडवत प्रणाम भी स्वीकार करें। पता नही चला कि ये किसके मुखारबिंद के वचन थे, लेकिन थे बड़े सटीक। खैर गिरे हुए बाप को उठाया गया, संभाला गया, उनके सफेद सफारी सूट पर गिरने के बाद रंगोली बन गई थी। मेहनत खराब। चलिए लड़कीपक्ष की तरफ से सजावट के लिए बनी रंगोली बारातियों की तरफ से स्वीकार हुई और उस स्वीकार्यता के अगुआ बने हमारे दूल्हे के पियक्कड़ पिता.। हम भी टेंट की तरफ रवाना हुए। भूख के चूहों ने पेट में कई छेद कर दिए थे। डी.जे.पर देखा तो लौंडों ने धमाचौकड़ी मचा रखी थी। डी.जे. पर शीला-मुन्नी के अलावा कैरेक्टर ढीला करने के पूरे इंतजाम थे। शामियाने में नजर दौडाई तो देखा एक शख्स सबको आर्डर देता फिर रहा था। हो न हो वो लड़की का मजलूम बाप होगा..मजलूम क्यों! वो इसलिए क्योंकि लड़के के पियक्कड़ पिता की लादेन सरीखी हुकुमत के सामने लड़की के पिता तो मनमोहन सिंह ही लग रहे थे। भारतीय समाज भी अजीब है यहाँ बेटी और दहेज देने वाला दब्बू बनकर घूमता है तो लेने वाले की चौड़ाई बढ़ जाती है। जैसे उसने बेटा नही मर्यादा पुरूषोत्तम राम को पैदा कर दिया है। इस सारे ड्रामे के बीच खाना खाने की बारी आई, मुंह में पहला निवाला डाला ही था कि पीछे से आवाज़ आई कि अबे कोल्डड्रिंक है या पानी..मेरा निवाला हाथ से प्लेट की तरफ अग्रसर हुआ...शक्ल देखी तो पाया शराब में टुन्न राहुल होंठों से पानी के गिलास को लगाए बैठा है और उसे उसमें कोल्डड्रिंक नज़र आ रही है। शुक्र है कुछ और नही दिया वरना उसे तो कोल्डड्रिंक समझकर पी जाता। बड़ी मुश्किल से दिलासा दिया राहुल को। खाना खाते हुए कई तो भुख्ड्डों की फौज के सिपहसलार लग रहे थे। एक साहब की प्लेट तो ऐसी घुमी की सारी लाल चटनी राहुल के झक्क सफेद कोट पर औंधी पड़ गई। पता चला कि चटनी गिराने वाले साहब भी टुन्न हैं। चौंकने की बात है कि दो टुन्न मिले तो जूतमपैजार नही हुई..लगे दोनों गले मिलने..अजी साहब रिश्तेदारी निकल आई..पता नही सारे पियक्कड़, रिश्तेदार कैसे हो जाते हैं। डी.जे. पर वही आलम था, लात-घूंसे सब चल चुके थे। अजी एकदूसरे पर नही...हवा में। चलिए खाने का स्वाद ले लिया...धमाचौकड़ी भी खूब हुई..अब वक्त आ चुका था घर जाने का...दरअसल शादियों में यही होता है। खासकर लड़के की शादी में..बारात खाना खाकर रफ्फू चक्कर हो जाती है। बेचारे दूल्हे को परिवार वाले और कुछ दोस्ती का दामन थामें दोस्तों के साथ दुल्हन को घर तक लाना पड़ता है। ये बाराती भी सही हैं..खाना खाते ही दूल्हे को बुरे वक्त में छोड़कर निकल लेते हैं। भला हो सभी दूल्हों का। खैर इस बार भी बस में देर से पहुँचने की सज़ा मिली..सीट तो नही मिली लेकिन सीढ़ियों पर बैठकर जाने का जो सुकूँ था वो शायद गद्देदार सीट पर भी न मिलता क्योंकि सारे बाराती सेट होकर अपनी सीटों पर चुप्पी साधे बैठे थे..बस चली और फिर सिर्फ बस की ही ध्वनि सुनाई दे रही थी क्योंकि बस का हंगामा सो चुका था...ऐसा लग रहा था कि ये तूफान से पहले का सन्नाटा है..क्योंकि सुमित की शादी चरम पर थी।

