Sunday, May 16, 2010

तबीयत से पत्थर तो उछालो.

हम भारतीय भी विचित्र प्राणी हैं हमारी हार को तो हम बर्दाश्त नही कर सकते लेकिन जब हार जाते है और हमारा चिर प्रतिदंद्दी मैदान मे होता है तो हम उसके जीतने की भी दुआ करते हैं. है न अजीब? आखिर हो भी क्यों न, हम है ही विभिन्नता में अपना पन ढूंढने वाले लोग.इसका सबसे बड़ा उदाहरण इन आईपीएल मैचों के दौरान देखने को मिला जब हमारी टीम सेमीफाइनल में भी नही पहुंच पाई लेकिन भारतीयों की रगों में बहने वाले खून को जला देने वाली टीम पाकिस्तान का मुकाबला जब आस्ट्रेलिया से होता है तो हम अपनी उंगलियों को क्रास करके बैठ जाते हैं और हवाला देते है कि हम नही तो हमारे द्वीप की टीम ही सही. इस तरह की भावना किसी छोटी मानसिकता वाले व्यक्ति के दिमाग में आ ही नही सकती. खैर कई बार कुंठाओं से भी भरे होते हैं.जैसे ऑस्ट्रेलिया का मुकाबला जब इंग्लैंड से होता है तो भारतीय इंग्लैंड की जीत की आस लगाता है.दिलचस्प है भारतीय मानसिकता. ऑस्ट्रेलिया की हार उसके विश्व विजेता की छवि को धूमिल करेगी इसलिए इंग्लैंड को जीतना चाहिए.200 सालों की गुलामी को हम अचानक भुला बैठते हैं.दरअसल हमारी भावनाओं पर हमारा अंकुश नही रहता.अपने विचार को निरंतर बदलना आदत बन चुकी है.दरअसल हमारी मानसिकता कुछ अन्य लोग निर्धारित करते हैं.मीडिया द्वारा वाहवाही पर ढोल पीटे जाते हैं और उसकी मुखालफत पर हम जूतों का हार भी तैयार करते हैं. एक निश्चित और निर्धारित सोच का अभाव हमारे अंदर निरंतर नज़र आता है.बहानेबाजी के आसरे सहूलियतों को पा लेना ही एकमात्र उद्देश्य हो गया है.इस बहानेबाजी और असमान सोच को भली भांति जानते हुए भी जोखिम उठाना समझदारी से समझौता है.खैर विश्वभर को अपनी बादशाहत के तले दबाने वाले अंग्रेजों की एक और जीत पर बेशक खुशी मनाई जाए लेकिन ये खुशी संतुष्टि है न की हर्ष का विषय.संतुष्टि इसलिए क्योंकि ऑस्ट्रलिया की टीम हार गई. टीम वर्क ने इंग्लैंड को पहला वर्ल्ड कप तो दिला दिया लेकिन ये संकेत है सत्ता परिवर्तन का.इसलिए भारतीयों को मजबूत होकर अपनी जीत की इच्छा ही करनी चाहिए.सिर्फ बयानबाज़ी इस इच्छा की पूर्ति नही करेगी.

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