Friday, April 8, 2011

शहादत..मोमबत्ती या आणविक विस्फोट


बीबीसी पर एक खबर पढी जिसने मुझे झकझोर के रख दिया। खबर थी एक युवा फिल्मकार पुनीत प्रकाश की फिल्म मोमबत्ती की समीक्षा से संबंधित। लेकिन उस समीक्षा ने मन में न जाने कितने ही सवाल खड़े कर दिए। देश पर मरने वाला कोई भी व्यक्ति चाहे वो सैनिक हो या न हो शहीद कहलाता है। लेकिन शहीद की भी कैटेगरी होती हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में अगर समझा जाए तो मुंबई हमले में मरने वाला कोई सैनिक दंतेवाड़ा में नक्सलियों की गोलियों से मरने वाले शहीद से ज्यादा बड़ी शहादत रखता है। इसमें कई लोगों को आश्चर्य भी हो सकता है लेकिन ये सच्चाई है कि हमारे देश में शहीदों की भी कैटेगरी बनी हुई है। हाल ही में 6 अप्रैल गुजरा है। क्या आप जानते हैं कि इस तारीख का जिक्र यहाँ क्यों किया जा रहा है। वो इसलिए किया जा रहा है क्योंकि 6 अप्रैल 2010 को छतीसगढ के दंतेवाड़ा जिले के घने जंगलों में नक्सलियों की 1000 से ज्यादा की फौज ने 76 सीआरपीएफ के जवानों की नृशंस हत्या कर दी थी। सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन की इस टुकड़ी में कुल 80 जवान थे जिसमें से 76 शहादत को प्राप्त हुए। देश में हर साल 26/11 को श्रद्धांजलियों का तांता लग जाता है। मुंबई के शहीदों को याद किया जाता है। कई लोगों को तो उनके नाम तक याद हैं। ईमानदारी से बताएं कि दंतेवाड़ा में मरने वाले कितनें शहीदों के नाम आपको याद हैं? जवाब आपने सोच लिया होगा! दरअसल मैं दोनों हमलों में शहादत को प्राप्त हुए रणबांकुरों में अंतर नही कर रहा हूँ । दरअसल मैं आपको सरकार की सोच से अवगत करा हूँ जिसमें शहादत को अलग-अलग चश्मों से देखने का रिवाज़ बन चुका है। दरअसल सरकार जानती है कि किस शहीद के कारण वोट मिलेंगे और कौनसा शहीद विभिन्न अवसरों पर काम आएगा। दंतेवाड़ा में शहीद हुए ये जवान अपने-अपने गाँव में अब बुत्त के रूप में पहचाने जाएंगे। हो सकता है इनके इलाके का विधायक इनकी शहादत दिवस पर बुत्त पर माला चढा दे वरना पूरे साल तो पक्षियों की गंदगी का ही शिकार होते हैं शहीदों के बुत्त। अखबारों में नित हमारे जवानों की शहादत की खबर छपती रहती है। उन खबरों से सरकार या सरकारी नुमाइंदो पर कोई फर्क नही पड़ता। फर्क पड़ता है तो शहीद के परिवार वालों को जिन्होंने अपने बेटे को देशसेवा के लिए भेजा। दुर्भाग्य तो तब और हावी हो जाता है जब शहीद की शहादत का मुआवजा मिलने के लिए शहीद की पत्नी या उसके बेटे को ये साबित करना पड़ता है कि वो शहीद की पत्नी या उसका बेटा है। सभी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद मुआवजा मिलता है वो भी किश्तों में। ये भावना निश्चित तौर पर एक माँ के मन में अपनी ही सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा करती है। ये आक्रोश एक सैनिक तो पैदा नही करता अपितु एक राष्ट्रविरोधी जरूर पैदा करने का माद्दा रखता है। देश की मीडिया की इस मामले में बड़ी भूमिका हो सकती है लेकिन दुर्भाग्यवश मीडिया भी अपनी भूमिका को एक दायरे में बांधे रखता है। जब भी शहीदों को हक दिलाने की बात आती है तो मीडिया किसी आंदोलन का इंतजार करती है ताकि उसके आसरे खबर बन सके। सैनिकों के लिए बोर्ड तो बने मगर उनकी हालत शहीद से कम नही है।

सवाल कई है कि क्या देश पर कुर्बान होने वाले सैनिकों की शहादत यूं ही तौली जाती रहेगी। शहीद का बेटा नेताओं की बरसी पर श्रद्धांजली को देखता है, क्या उसके मन में ये बात नही आएगी कि उसके शहीद पिता को भी कोई श्रद्धांजली दे? दरअसल हमें हालात बदलने का इंतजार नही करना चाहिए हमें अपने-अपने स्तर पर कोशिश करनी चाहिए कि कैसे वतन पर मिटने वालों के आखिर निशां को बचाकर रखा जा सके। सवाल बड़ा है कोशिश की जा सकती है। अब ये हम पर निर्भर करता है कि कोशिश किस रूप में और कब से शुरू की जाए। मेरे हिसाब से तो ये समय सबसे उचित है।

