
नाइट शिफ्ट में ऑफिस से काम करके सुबह घर लौट रहा था.उस समय आलम ये था कि मेरी आँखे और डीटीसी बस की जर्जर हालत की तेज आवाज युद्धरत थी.मुल्तान नगर की लाल बत्ती पर डीटीसी लाल बत्ती को पार करती हुई निकल गई.पीरागढी पर बस के पहुँचते ही डीटीसी बस के आगे एक ट्रैफिक पुलिस की पीसीआर वैन आकर खड़ी हो गई.मैं भी बस से उतर गया.देखा तो पाया कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी से जुर्माना वसूल करने की कोशिश कर रहा था.देखकर आश्चर्य हुआ कि ऐसा तो होता नही है, मगर हो रहा है तो अच्छा है.ये कवायद सरकार की समानता की नीतियों का समर्थन तो कम से कम कर ही रही है.सरकारी कर्मचारी कोई लाईसेंस प्राप्त कानून भंजक तो है नही ! खैर पुलिसवाले और डीटीसी ड्राइवर का विवाद बढ़ गया.पुलिसवाले का गुस्सा देखकर ड्राइवर थोडा़ नरम पडा और जेब से सौ का नोट निकालकर पुलिसवाले की जेब में डाल दिया.पुलिसवाला झल्लाया तो ड्राइवर ने पचास का एक और नोट निकालकर उसे भी पुलिसवाले की जेब में डाल दिया.पुलिसवाला बस वाले को चेतावनी देकर फौरन निकल गया.
मेरे लिए ये एक अजीब सा ही अनुभव था कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी को रिश्वत दे रहा है मैने ऐसा पहली बार देखा था.भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में रिश्वत एक बेहद सशक्त हथियार है अपने लक्ष्य को भेदने का.बार-बार जागरुकता संबंधी कार्यक्रम जोर मारता है कि शिक्षा भ्रष्ट्राचार का नाश कर सकती है.पर सवाल ये है कि क्या वो दोनो सरकारी कर्मचारी शिक्षित थे? जवाब है नही.क्योंकि शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नही बल्कि नैतिक मूल्यों के प्रति आदर भी है.लेकिन अब नैतिक तो भुला दिया गया है और मूल्य का ही आदर किया जा रहा है.मूल्य चुकाओ और कोई भी काम करवाओ,ये शिगुफा बन गया है.दरअसल भारत में शिक्षा प्रसार सिर्फ 6 घंटो की कवायद ही रह गया है.स्कूल कॉलेजों मे भ्रष्ट्राचार समाप्ति के भाषण सिर्फ वर्किंग ऑवर्स की बात ही रह गई है.सत्य के धरातल पर कुछ और ही बात सामने आती है.हम प्रतिदिन अपने इर्द-गिर्द भ्रष्ट्राचार होता देखते हैं परन्तु उसके खिलाफ आवाज उठाने में कतराते हैं, क्योंकि हमारी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर हमारा विश्वास नही है.वोट देना महज फैशन बन कर रह गया है.और वैसे भी राक्षसों के बीच में भगवान को चुनना तो असंभव ही है.बात होती है एक वोट से दुनिया बदलने की पर सच्चाई ये है कि एक हमेशा से कमजोर होता है.दरअसल भारतीय जनमानस के अंदर राष्ट्र के अस्तित्व को सजाने,संवारने और संरक्षित करने की भावना लगभग मर चुकी है. लोकतंत्र का मतलब ये नही कि लोग अपनी मर्जी से नेता चुने बल्कि लोकतंत्र का उद्देश्य है कि लोग अपनी मर्जी से अच्छा नेता चुने.अब अच्छा नेता क्या है ये समझाने की मुझे जरुरत नही है.राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का भाव ही हमारे मन में होना चाहिए.तभी कुप्रथाएं देश को बचा पाएंगी.लेकिन नीति नियंता कैसे हो इस पर भी विचार होना चाहिए.आप मुझे भी बतायें कि अच्छा नीति नियंता क्या होता है?
मेरे लिए ये एक अजीब सा ही अनुभव था कि एक सरकारी कर्मचारी दूसरे सरकारी कर्मचारी को रिश्वत दे रहा है मैने ऐसा पहली बार देखा था.भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में रिश्वत एक बेहद सशक्त हथियार है अपने लक्ष्य को भेदने का.बार-बार जागरुकता संबंधी कार्यक्रम जोर मारता है कि शिक्षा भ्रष्ट्राचार का नाश कर सकती है.पर सवाल ये है कि क्या वो दोनो सरकारी कर्मचारी शिक्षित थे? जवाब है नही.क्योंकि शिक्षा का मतलब सिर्फ किताबी ज्ञान नही बल्कि नैतिक मूल्यों के प्रति आदर भी है.लेकिन अब नैतिक तो भुला दिया गया है और मूल्य का ही आदर किया जा रहा है.मूल्य चुकाओ और कोई भी काम करवाओ,ये शिगुफा बन गया है.दरअसल भारत में शिक्षा प्रसार सिर्फ 6 घंटो की कवायद ही रह गया है.स्कूल कॉलेजों मे भ्रष्ट्राचार समाप्ति के भाषण सिर्फ वर्किंग ऑवर्स की बात ही रह गई है.सत्य के धरातल पर कुछ और ही बात सामने आती है.हम प्रतिदिन अपने इर्द-गिर्द भ्रष्ट्राचार होता देखते हैं परन्तु उसके खिलाफ आवाज उठाने में कतराते हैं, क्योंकि हमारी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था पर हमारा विश्वास नही है.वोट देना महज फैशन बन कर रह गया है.और वैसे भी राक्षसों के बीच में भगवान को चुनना तो असंभव ही है.बात होती है एक वोट से दुनिया बदलने की पर सच्चाई ये है कि एक हमेशा से कमजोर होता है.दरअसल भारतीय जनमानस के अंदर राष्ट्र के अस्तित्व को सजाने,संवारने और संरक्षित करने की भावना लगभग मर चुकी है. लोकतंत्र का मतलब ये नही कि लोग अपनी मर्जी से नेता चुने बल्कि लोकतंत्र का उद्देश्य है कि लोग अपनी मर्जी से अच्छा नेता चुने.अब अच्छा नेता क्या है ये समझाने की मुझे जरुरत नही है.राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का भाव ही हमारे मन में होना चाहिए.तभी कुप्रथाएं देश को बचा पाएंगी.लेकिन नीति नियंता कैसे हो इस पर भी विचार होना चाहिए.आप मुझे भी बतायें कि अच्छा नीति नियंता क्या होता है?
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