Thursday, December 30, 2010

सरकारी विद्रोह सरकार के खिलाफ


गढचिरौली के एडीएम ने जिस तरह से गृहमंत्री के दौरे पर सवाल उठाए है उससे ये साबित हो गया है कि कहीं न कहीं लोगों में सरकार के प्रति गहरी नाराजगी है उसके साथ उनमें अपनी ही सरकार के प्रति एक विरोध भी है। एडीएम राजेन्द्र कनफडे ने जिस तरह से देश के नेताओं की फिजूलखर्ची और उनके सरकारी ठंडे कमरों के निर्णयों पर सवाल उठाए हैं उसे किसी भी रुप में नजरअंदाज नही किया जा सकता। गढचिरौली महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक है जहाँ नक्सलियों का राष्ट्रविरोधी तांडव गाहे बगाहे देखने को मिल ही जाता है। ये सर्वविदित है कि सरकारी नुमाइंदों के द्वारा लगातार कागजी सर्वहितकारी निर्णयों से कुछ समय के लिए तो लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाई जा सकती है लेकिन उन्हें अधिक समय तक खुश नही किया जा सकता।दरअसल जब ये सरकारी निर्णय कागजों से निकलकर जमीन हकीकत को नही छू पाते तो लोगों में रोष बढता है शायद देश में नक्सल समस्या का कारण भी यही हुआ होगा। सामाजिक समानता और शहरों की तरफ लौटो के फौरी नारे के चक्कर में देश की आत्मा कहे जाने वाले गाँवों औऱ उनमें रहने वाले किसान और मजदूर वर्ग को देश की आम आदमी वाली सरकार भुलाती जा रही है।देश के गृहमंत्री का हैलिकॉप्टर गढचिरौली की धरती पर उतरता तो है लेकिन चिदंबरम वहाँ लोगों से मिलने की बजाए उनका हाल जानने की बजाए सरकारी अधिकारियों के साथ बैठकें करके और सीआरपीएफ के कैंप का दौरा करके लौट जाते हैं। सवाल ये उठता है कि जब इसी तरह की बैठकें ही करनी थी तो दौरे का ये दिखावा क्यों? चिदंबरम साहब ने तो अपने स्थानीय कांग्रेसी नेताओं से भी मिलने की जहमत नही उठाई।