Thursday, April 7, 2011

नेटवर्किंग..अन्ना की क्रांति

अन्ना हजारे का अनशन रंग ला रहा है। अभी तो सिर्फ दो ही दिन हुए है, अभी तो पूरा आंदोलन बाकी है। जिस तरह से समय के साथ साथ सरकारी नुमाइंदो के बयान लोगों के सामने आ रहे है उससे तो यही साबित होता है कि सरकार के मन में कही न कहीं डर व्याप्त हो चुका है। डर व्याप्त होना स्वाभाविक भी है क्योंकि जिस तरह से अन्ना के समर्थन में देश भर के लोग या ये कहें कि विदेशों के लोग भी उतर आए है उससे सरकार बुरी तरह से डर गई है। आने वाले समय में चुनाव भी है उससे सरकार को अपना जनाधार जाने का डर लगा ही हुआ है। पाँच राज्यों में होने वाले चुनाव सरकार के लिए निश्चित तौर पर लोकसभा चुनावों की जमीन तो तैयार करेंगे ही उसके साथ उनका परिणाम कार्यकर्ताओं के उत्साह को भी प्रभावित करेगा। जिस तरह से इस आंदोलन की धार तेज हो रही है उससे अन्ना के साथ विशाल जनसमर्थन जुड़ता जा रहा है। एक फौज के रूप में लोग विभिन्न माध्यमों को अपना हथियार बनाए हुए हैं। जिस रुप में लोगों को जो माध्यम मिल रहा है लोग उस माध्यम से अन्ना के समर्थन में उतर गए है। अन्ना के साथ जो लोग खड़े हैं वो अपने राजनीतिक व्यक्तिव की वजह से नही अपितु सामाजिक जिम्मेदारियों की वजह से पहचाने जाते है। जिनमें बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश के नाम शामिल है। अब एक ही मंच पर जब इतने लोग इकट्ठे होंगे तो स्वाभाविक है कि सरकार पर गहरा दवाब बनेगा।लेकिन इन सब के बाद अन्ना के समर्थन में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जो माहौल बना है उससे एक नई क्रांति का सूत्रपात हो रहा है। देश के हाइली क्वालिफाइड वर्ग में भी अन्ना का संदेश फेसबुक, टिव्टर ऑरकुट के माध्यम से धड़ाधड़ पहुँच रहा है। आश्चर्य की बात ये है कि इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कार्टून केरेक्टरों के चित्र को टेग करने वाले युवा भी अन्ना पर लिखे कमेंट को ध्यान से पढकर उस पर उनका साथ देने का वादा कर रहे हैं। कुछ लोग इसकी आलोचना भी कर रहे है, और कुछ तो पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर अन्ना के आंदोलन को टाइम फिजूली का हथकंडा भी मान रहे हैं। लेकिन गौरतलब बात ये है कि अन्ना अब जंतर-मंतर के आंदोलन से फेसबुक, टिव्टर, ऑरकुट तक अपनी पहुँच बना चुके है। लोग मेल के आसरे अन्ना के आंदोलन के कई रुप अपनी मित्रमंडली में पहुँचा रहे हैं। फेसबुक लोगों के आमंत्रण का माध्यम बन रहा है। समाज के प्रति जागरूक लोग अपनी वॉल पर जाकर अपने समूह के लोगों को आंदोलन में आने का निमंत्रण भेजा। भारत की जनता के मस्तिष्क में एक ग्लैमरस छवि बनाए हुए हमारे बॉलीवुड के कलाकार भी अन्ना को टिव्टर के माध्यम से खूब समर्थन दे रहे हैं।

हाल ही में जिस तरह से इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने अपनी भूमिका निभाई है उसने निश्चित तौर पर कई क्रांतिकारियों को तो पैदा कर ही दिया है। मिस्त्र, लीबिया, यमन और न जाने उन जैसे कितने ही देशों में इन साइट्स का लोहा माना गया है। ओबामा को अमेरिकी राष्ट्रपति बनाने में भी इन साइट्स ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। गौरतलब बात ये है कि हमारे देश के तथाकथित इंफोटेनमेंट न्यूज चैनलों ने भी सोशल नेटवर्किंग को हाथों हाथ लिया है। कई न्यूज चैनलों ने तो अपने हर बुलेटिन में टिव्टर पर आने वाले कमेंट्स को जगह देनी शुरू कर दी है। इस मामले में टाइम्स नाऊ ने सबको पछाड़ दिया है। मंत्री नेता पत्रकारों को बाइट देने से पहले सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पहले कमेंट लिख देते हैं। दरअसल ये साइट्स खबर प्राप्ति का एक दमदार माध्यम बनती जा रही है। अब मुंबई में बैठी शिवानी दिल्ली में बैठे अपने दोस्त नाजिम को अन्ना के आंदोलन की गतिविधियाँ बताती है। अन्ना सोशल नेटवर्किंग साइट्स के हीरो बन चुके हैं और उनका आंदोलन बन चुका है महान फिल्म का प्रदर्शन। हम चाहते हैं कि अन्ना को उनकी इस फिल्म के लिए जल्दी ही ऑस्कर मिले और बेस्ट निर्देशक का अकादमी अवार्ड मिले किशन बाबूराव हजारे यानि अन्ना हजारे को।


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