Tuesday, July 6, 2010

शक्ति प्रदर्शन ही कश्मीर त्रासदी का हल

जम्मू कश्मीर में जो भयावह हालात अभी बन रहे हैं वो समूचे देश के लिए एक बड़े खतरे को जन्म दे रहें हैं.भारत विरोधी मानसिकता तो हमेशा से कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त रही ही है और उसको समय-समय पर पोषण देने का काम हमारे देश के तथाकथित सेकुलर नेताओं ने किया. कश्मीर मुद्दे पर सिर्फ वार्ता की पेशकश ने भारत की छवि अपने ही देश में याचक के समान कर दी है.भारतीय नेताओं ने आंतरिक कलह के दौरान याचक की तरह अलगाववादियों के सामने सिर्फ हाथ ही फैलाए हैं.कोई ठोस कार्य़वाही करने पर मानवअधिकारी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद कर लेते हैं.सेना को बदनाम करने के नए नए पैंतरे घाटी में अपनाना कोई नई बात नही है.कभी भारतीय सैनिकों पर तथाकथित रुप से निर्दोंषों की हत्या करने के आरोप लगते हैं तो कभी महिलाओं के साथ जोर जबरदस्ती करने के.कश्मीर भारत का हिस्सा है और इस बात को मानने मे किसी भी भारतीय को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए.लेकिन दुर्भाग्य है कि भारतीयों के अंदर राष्ट्रवाद कही न कही दम तोडता जा रहा है अब भारत की युवा पीढी चलताऊ बन चुकी है जिसे हल्के में काम निपटाने में ही आन्नद आने लगा है.समय आ गया है धोनी की शादी का जो युवाओं मे चर्चा का विषय होती है राष्ट्र की बात बेहद पकाऊ विषय होता जा रहा है..कहते हैं कि किसी देश को बर्बाद करना है तो उसकी संस्कृति के प्रति देश के युवाओं मे दुराग्राह की भावना भर दो.अब राजनीति,संस्कृति-सभ्यता,नैतिक मूल्यों पर विचार विमर्श करना दूर की कोडी हो चुकी है.ये देश के लिए संकट की स्थिति है और दुर्भाग्य तो ये है कि देश की सरकार भी इस ओर उदासीनता का भाव रखे हुए है.शायद यही कारण है कि हमें अब राष्ट्रवाद में भी राजनीति नज़र आती है.
जम्मू में दो साल पहले भारतीय एकता की झलक बाबा अमरनाथ यात्रा के दौरान दिखी थी उस तरह के उदाहरण अभी भी हमारे मन में एक विश्वास जगाते है कि संकट के समय हो न हो हम एक हो ही जाएंगे लेकिन ये विश्वास उस समय कमजोर हो जाता है जब हम वामपंथी माओवाद या कहें आतंकवाद या इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकवाद की तरफ अपनी युवा वाहिनी को बढ़ता देखते हैं.कश्मीर के मामले में हमारा पडोसी देश पाकिस्तान भी हमेशा से अपनी टांग अडाता रहा है और ये कहना भी अतिश्योक्ति नही होगी कि भारत में अलगाववादी ताकतों को समर्थन देने के पीछे या भारत में समय समय पर अशांति फैलाने के लिए पाकिस्तान एक सोची समझी रणनीति के तहत काम करता है.पाकिस्तान द्वारा भारत के अलगाववादियों को आर्थिक मदद भी दी जाती है इसमें भी कोई संदेह नही है.इसी लिए भारत के जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में गोलियों की आवाजें अक्सर सुनाई देती हैं भोले भटके हाथों में बंदूकें दे दी जाती है ताकि समय आने पर वो बंदूके भारत विरोधी आग उगल सकें.भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान तो कश्मीर की गलिय़ों में शौकिया खेल बन चुका है.श्री नगर का लाल चौक तो अक्सर भारत की अस्मिता के बलात्कार का गवाह बना है.भारत का गौरवमयी इतिहास हमें हमेशा सिंहों के समान ललकार सिखाता है मगर दिल्ली का मिमयिना रवैया भारत को नपुंसक बना रहा है.