पिछले 13 साल में 2 लाख से ज्यादा किसान मौत के आगोश में समा चुके हैं।हजारों करोड के राहत पैकेज के बाद भी किसान खेती के विकल्प के बजाए मिट्टी में मिल जाने के निर्णय को पहले स्वीकार करता है। चिंदबरम ने जिस गढचिरौली का दौरा किया है वो महाराष्ट्र में पडता है औऱ ये वही महाराष्ट्र है जहाँ दो साल पहले देश के प्रधानमंत्री किसानों के विकास के लिए हजारों करोड रुपये का अनुदान देकर गए थे। लेकिन वो अनुदान सिर्फ कागजों मे ही बंटता नजर आया। महाराष्ट्र से आने वाले देश के कृषि कम क्रिकेट मंत्री मंहगे खिलाडियों के लंच औऱ डीनर में तो आसानी से नजर आ जाते हैं लेकिन विदर्भ में किसान की मौत पर उसके भूखे मरते बच्चों पर वो एक नजर डालने की जहमत भी नही उठाते।जमीन पर उतरकर उसकी हकीकत को जानना और सरकारी अधिकारियों की फाईलों के आधार पर निर्णय लेने में फर्क होता है। गढचिरौली में गृहमंत्री का दौरा भी निश्चित तौर पर नक्सलियों के लिए संजीवनी साबित होगा क्योंकि अब नक्सलियों को लोगों को ये समझाने में आसानी होगी कि उनके मंत्री उनके होकर भी उनके हित में नही सोच सकते। मंत्री जी सैनिकों से मिलकर चले गए लेकिन उन सैनिकों की गोली के शिकार होने वाले परिवारों का क्या? उनकी तो सुध लेने वाला भी कोई नही है न ही नक्सली औऱ न ही उनकी लोकतांत्रिक सरकार। इन परिवारों को नक्सली इनकी ही तरह लगते हैं शायद यही कारण है कि हमें कई बार गावों में लोगों के कांधों पर बंदूके लटकी नजर आ जाती है। गढचिरौली के एडीएम पर नक्सली समर्थक होने के आरोप भी लगते रहे हैं लेकिन जिस तरह उन्होंने एक मंत्री के दौरे को आधार बनाकर सरकारी नितियों पर कटाक्ष किया है वो वाक्ये में चर्चा का विषय बन गया है।एडीएम के सवाल मौका है सरकार के लिए आत्मचिंतन का। लेकिन आत्मचिंतन तो वो करता है जिनमें आत्मा होती है इनकी तो आत्मा भी मर चुकी है। इन्हें सिर्फ पैसा बनाने का मौका चाहिए वो चाहे कामनवेल्थ गेम्स के माध्यम से मिल जाए या 2 जी स्पेक्ट्रम के घोटाले से। जनता लगातार परेशान है,मंहगाई,भ्रष्टाचार,सामाजिक असमानता,बेरोजगारी,महिलाओं पर ज्यादत्ती इन सभी परेशानियों से आदमी तिल तिल कर मर रहा है। सरकार इनके उन्मूलन के लिए नितियाँ भी बनाती है लेकिन उनका कार्यान्वयन ठीक से हो रहा है या नही उसका ध्यान रखना भी सरकार का ही काम है। दुर्भाग्य से सरकार उसी पर ध्यान नही दे रही है इसी कारण देश में कलमाडी और राजा जैसे लोग पैदा हो रहे हैं। देश में करीब 24 करोड परिवार हैं जिनमें 11 करोड के लगभग एपीएल,4 करोड के लगभग बीपीएल, ढाई करोड के आसपास अंत्योदय कार्ड धारक हैं। बाकि बचे परिवारों का कोई आंकडा नही है। क्या सरकार ने कभी राशन की दुकानों पर जाकर देखा कि वहाँ कितने परिवारों को राशन का वितरण इसी श्रेणी से हो रहा जिसका आंकडा सरकार दे रही है। शायद सरकार देखना ही नही चाहती क्योंकि भ्रष्टाचार का हिस्सा हर स्तर पर बंटा हुआ है।

राजनीतिक मजबूरियाँ भी अजीब चीज होती है किसी नेता या मंत्री के हाथ बांध देती है। शायद यही कारण है कि देश के प्रधानमंत्री को भी जाँच के दायरे में आना पड रहा है। लेकिन ये पारदर्शिता नही है औऱ ये कोई बहादुरी का काम भी नही है। उस देश के भविष्य का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नही है जिसमें प्रधानमंत्री पर ही भ्रष्टाचार के पोषण के आरोप लग रहे हों। एडीएम राजेंद्र कनफडे की नसीहत ने एक नई चर्चा को जन्म दिया है। उस चर्चा को ठंडा न होने देना ही सरकार की नाक में नकेल साबित होगा। ऐसा भी मुमकिन है कि बहुत जल्द हमें ये समाचार सुनने को मिले कि नक्सलियों से सांठगाँठ के आरोप में एडीएम राजेंद्र कनफडे को उनके पद से हटा दिया गया है।