Wednesday, May 11, 2011


तेरे झूठ से मुझे कोई गिला नही है,

मेरे सच की तूने कभी परवाह नही की,

सोचा था,तेरी परवाह से तेरा माज़ी बन जाऊंगा,

लेकिन तूने मुझे बाग के फूल सा उखाड़ फेंका

राह चलते तेरा ही ख्याल किया करता था,

पर तूने उस अंजूमन को उजाड़ दिया.

बड़ी मुश्किल से संभलना सीख रहा था,

लेकिन महफिल में फिर तेरा नाम जिक्रे-आम हो गया.

Friday, April 8, 2011

शहादत..मोमबत्ती या आणविक विस्फोट


बीबीसी पर एक खबर पढी जिसने मुझे झकझोर के रख दिया। खबर थी एक युवा फिल्मकार पुनीत प्रकाश की फिल्म मोमबत्ती की समीक्षा से संबंधित। लेकिन उस समीक्षा ने मन में न जाने कितने ही सवाल खड़े कर दिए। देश पर मरने वाला कोई भी व्यक्ति चाहे वो सैनिक हो या न हो शहीद कहलाता है। लेकिन शहीद की भी कैटेगरी होती हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में अगर समझा जाए तो मुंबई हमले में मरने वाला कोई सैनिक दंतेवाड़ा में नक्सलियों की गोलियों से मरने वाले शहीद से ज्यादा बड़ी शहादत रखता है। इसमें कई लोगों को आश्चर्य भी हो सकता है लेकिन ये सच्चाई है कि हमारे देश में शहीदों की भी कैटेगरी बनी हुई है। हाल ही में 6 अप्रैल गुजरा है। क्या आप जानते हैं कि इस तारीख का जिक्र यहाँ क्यों किया जा रहा है। वो इसलिए किया जा रहा है क्योंकि 6 अप्रैल 2010 को छतीसगढ के दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में नक्सलियों की 1000 से ज्यादा की फौज ने 76 सीआरपीएफ के जवानों की नृशंस हत्या कर दी थी। सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन की इस टुकड़ी में कुल 80 जवान थे जिसमें से 76 शहादत को प्राप्त हुए। देश में हर साल 26/11 को श्रद्धांजलियों का तांता लग जाता है। मुंबई के शहीदों को याद किया जाता है। कई लोगों को तो उनके नाम तक याद हैं। ईमानदारी से बताएं कि दंतेवाड़ा में मरने वाले कितनें शहीदों के नाम आपको याद हैं? जवाब आपने सोच लिया होगा! दरअसल मैं दोनों हमलों में शहादत को प्राप्त हुए रणबांकुरों में अंतर नही कर रहा हूँ । दरअसल मैं आपको सरकार की सोच से अवगत करा हूँ जिसमें शहादत को अलग-अलग चश्मों से देखने का रिवाज़ बन चुका है। दरअसल सरकार जानती है कि किस शहीद के कारण वोट मिलेंगे और कौनसा शहीद विभिन्न अवसरों पर काम आएगा। दंतेवाड़ा में शहीद हुए ये जवान अपने-अपने गाँव में अब बुत्त के रूप में पहचाने जाएंगे। हो सकता है इनके इलाके का विधायक इनकी शहादत दिवस पर बुत्त पर माला चढा दे वरना पूरे साल तो पक्षियों की गंदगी का ही शिकार होते हैं शहीदों के बुत्त। अखबारों में नित हमारे जवानों की शहादत की खबर छपती रहती है। उन खबरों से सरकार या सरकारी नुमाइंदो पर कोई फर्क नही पड़ता। फर्क पड़ता है तो शहीद के परिवार वालों को जिन्होंने अपने बेटे को देशसेवा के लिए भेजा। दुर्भाग्य तो तब और हावी हो जाता है जब शहीद की शहादत का मुआवजा मिलने के लिए शहीद की पत्नी या उसके बेटे को ये साबित करना पड़ता है कि वो शहीद की पत्नी या उसका बेटा है। सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद मुआवजा मिलता है वो भी किश्तों में। ये भावना निश्चित तौर पर एक माँ के मन में अपनी ही सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा करती है। ये आक्रोश एक सैनिक तो पैदा नही करता अपितु एक राष्ट्रविरोधी जरूर पैदा करने का माद्दा रखता है। देश की मीडिया की इस मामले में बड़ी भूमिका हो सकती है लेकिन दुर्भाग्यवश मीडिया भी अपनी भूमिका को एक दायरे में बांधे रखता है। जब भी शहीदों को हक दिलाने की बात आती है तो मीडिया किसी आंदोलन का इंतजार करती है ताकि उसके आसरे खबर बन सके। सैनिकों के लिए बोर्ड तो बने मगर उनकी हालत शहीद से कम नही है।