भारतीय सैनिकों को कश्मीर से हटाने के बारे में अक्सर बात होती रहती है लेकिन क्या ये सच नही है कि कश्मीर की मस्जिदों में गद्दारों के रहने के लिए सुरक्षित ठिकानों की व्यवस्था की जाती है औऱ भारतीय सैनिको पर आरोप लगाकर उन्हें वहाँ से हटाने के लिए के प्रपंच किए जाते हैं.कश्मीर में इस समय भारी सुरक्षा बल के होते हुए हालात बेकाबू है तो ऐसा कैसे मान लिया जाए की वहाँ सेना हटाने से हालात सुधर जाएंगे.सिर्फ भाषणों तक ही भारतीय प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था सीमित है.भारतीय गृहमंत्री इस बात को तो मानते है कि अलगाववादियों का पत्थर फैंक अभियान सुनियोजित है जिस पर लगभग 50 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं लेकिन वो इस समस्या का समाधान देने में गच्चा खा जाते हैं.कश्मीर के आतंकियों को तो माफ करके दोबारा पुनर्स्थापित करने की बात तो भारत सरकार ने कह दी मगर उन कश्मीरी पंडितों का दर्द न जाना जो अपनी ही धरती से पराए हो गए.इन सब त्रासदियों को देखकर फिर से सरदार पटेल की याद आती है जो राजनीतिक रुप से तो कम से कम सशक्त थे ही.लेकिन सरदार के नाम पर राजनीति करने वाले ही आज सरदार के आदर्शों और उनकी सोच के साथ खिलवाड कर रहे हैं.संवेदनाओं का भाव तो वोटों के कारण मर चुका है इसलिए 60 वर्षों बाद भी हम अपने ही देश के अभिन्न अंग के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.
क्या हमारे देश की सेना या सुरक्षा एजेसियों पर आज हमें इतना भी भरोसा नही रहा कि वो तिरंगे की आन बचाने के लिए हाथ में हथियार भी न उठा सके.क्या फाइलों के शिमला समझौते अब प्रासंगिक हैं जब भारत माँ की इज्जत तार तार हो रही हो.समाधान की बात होती है तो देश के नीति नियंता सिर्फ कागज के कुछ पन्नों तक सीमित रह जाते हैं.सवाल ये है कि आखिर हमने 60 सालों में इन कागजों को गिनने के अलावा किया ही क्या है?मानवाधिकारों की बात हमेशा की जाती है क्या अपने देश से गद्दारी करने वाला भी मानव होता है जिसने अपने स्वार्थो के लिए अपनी माँ को बेचने का निश्चय कर लिया हो क्या उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि वो भी मानव होंगे.बेशक होगे मानव, लेकिन ऐसे मानव हमें प्यारे नही जो अपनी माँ की छाती में ही खंजर घोंपने की कोशिश करते हैं.हमारे देश मे धार्मिक एकता की बात होती है मेरा सवाल ये है कि कहाँ गए वो एकता के पैरोकार जो शांति के संदेश का दम भरते हैं.अमरनाथ यात्रा पर पत्थर बरसते हैं और फिर भी हम धार्मिक एकता की बात करते हैं.धार्मिक आयोजन के लिए देश की धरती लेने के लिए हमें कीमत चुकानी पडती है उसके साथ संघर्ष भी करना पडता है.और ये कही ओर नही बल्कि कश्मीर में ही हुआ है.महज सौ एकड जमीन के लिए देश के नागरिकों को प्रदर्शन करने पडते हैं.क्या किसी ने किया कोई प्रदर्शन की ये गलत हो रहा है.वो फतवा जारी करने वालों कहाँ गए अब कौन करेगा धार्मिक सौहार्द बिगाडने वालों के खिलाफ फतवा जारी.क्या फतवे सिर्फ धर्म के लिए ही होते हैं देश पर संकट आने पर फतवा आखिर क्यों नही जारी होता? आज जरुरत है एक चुनौती की जो साबित करेगी कि सिंहो को कायर समझना गलती होगी.शिशुपाल ने अब अपनी हदें पार कर ली है कृष्ण को सुदर्शन चलाना ही पडेगा.समय आ गया है भारत को सिरमौर बनाने का जहाँ सिर्फ राष्ट्रवाद होगा माता का आर्शिवाद होगा.क्या हम तैयार है? ये इतना आसान नही है लेकिन ये भी सच है वीर भोग्या वसुंधरा...

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