Tuesday, December 14, 2010

अनुपमा की हत्या,हर घर में अनुपमा


मोहब्बत का अंजाम ये हुआ कि जंगल में प्रेमिका से पत्नी बनी अनुपमा की लाश के टुकड़े मिले। मोहब्बत का ये अंजाम शायद अनुपमा ने सोचा न होगा। अनुपमा ने मोहब्बत तो की मगर उसने इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नही दिया कि आखिर वो मोहब्बत किससे कर रही है।बात देहरादून में हुई अनुपमा की हत्या की हो रही है जिसमें हत्यारा कोई और नही बल्कि अनुपमा का पत्ति ही निकला। पत्नी के हत्यारे पत्ति तो हमारे देश में कई मिल जाएंगे लेकिन राजेश गुलाटी नाम के इस शख्स ने मोहब्बत करने वालों के लिए एक मिसाल कायम कर दी। राजेश गुलाटी ने जिस तरह से अपनी पत्नी की हत्या की है वो वाक्ये में ही वीभत्स है। ये घटना ये सोचने पर भी मजबूर करती है आखिर पत्नी की लाश के साथ कोई व्यक्ति दो महीने कैसे बिता सकता है। इस घटना ने पूरे देश में हाहाकार मचा दिया है। मीडिया वाले भी बेचारे लगे हुए थे गैंगरेप की खबरों में, उन्हें भी खिलवाड़ करने के लिए विषय मिल गया। वैसे राजेश ने इसी मामले में कुछ अच्छा किया कि मीडिया को कुछ दिन खेलने के लिए खबर दे दी। मीडिया में बार बार दिखाई जाने वाली खबर ने आधुनिक प्रेमी युगलों के मन मे एक दूसरे के लिए शंका पैदा कर दी है। अब प्रेमिका प्रेमी के शादी के प्रस्ताव के बाद कहती है कि कहीं अनुपमा की तरह मुझे भी तो मार नही दोगे!प्रेमिका प्रेमी से पूछती है कि जानू ये बताओ कि अगर हम झगड़ा करेगें तो तुम मुझे मनाओगे या काटकर फैंक दोगे।प्रेमिका का ये इमोशनल अत्याचार काफी हास्यास्पद लगता है औऱ उसके साथ गंभीर भी लगता है कि आखिर प्रेमिका को ये पूछने की जरुपत पड़ क्यों रही है? राजेश जैसे लवर कन्वर्टेड पत्ति का ये चेहरा भी हो सकती है अनुपमा ने ये सोचा भी नही होगा। एक फिल्म देखकर राजेश ने अनुपमा की फिल्मी स्टाईल में हत्या कर दी। बड़े इत्मीनान राजेश ने पत्नी के टुकड़े जंगल तक पहुँचाए वाया फ्रीज। दरअसल ये सीधे तौर पर ये इंगित करता है कि लोगों में भावनाएं लगभग मर चुकी है औऱ उन्हें खत्म करने में भौतिकवादी चीजों ने बड़ी भूमिका निभाई है।इस खबर को देखकर ये भी मालूम होता है कि संभ्रात जिंदगी जी तो जा सकती है लेकिन आपके मरने के बाद आपके पड़ोसी को भी ये खबर नही लगेगी कि पड़ोस में रहने वाले अनुपमा जैसों की मौत हो चुकी है।अब लोगों के अंदर भावनाएं मर चुकी है उनके पड़ोस की एक महिला कई दिनों से घर में दिखाई नही देती लेकिन लोगों को कोई मतलब नही है। खैर टीवी चैनलों में तरह तरह के ग्राफिक्स औऱ क्रोमास् के साथ दिखाई जाने वाली देश की इस भयानक कहानी को दिखाकर लोगों को सोचने पर तो मजबूर कर ही दिया है। राजेश ने अपने इकबालिया बयान में एक बात कही कि अक्सर उसका पत्नी से झगडा होता रहता था। शायद यही झगड़ा अनुपमा की मौत का कारण भी बना। अनुपमा ने थाने में एक रिपोर्ट लिखवाकर ही इतिश्री मान ली मगर उसने उस घरेलू हिंसा के खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाया हो ऐसा नही नजर नही आता।शायद अनुपमा कोई बडा कदम उठाती तो आज वो अपने पत्ति की हैवानियत का बखान करने में के लिए हमारे सामने खड़ी होती। ये मामला घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं को आवाज उठाने के लिए भी प्रेरित करेगा। दशहरे को रावण वध की जगह राजेश मे मन में एक हैवान ने जन्म लिया।उसी हैवान ने राजेश को ये हरकत करने के लिए प्रेरित किया। अब राजेश खुद को बचाने के लिए और जनता की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए ये कहता फिर रहा है कि उसने अनुपमा की हत्या बच्चों कि लिए की।उसका ये बयान गले से नही उतरता अब उन्ही बच्चों ने राजेश के खिलाफ गवाही दी। बच्चों का सहारा लेकर राजेश बच नही सकता। सरकार को भी ये नियम बनाने चाहिए कि घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं का सामना करने के लिए महिलाओं को प्रेरित किया जाए। एयरकंडिशन कमरों में घरेलू हिंसा एक्ट पर चर्चा से महिलाएं सुरक्षित नही हो सकती उनकी सुरक्षा के लिए जागरुकता और मॉनिटरिंग की जरुरत है। इसी का अभाव है कि अनुपमा जैसी महिलाओं को जान गंवानी पडती है। ईश्वर अनुपमा की आत्मा को शांति दे।और उसके हत्यारे पत्ति को कड़ी से कडी सजा मिले। सरकारी महकमों को सदबुद्धि मिले कि वो मॉनिटरिंग करें क्योंकि भारत की ये सच्चाई है कि यहाँ लगभग हर घर में एक अनुपमा रहती है।