सवाल कई है कि क्या देश पर कुर्बान होने वाले सैनिकों की शहादत यूं ही तौली जाती रहेगी। शहीद का बेटा नेताओं की बरसी पर श्रद्धांजली को देखता है, क्या उसके मन में ये बात नही आएगी कि उसके शहीद पिता को भी कोई श्रद्धांजली दे? दरअसल हमें हालात बदलने का इंतजार नही करना चाहिए हमें अपने-अपने स्तर पर कोशिश करनी चाहिए कि कैसे वतन पर मिटने वालों के आखिर निशां को बचाकर रखा जा सके। सवाल बड़ा है कोशिश की जा सकती है। अब ये हम पर निर्भर करता है कि कोशिश किस रूप में और कब से शुरू की जाए। मेरे हिसाब से तो ये समय सबसे उचित है।

Thursday, April 7, 2011

नेटवर्किंग..अन्ना की क्रांति

अन्ना हजारे का अनशन रंग ला रहा है। अभी तो सिर्फ दो ही दिन हुए है, अभी तो पूरा आंदोलन बाकी है। जिस तरह से समय के साथ साथ सरकारी नुमाइंदो के बयान लोगों के सामने आ रहे है उससे तो यही साबित होता है कि सरकार के मन में कही न कहीं डर व्याप्त हो चुका है। डर व्याप्त होना स्वाभाविक भी है क्योंकि जिस तरह से अन्ना के समर्थन में देश भर के लोग या ये कहें कि विदेशों के लोग भी उतर आए है उससे सरकार बुरी तरह से डर गई है। आने वाले समय में चुनाव भी है उससे सरकार को अपना जनाधार जाने का डर लगा ही हुआ है। पाँच राज्यों में होने वाले चुनाव सरकार के लिए निश्चित तौर पर लोकसभा चुनावों की जमीन तो तैयार करेंगे ही उसके साथ उनका परिणाम कार्यकर्ताओं के उत्साह को भी प्रभावित करेगा। जिस तरह से इस आंदोलन की धार तेज हो रही है उससे अन्ना के साथ विशाल जनसमर्थन जुड़ता जा रहा है। एक फौज के रूप में लोग विभिन्न माध्यमों को अपना हथियार बनाए हुए हैं। जिस रुप में लोगों को जो माध्यम मिल रहा है लोग उस माध्यम से अन्ना के समर्थन में उतर गए है। अन्ना के साथ जो लोग खड़े हैं वो अपने राजनीतिक व्यक्तिव की वजह से नही अपितु सामाजिक जिम्मेदारियों की वजह से पहचाने जाते है। जिनमें बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश के नाम शामिल है। अब एक ही मंच पर जब इतने लोग इकट्ठे होंगे तो स्वाभाविक है कि सरकार पर गहरा दवाब बनेगा।