
चीन ने अरुणाचल प्रदेश के दो नागरिकों को स्टेपल वीजा देकर सीधे तौर पर फिर से भारत की संप्रभुता पर चोट की है। चीन के इस दुस्साहस ने एक बार फिर ये साबित किया है कि कितनी भी वार्ताएं हो जाएं लेकिन चीन की भारत के संबंध में जो भी नितियाँ है वो नही बदलने वाली। नत्थी वीजा की आड़ में चीन ये जता देना चाहता है कि अरुणाचल को वो किसी भी कीमत पर भारत का हिस्सा नही मानेगा।चीनी प्रधानमंत्री के भारत दौरे के दौरान भी स्टेपल वीजा से लेकर सीमा विवाद औऱ तिब्बत तक के विषय पर चर्चा हुई थी वो बात अलग है कि चर्चा सिर्फ चर्चा के लिए ही हुई थी,न तो उसमे कोई गहनता थी और न ही विवाद सुलझाने की मंशा।चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ भारत आए थे सिर्फ अपने आर्थिक हितों की पूर्ति करने के लिए। न जाने भारत इस बात को क्यों नही मान रहा कि चीन औऱ भारत के तथाकथित मित्र देश भारत को एक बाजार की दृष्टि से ज्यादा और कुछ नही मानते। पाकिस्तान को विभिन्न रुपों में मदद देकर चीन भारत को प्रभावित करने की कोशिश करता रहता है। इस बात से भी इन्कार नही किया जा सकता कि भारत में पनप रहे नक्सलवाद या माओवाद के पीछे चीन का हाथ नही है। दरअसल ये चीन कि विदेश नीति का हिस्सा बन गया कि कैसे भारत जैसे उभरते देश को अस्थिर करके उसके विकास को रोका जा सके। जिस देश में लोकतंत्र समर्थकों को गोलियों से मरवा दिया जाता है उस देश से ये उम्मीद करना बेकार है कि वो खुद पर किसी भी तरह की मुसीबत आने पर किसी लोकतांत्रिक देश की लोकतांत्रिक नितियों के खिलाफ कोई कदम नही उठाएगा। ये सर्वविदित है भारत के पास अभी वो शक्ति नही है कि वो चीन का मुकाबला कर सके। शायद यही कारण है कि चीन लगातार हमारी मांगों के साथ सिर्फ खिलवाड़ कर रहा है। वो कहते हैं न कि शांति बकरी की तरह मिमियाने से नही मिलती शेर की तरह दहाडने से मिलती है। इसलिए अब समय आ गया कि शेर की तरह दहाडा जाए।
स्टेपल वीजा तो चीन के दुस्साहस का एक छोटा सा हिस्सा है। हालांकि चीन के इस हालिया दुस्साहस पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कड़ी आपत्ति दर्ज की है। प्रकाश ने 12 नवंबर 2009 को जारी की गई ट्रैवल एडवाईजरी की याद भी दिलाई जिसमें चीन द्वारा जारी किए गए नत्थी वीजा को भारत से बाहर गैरकानूनी मानने की बात कही गई थी। दरअसल भारत को एक कड़ा कदम उठाने की जरुरत है। वो कदम ये भी हो सकता है कि भारत चीनी उत्पादों को खरीदना बंद कर दे। इससे कम से कम चीन को एक सबक मिलेगा और उसकी अर्थव्यव्स्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से भी निसंदेह चीन को झटका लगेगा। हालांकि ये कदम बहुत कड़ा है लेकिन कुछ तो करना ही पडेगा नही तो चीन का दुस्साहस समय के साथ और भी बढता रहेंगा।
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