
बीबीसी पर एक खबर पढी जिसने मुझे झकझोर के रख दिया। खबर थी एक युवा फिल्मकार पुनीत प्रकाश की फिल्म मोमबत्ती की समीक्षा से संबंधित। लेकिन उस समीक्षा ने मन में न जाने कितने ही सवाल खड़े कर दिए। देश पर मरने वाला कोई भी व्यक्ति चाहे वो सैनिक हो या न हो शहीद कहलाता है। लेकिन शहीद की भी कैटेगरी होती हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में अगर समझा जाए तो मुंबई हमले में मरने वाला कोई सैनिक दंतेवाड़ा में नक्सलियों की गोलियों से मरने वाले शहीद से ज्यादा बड़ी शहादत रखता है। इसमें कई लोगों को आश्चर्य भी हो सकता है लेकिन ये सच्चाई है कि हमारे देश में शहीदों की भी कैटेगरी बनी हुई है। हाल ही में 6 अप्रैल गुजरा है। क्या आप जानते हैं कि इस तारीख का जिक्र यहाँ क्यों किया जा रहा है। वो इसलिए किया जा रहा है क्योंकि 6 अप्रैल 2010 को छतीसगढ के दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में नक्सलियों की 1000 से ज्यादा की फौज ने 76 सीआरपीएफ के जवानों की नृशंस हत्या कर दी थी। सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन की इस टुकड़ी में कुल 80 जवान थे जिसमें से 76 शहादत को प्राप्त हुए। देश में हर साल 26/11 को श्रद्धांजलियों का तांता लग जाता है। मुंबई के शहीदों को याद किया जाता है। कई लोगों को तो उनके नाम तक याद हैं। ईमानदारी से बताएं कि दंतेवाड़ा में मरने वाले कितनें शहीदों के नाम आपको याद हैं? जवाब आपने सोच लिया होगा! दरअसल मैं दोनों हमलों में शहादत को प्राप्त हुए रणबांकुरों में अंतर नही कर रहा हूँ । दरअसल मैं आपको सरकार की सोच से अवगत करा हूँ जिसमें शहादत को अलग-अलग चश्मों से देखने का रिवाज़ बन चुका है। दरअसल सरकार जानती है कि किस शहीद के कारण वोट मिलेंगे और कौनसा शहीद विभिन्न अवसरों पर काम आएगा। दंतेवाड़ा में शहीद हुए ये जवान अपने-अपने गाँव में अब बुत्त के रूप में पहचाने जाएंगे। हो सकता है इनके इलाके का विधायक इनकी शहादत दिवस पर बुत्त पर माला चढा दे वरना पूरे साल तो पक्षियों की गंदगी का ही शिकार होते हैं शहीदों के बुत्त। अखबारों में नित हमारे जवानों की शहादत की खबर छपती रहती है। उन खबरों से सरकार या सरकारी नुमाइंदो पर कोई फर्क नही पड़ता। फर्क पड़ता है तो शहीद के परिवार वालों को जिन्होंने अपने बेटे को देशसेवा के लिए भेजा। दुर्भाग्य तो तब और हावी हो जाता है जब शहीद की शहादत का मुआवजा मिलने के लिए शहीद की पत्नी या उसके बेटे को ये साबित करना पड़ता है कि वो शहीद की पत्नी या उसका बेटा है। सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद मुआवजा मिलता है वो भी किश्तों में। ये भावना निश्चित तौर पर एक माँ के मन में अपनी ही सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा करती है। ये आक्रोश एक सैनिक तो पैदा नही करता अपितु एक राष्ट्रविरोधी जरूर पैदा करने का माद्दा रखता है। देश की मीडिया की इस मामले में बड़ी भूमिका हो सकती है लेकिन दुर्भाग्यवश मीडिया भी अपनी भूमिका को एक दायरे में बांधे रखता है। जब भी शहीदों को हक दिलाने की बात आती है तो मीडिया किसी आंदोलन का इंतजार करती है ताकि उसके आसरे खबर बन सके। सैनिकों के लिए बोर्ड तो बने मगर उनकी हालत शहीद से कम नही है।
सवाल कई है कि क्या देश पर कुर्बान होने वाले सैनिकों की शहादत यूं ही तौली जाती रहेगी। शहीद का बेटा नेताओं की बरसी पर श्रद्धांजली को देखता है, क्या उसके मन में ये बात नही आएगी कि उसके शहीद पिता को भी कोई श्रद्धांजली दे? दरअसल हमें हालात बदलने का इंतजार नही करना चाहिए हमें अपने-अपने स्तर पर कोशिश करनी चाहिए कि कैसे वतन पर मिटने वालों के आखिर निशां को बचाकर रखा जा सके। सवाल बड़ा है कोशिश की जा सकती है। अब ये हम पर निर्भर करता है कि कोशिश किस रूप में और कब से शुरू की जाए। मेरे हिसाब से तो ये समय सबसे उचित है।
बढ़िया है भाई , विचार तो बहुत अच्छे है , आजकल जो बाते किताबो में भी नहीं मिलती उसे आम जनता नहीं सोचती उनसे अवगत करा रहे हो आप पर ........ शायद व्यक्ति को पहचाने की काबिलियत नहीं है आप में , me myself is a all india national crime reporter, see my blog @ http://prabhat-wwwprabhatkumarbhardwaj.blogspot.com/
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