लेकिन इन सब के बाद अन्ना के समर्थन में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जो माहौल बना है उससे एक नई क्रांति का सूत्रपात हो रहा है। देश के हाइली क्वालिफाइड वर्ग में भी अन्ना का संदेश फेसबुक, टिव्टर ऑरकुट के माध्यम से धड़ाधड़ पहुँच रहा है। आश्चर्य की बात ये है कि इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कार्टून केरेक्टरों के चित्र को टेग करने वाले युवा भी अन्ना पर लिखे कमेंट को ध्यान से पढकर उस पर उनका साथ देने का वादा कर रहे हैं। कुछ लोग इसकी आलोचना भी कर रहे है, और कुछ तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर अन्ना के आंदोलन को टाइम फिजूली का हथकंडा भी मान रहे हैं। लेकिन गौरतलब बात ये है कि अन्ना अब जंतर-मंतर के आंदोलन से फेसबुक, टिव्टर, ऑरकुट तक अपनी पहुँच बना चुके है। लोग मेल के आसरे अन्ना के आंदोलन के कई रुप अपनी मित्रमंडली में पहुँचा रहे हैं। फेसबुक लोगों के आमंत्रण का माध्यम बन रहा है। समाज के प्रति जागरूक लोग अपनी वॉल पर जाकर अपने समूह के लोगों को आंदोलन में आने का निमंत्रण भेजा। भारत की जनता के मस्तिष्क में एक ग्लैमरस छवि बनाए हुए हमारे बॉलीवुड के कलाकार भी अन्ना को टिव्टर के माध्यम से खूब समर्थन दे रहे हैं।

हाल ही में जिस तरह से इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने अपनी भूमिका निभाई है उसने निश्चित तौर पर कई क्रांतिकारियों को तो पैदा कर ही दिया है। मिस्त्र, लीबिया, यमन और न जाने उन जैसे कितने ही देशों में इन साइट्स का लोहा माना गया है। ओबामा को अमेरिकी राष्ट्रपति बनाने में भी इन साइट्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गौरतलब बात ये है कि हमारे देश के तथाकथित इंफोटेनमेंट न्यूज चैनलों ने भी सोशल नेटवर्किंग को हाथों हाथ लिया है। कई न्यूज चैनलों ने तो अपने हर बुलेटिन में टिव्टर पर आने वाले कमेंट्स को जगह देनी शुरू कर दी है। इस मामले में टाइम्स नाऊ ने सबको पछाड़ दिया है। मंत्री नेता पत्रकारों को बाइट देने से पहले सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पहले कमेंट लिख देते हैं। दरअसल ये साइट्स खबर प्राप्ति का एक दमदार माध्यम बनती जा रही है। अब मुंबई में बैठी शिवानी दिल्ली में बैठे अपने दोस्त नाजिम को अन्ना के आंदोलन की गतिविधियाँ बताती है। अन्ना सोशल नेटवर्किंग साइट्स के हीरो बन चुके हैं और उनका आंदोलन बन चुका है महान फिल्म का प्रदर्शन। हम चाहते हैं कि अन्ना को उनकी इस फिल्म के लिए जल्दी ही ऑस्कर मिले और बेस्ट निर्देशक का अकादमी अवार्ड मिले किशन बाबूराव हजारे यानि अन्ना हजारे को।