Tuesday, December 7, 2010

अनकहे मगर जरुरी मुद्दे


फ्रांस के राष्ट्रपति का दौरा इस बार अविस्मरणीय बन गया है अव्वल तो उनके साथ उनकी पत्नी और पूर्व मॉडल कार्ला ब्रूनी भारत आई है और दूसरी कि भारतीय मीडिया अब उन्हें मुगल शासक अकबर की उपाधि से नवाजने लगा है क्योंकि फतेहपुर सीकरी पर अकबर ने भी संतान की दुआ की थी और उसकी वो दुआ पूरी भी हुई थी कुछ ऐसा ही फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने किया। वो भी अपनी पत्नी के साथ पहुँच गए फतेहपुर सीकरी। बेटे की दुआ मांगने। साथ ही ब्रूनी ने अपने बड़े बेटे की सलामती की दुआ भी मांगी। दरअसल देखा जाए तो इस बार फ्रांस के राष्ट्रपति एक राष्ट्राध्यक्ष कम एक याचक ज्यादा लग रहे थे। कयास लगाए जा रहे कि भारत के बड़े बाजार को देखकर जो पहल अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने की थी उसकी तरफ फ्रांस भी बढ रहा है। सरकोजी की भारत यात्रा को उसी कड़ी में रखकर देखा जा रहा है। वो अपने देश की तकनीक बेचकर भारत से खूब सारा पैसा बटोर लेना चाहते हैं। संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सदस्यता के लिए सरकोजी ने भारत का समर्थन भी किया उसके साथ पाकिस्तान को आतंक पर लगाम लगाने की नसीहत भी दी। सरकोजी को इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि उनके अपने देश फ्रांस में सिखों के साथ जो अन्याय हो रहा है वो असहनीय है। भारत की जनसंख्या में एक बहुत बडा तबका सिख संप्रदाय से संबंध रखता है इसके साथ ही सरकोजी जिस प्रधानमंत्री से हाथ मिलाएंगे वो खुद भी सिख है, इसलिए सिखों के हितों को नजरअंदाज करके भारत से दोस्ती का हाथ बढाना देश में रहने वाले सिखों की भावनाओं से खिलवाड़ है। हमे उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सिखों के विषय पर सरकोजी से बात जरुर करेंगे। कूटनीतिक स्तर पर इस विषय पर बात करना निश्चित तौर पर फ्रांस के सिखों के लिए एक अच्छा संदेश होगा। आने वाले समय में अगर फ्रांस में सिखों के हालात कुछ सुधरते हैं तो, फ्रांस के राष्ट्रपति का ये भारत दौरा सफल माना जाएगा।