Saturday, May 15, 2010

थोड़ा डिपलोमेटिक हो जाएं.

आज ऐसा लगा जैसे कोई छुट गया,
हाथ का खिलौना,हाथ में ही टुट गया,
चले थे नई इबारत लिखने,
लेकिन दुनिया बडी बेगैरत निकली,
टाँग खिंचकर नीचे गिरा दिया,
हाथ बढाया था कि,
कोई शायद पकडेगा,
पकड़ा तो था मगर काट दिया गया,
हाथ कटते भी दुख नही हुआ,
सोचा कोई सहारा बनेगा,
लेकिन जिसे साथी बनाया,
वही धोखेबाज़ निकला अब समझ आया कि,
साहब थोडा डिपलोमेटिक होते,
तो ज्यादा तरक्की कर पाते,
कटा हाथ लिए नही घुमते,
हाथ बचाने का फन सीख जाते कोशिश करुँगा थोडा,
डिपलोमेटिक हो जाऊँ,
क्योंकि मैं भी बड़ा आदमी बनना चाहता हुँ।
आशा है बन पाऊँ...

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