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Tuesday, January 25, 2011

विकास तभी संभव जब लोगों के आशियाने बने




लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधीश जनता के सेवक के तौर पर नियुक्त किए जाते हैं। ये लोग कहने को तो सत्ताधीश होते हैं लेकिन इनका असल उद्देश्य जनता की छोटी से छोटी जरुरतों को पूरा करना होता है। जनता का हित सर्वोपरि रखना ही लोकतंत्र की पहली औऱ आखिरी शर्त होती है। रोटी,कपडा और मकान एक आदमी को मिल रहा है या नही, या वो किस रुप में मिल रहा है ये भी जानने का दायित्व लोकसेवकों को दिया जाता है। रोटी कपडा और मकान एक इंसान की पहली जरुरत होती है या ये कहें कि इंसान कहलाने के लिए आपके पास इन तीनों चीजों का होना जरुरी है, तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी।

देश की राजधानी दिल्ली ने कई लोगों को आशियाना दिया है बस फर्क है तो सरकार की नितियों में किसी को अनाधिकृत बना दिया है तो किसी का आशियाना प्रशासन के नियमों पर खरा उतरता है। लेकिन रहने वाले के लिए तो आशियाना अनाधिकृत और अधिकृत कुछ नही होता, वो तो बस एक घर होता है जहाँ उसके बच्चे स्कूल से जीतकर मैडल लाते हैं तो कोई बेटा या बेटी अपनी माँ को अपनी पहली सैलरी इस आशियाने में थमाती या थमाता है। किसी की बेटी की डोली इन आशियानों से उठती है तो किसी की मय्यत के दो आंसू इन्हीं आशियानों में बहाए जाते हैं। एक आदमी जब घर बनाता है तो कई सपने उसकी आंखों में घर बना चुके होते हैं लेकिन जब प्रशासन का एक आदमी उस घर पर अपनी आंखे तरेरता है और उसके निर्माण को जनता के द्वारा चुने गए लोकसेवकों के बनाए नियमों का हवाला देकर रुकवा देता है तो एकबारगी दिल में ये ख्याल आता है कि आखिर ये आज़ादी किस काम की है! दिल्ली में सरकार ने नियमों के निर्माण और उन नियमों के कार्यान्वयन के लिए डीडीए,एमसीडी को कुछ अधिकार दिए हैं और इनकी मदद के लिए पुलिस तो हमेशा से तैयार ही रहती है। दिल्ली में घर बनाने वालों को प्रशासन से अनापत्तिप्रमाण पत्र लेना पडता है अगर व्यक्ति अनाधिकृत कालोनी में रह रहा है तो उसे कोई अधिकार नही है घर बनाने का (कुछ अपवादों को छोडकर)। हालांकि सरकार समय समय पर अलग अलग प्रकल्पों के माध्यम से ये प्रयास करती रहती है लोगों को आशियाना बनाने में कोई परेशानी न आए।
दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेशानुसार अनाधिकृत बस्तियों में घर बनाने पर कड़ी आपत्ति है जिसका उल्लंघन करने पर सजा का भी प्रावधान है। अनाधिकृत निर्माण को किसी भी तरह से जायज नही ठहराया जा सकता लेकिन सरकार को ये आवश्यकता है वो ये भी जाने की उस अनाधिकृत निर्माण के पीछे मंशा क्या है। एक परिवार 25 या 50 गज की जगह पर अपना घर बनाकर रहता है। अचानक उसे जरुरत महसूस होती है कि वो अपने घर का पुर्ननिर्माण करे। वो शुरु हो जाता है उस निश्चित जगह में अपना घर बनाने के लिए जिस निश्चित जगह में उसका घर पहले बना था, लेकिन जब वो घर बनाना शुरु करता है तो अचानक उसे रोकने के लिए प्रशासन के नुमाईंदे आ जाते हैं और उसके घर के निर्माण को रुकवा देते हैं। सवाल ये उठता है कि जब एक आदमी अपने निश्चित क्षेत्र में घर बनाने की कोशिश कर रहा तो उसे रोका