Thursday, June 10, 2010

दुर्भावनाओं से भरी जनगणना

जात ही पुछो साधु की,मत पुछिए ज्ञान,
मोल करो मयान का,ऊपर से होती पहचान
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दोहों का मतलब बदलने में समय नही लगता. झुठ,फरेब और ऊपरी दिखावे के आसरे सत्ता के तवे पर राजनीतिक लोग और उनके नुमाइंदे अपनी राजनीतिक रोटियाँ खूब सेकते हैं.दस सालों में एक बार होने वाली जनगणना ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में एक नया विवाद पैदा कर दिया है.जनगणना में अब जाति के आधार पर लोगों की गिनती की जाएगी और ये प्रस्ताव एक ऐसे देश में रखा गया है जो अपने मिजा़ज से धर्मनिरपेक्ष है.लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इसी धर्मनिरपेक्ष देश में पहली बार 1991 में उसी सरकार नें धर्म आधारित जनगणना की पैरवी की थी जिसने देश की स्वतंत्रता के बाद संविधान निर्माण में धर्मनिरपेक्षता का भाव डाला था.मैं बात कर रहा हुँ कांग्रेस सरकार की. ये वही कांग्रेस सरकार है जो कि पहले जाति आधारित जनगणना से ना नुकुर कर रही थी और अब समर्थन की मुस्कान से तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों को खुश कर रही है
देश में जाति आधारित जनगणना से निसंदेह जाति व्यवस्था को बल मिलेगा और जनगणना के बाद जो आंकडे़ आएंगे उन पर राजनीतिक गुणा-भाग का जो दौर चालु होगा वो भारतीय संविधान की आत्मा को गहरा आघात पहुँचाएगा.देश की संसद में जाति आधारित जनगणना के मामले में जान फूंकने वालों में जिस यादव तिकड़ी ने गोलबंदी की है वो 70 के दशक के समाजवादी आंदोलन की ही पैदाइश है जिसे राम मनोहर लोहिया लीड कर रहे थे.बड़े दुर्भाग्य की बात है कि यादव तिकडी़ जाति व्यवस्था को बढावा देने का कोई मौका नही छोड़ती औऱ वहीं इनके तथाकथित राजनीतिक पिता राममनोहर लोहिया ने जाति व्यवस्था के जिन्न को बोतल में बंद रखने की ही वकालत की.लेकिन ये राजनीतिक मजबूरियाँ और अस्तित्व को बनाए रखने की कवायद है जो इन्हे जाति व्यवस्था को मजबूत करने की वकालत करने पर मजबूर करती है.दरअसल सपा, राजद,जेडीयू और बसपा ये वो पार्टियाँ है जो मुद्दों के आसरे नही बल्कि अपने जातिगत व धार्मिक प्रपंचों के आसरे सत्ता पर काबिज होने की जोड तोड करते हैं महिला आरक्षण का विरोध ये अपनी पुरुषवादी मानसिकता को संरक्षित करने के लिए करते हैं.आरक्षण की पैरवी करने वाले महिला आरक्षण को सिरे से नकार देते हैं और संसद में जहर खाने तक की धमकी देते हैं. राष्ट्रवाद,अफजल की फांसी,बांग्लादेशी घुसपैठ पर इनकी चुप्पी सिर्फ यही साबित करती है कि राष्ट्रहित इनके लिए नगण्य है.अब जब राष्ट्रहित की भावना ही नही है तो स्वाभाविक है कि अपने निजी स्वार्थ सर्वोपरि हो जाएंगे तभी तो मांग उठती है जातीय जनगणना की, जिसमें हम जान पाएंगे कितने लोग देश में मैला ढोने वाली जात के हैं और कितने पंडिताई कर रहे हैं.इनसे कुछ हो न हो लेकिन नेताओं का बडा फायदा होगा.नेताओं को चुनावों के दौरान राजनीतिक बिसात बिछाने में आसानी हो जाएगी.फिर चुनाव में खडे होने के इच्छुक उम्मीदवारों के बायोडाटा में जातियों का समीकरण भी मायने रखेगा.खैर दुख तो तब होता है जब राष्ट्रीय पार्टियाँ भी जाति आधारित जनगणना का समर्थन करती है. साम्यवादी समाजवाद को भूल जाते हैं,वर्ग संघर्ष के सिद्धांत को लात मारते हैं और वहीं भाजपाई पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद को दरकिनार करके जाति आधारित जनगणना का समर्थन करते हैं.वहीं कांग्रेस की तो पुरानी नीति रही है कि परिस्थितियों को देखकर रंग बदलना.वो भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को सर्वोपरि रखकर देश के माथे पर जातिवादी कलंक लगाना चाहती हैं.
खैर अगर मोटे तौर पर देखा जाए तो देश में 3000 जातियाँ और 25000 उपजातियाँ हैं और जाति आधारित जनगणना के बाद इन जातियों में बढोतरी स्वाभाविक है.21वीं सदी में जाति विहीन समाज की कल्पना को मूर्त रुप देना तो इस तरह की जाति आधारित जनगणना से मुमकिन नही हैं.हम सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के ख्वाब देख रहे हैं और राजनीतिक प्रपंचों से ही सुरक्षित नही है.हम ममता सौढा को एवरेस्ट पर चढता देखते हैं और वहीं मिर्चपुर में दलितों पर अत्याचार को भी सामने पाते हैं.देश में नक्सली मौत का तांडव खेलते हैं,मंहगाई दम निकाल रही है, फिर भी हम जाति व्यवस्था में समय बर्बाद कर रहे हैं. राजनीतिक खिलवाड़ तो देश की जनता से हो ही रहा है लेकिन ये हमेशा जारी रहेगा ऐसा हम होने नही देंगे. राष्ट्रवाद ही इन सारी यातनाओं से हमें मुक्ति दिला सकती है.जातिगत दुर्भावनाओं से ऊपर उठकर ही देश को प्रगति की ओर ले जाया जा सकता है.

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