Thursday, August 26, 2010

कुचलते अरमान


हर तरफ विरानियाँ है
कहीं टूटे दरख्त तो कुछ झड़े हुए पत्ते पडे़ हैं
राहों में
कुचले जा रहे हैं
पैरों तले
कुछ एलिट जूते तो
कभी मजदूर की टूटी चप्पलों तले
हर बार कुचल रहा है
उन्हें कोई
पहचान करना जरा मुश्किल है
लेकिन ये जरुर कहा जा सकता है
कि हर कोई कुचल रहा है
किसी दूसरे के अरमानों को.

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