क्यों जाए? ऐसा लगता है कि प्रशासन धाक लगाए बैठा है कि कब एक आम आदमी अपना घर बनाए और कब प्रशासन उसे अनाधिकृत का प्रमाण पत्र पकड़ाकर उसके घर को बनने से रोक दे। ये दशा समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग भुगत रहा है। ये तो सिर मुंडाते ही ओले पडने जैसा हो जाता है। ये दशा निसंदेह भ्रष्टाचार को बढावा देती है। अपने अर्धविकसित घऱ को बनाने के लिए फिर शुरु होता है खरीद-फरोख्त का खेल। जो जेब गर्म कर देता है वो कुछ दिनों बाद अपने गृहप्रवेश की दावत दे देता है और जो जेब गर्म करने में असमर्थ होता है वो सिर्फ सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटता रह जाता है।
दरअसल प्रशासनिक नुमाईंदे इस सच्चाई से रुबरु नही होते वो तो रिपोर्टों पर विश्वास करते हैं। जमीनी सच्चाई से सरोकार रखने को वो अपनी कार्यप्रणाली में शामिल नही करते। सरकार विकास के लिए करोडों रुपये का फंड जनता को मुहैया करवाती है लेकिन सवाल ये भी उठता है कि क्या घर बनाना विकास की श्रेणी में नही आता? सवाल ये भी उठ सकता है कि अनाधिकृत कालोनियों में घर बनाने पर पाबंदी है तो क्या अनाधिकृत कालोनियों को दिल्ली सरकार की तरफ से दिए जा रहे 170.99 करोड रुपये व्यर्थ हैं। गौरतलब है कि अभी हाल ही में दिल्ली सरकार ने अनाधिकृत कालोनियों के विकास के लिए 45 करोड रुपये भी मजूंर किए हैं। अब राशी बढकर 216.69 करोड़ रुपये हो गई है। सरकार ने एक नियम और बनाया जिसके तहत अनाधिकृत/नियमित कालोनियों व गाँवों में रहने वालों को मकान बनाने मे बड़ी राहत मिलने जा रही है। बिल्डिंग बायलॉज बदलने से लोगों की मकान बनाने की ख्वाहिश जल्द पूरी होती नजर आएगी। शहरी विकास मंत्रालय ने तो इसे मंजूरी दे दी है। इसी महीने इसके लिए गजट नोटिस भी जारी किया जा सकता है। इसके लागू होने के बाद इन क्षेत्रों में डीडीए और एमसीडी के पहले के भवन उपनियम लागू नही होंगे। इसके तहत विशेष क्षेत्र, नियमित/अनियमित कालोनियों तथा गाँवों को जल्दी ही डीडीए नोटिफाईड कर देगा। जिसके बाद लोगों को मकान बनाने में कुछ राहत मिल सकेगी। छोटे प्लाटों का नक्शा पास कराने में भी आसानी होगी। विकास के लिए पार्षदों को इस बार जो 50 लाख रुपये मिले हैं उससे क्षेत्र का विकास तो हो जाएगा लेकिन लोगों की मूलभूत जरुरत यानि की मकान के बारे में सरकार को नियमों में निसंदेह लचीलापन लाना जरुरी हो गया है।
दिल्ली कई अनाधिकृत कालोनियों को अपनी गोद में समाए हुए है। जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा वर्ग निवास करता है इस बड़े वर्ग का विकास तभी संभव है जब इन्हें एक खुला वातावरण मिले। सरकार को जरुरत है अनाधिकृत निर्माण को रोकने की। अनाधिकृत कालोनियों में अपने क्षेत्र में निर्माण करने वालों को रोकने का कोई औचित्य नजर नही आता। सरकार को जरुरत है जागरुकता संबंधी कार्यक्रम चलाने की जहाँ लोग इन नियमों को अच्छी तरह से जान सकें। बिना लोगों को जागरुक किए उनके आशियानों को बनने से रोका जाएगा तो निसंदेह विरोध का स्वर मुखर होगा। अपनी ऊंगलियों को मैं बस ये अंतिम पंक्ति कहकर आराम देना चाहुँगा कि­­_ _
“उम्मीदों के साए में आप तो आशियाने बनाने वाले हो,
खुदा ने पतझड़ बनाया है पत्ते गिराने के लिए”

Thursday, January 13, 2011

दुस्साहस की इंतेहां


चीन ने अरुणाचल प्रदेश के दो नागरिकों को स्टेपल वीजा देकर सीधे तौर पर फिर से भारत की संप्रभुता पर चोट की है। चीन के इस दुस्साहस ने एक बार फिर ये साबित किया है कि कितनी भी वार्ताएं हो जाएं लेकिन चीन की भारत के संबंध में जो भी नितियाँ है वो नही बदलने वाली। नत्थी वीजा की आड़ में चीन ये जता देना चाहता है कि अरुणाचल को वो किसी भी कीमत पर भारत का हिस्सा नही मानेगा।चीनी प्रधानमंत्री के भारत दौरे के दौरान भी स्टेपल वीजा से लेकर सीमा विवाद औऱ तिब्बत तक के विषय पर चर्चा हुई थी वो बात अलग है कि चर्चा सिर्फ चर्चा के लिए ही हुई थी,न तो उसमे कोई गहनता थी और न ही विवाद सुलझाने की मंशा।चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत आए थे सिर्फ अपने आर्थिक हितों की पूर्ति करने के लिए। न जाने भारत इस बात को क्यों नही मान रहा कि चीन औऱ भारत के तथाकथित मित्र देश भारत को एक बाजार की दृष्टि से ज्यादा और कुछ नही मानते। पाकिस्तान को विभिन्न रुपों में मदद देकर चीन भारत को प्रभावित करने की कोशिश करता रहता है। इस बात से भी इन्कार नही किया जा सकता कि भारत में पनप रहे नक्सलवाद या माओवाद के पीछे चीन का हाथ नही है। दरअसल ये चीन कि विदेश नीति का हिस्सा बन गया कि कैसे भारत जैसे उभरते देश को अस्थिर करके उसके विकास को रोका जा सके। जिस देश में लोकतंत्र समर्थकों को गोलियों से मरवा दिया जाता है उस देश से ये उम्मीद करना बेकार है कि वो खुद पर किसी भी तरह की मुसीबत आने पर किसी लोकतांत्रिक देश की लोकतांत्रिक नितियों के खिलाफ कोई कदम नही उठाएगा। ये सर्वविदित है भारत के पास अभी वो शक्ति नही है कि वो चीन का मुकाबला कर सके। शायद यही कारण है कि चीन लगातार हमारी मांगों के साथ सिर्फ खिलवाड़ कर रहा है। वो कहते हैं न कि शांति बकरी की तरह मिमियाने से नही मिलती शेर की तरह दहाडने से मिलती है। इसलिए अब समय आ गया कि शेर की तरह दहाडा जाए।

स्टेपल वीजा तो चीन के दुस्साहस का एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि चीन के इस हालिया दुस्साहस पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है। प्रकाश ने 12 नवंबर 2009 को जारी की गई ट्रैवल एडवाईजरी की याद भी दिलाई जिसमें चीन द्वारा जारी किए गए नत्थी वीजा को भारत से बाहर गैरकानूनी मानने की बात कही गई थी। दरअसल भारत को एक कड़ा कदम उठाने की जरुरत है। वो कदम ये भी हो सकता है कि भारत चीनी उत्पादों को खरीदना बंद कर दे। इससे कम से कम चीन को एक सबक मिलेगा और उसकी अर्थव्यव्स्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से भी निसंदेह चीन को झटका लगेगा। हालांकि ये कदम बहुत कड़ा है लेकिन कुछ तो करना ही पडेगा नही तो चीन का दुस्साहस समय के साथ और भी बढता रहेंगा।