
दिल्ली के गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति में कस्तूरबा गाँधी के 68वें निर्वाण दिवस के मौके पर “करघा यज्ञ” के दौरान मंच से उदबोधन देती महिला ने उपस्थित लोगों से अपील की कि वो अपने स्थानों पर ही बैठे रहें और ध्यान से चर्चा को सुनें। विषय था “बुनकरों के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान”। काफी कुर्सियाँ बयां कर रही थी कि आधुनिकता के फेर में हम परपंराओं को भुला आए हैं। संस्कृति से मुंह मोड़कर हम ग्लोबल कल्चर की तरफ बढ़ गए हैं, जहाँ स्मार्ट वर्क की कसौटी पर सदैव मेहनती हाथों को मात खानी पड़ती है। खादी को महंगा बताकर नज़रअंदाज करना आदत है हमारी लेकिन जब नज़र चाइनिज कपड़ों पर जाती है तो फैशन के दौर में पैसे कोई औकात नही रखते। दरअसल जब इस तरह के सवाल उठते हैं तो जवाबी कार्रवाई को तौर पर कुछ संस्थाएं अतीत की तरफ लौटती हैं और याद दिलाती हैं हमारा गौरवमयी इतिहास जिसे हम अकस्मात भूलते जा रहे हैं। याद्दाश्त को ताज़ा करने के लिए जब पहुँचते हैं ऐसे मंचों पर तो ज्यादा झेल नही पाते, मंच से आवाज़ आती है, बैठ जाइए, ध्यान से सुनिए हम संस्कृति और लाखों बुनकरों का दर्द बयां कर रहे हैं।
“बुनकर”! सिर्फ एक पेशा नही बल्कि प्रतीक भारतीयता का, मिट्टी की सौंधी महक का। स्वतंत्रता सेनानियों ने करघा के आसरे क्रांति का ख्वाब देखा और स्वतंत्रता प्राप्ति की तरफ अग्रसर हुए। स्वतंत्र तो हम हुए परंतु करघा दम तोड़ता गया। कपास से कपड़े तक के सफर में करघे पर जिंदगियाँ दम तोड़ती नज़र आती है। सिलसिला बदस्तूर जारी है। गाँधी जी ने कहा था कि “उत्पादन आम लोगों द्वारा किया जाए, जिससे समाज के पिछड़े लोग भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें”। 25 लाख हैंडलूम देशभर में है जिनमें 40 से 50 लाख लोग दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने की जद्दोजहद में अपना पूरा दिन सूत, रेशम और चरखे के बीच बिता देतें है। लेकिन सिर्फ वो संतुष्ठ हैं । छोड़ देना चाहते हैं इस काम को, लेकिन सांस्कृतिक और परिवेशिक मजबूरियों के साए में उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन तो सुनहरी सुबह आएगी। चरखे के घूमने के साथ दिनचर्या शुरू होती है और सूरज ढलने तक चरखा हाथ में ही रहता है । अनुमान के अनुसार हथकरघा उद्योग से जुड़े 60 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे यानि बी.पी.एल के अंतर्गत आते हैं। बड़े धड़ल्ले से प्रचार किया जाता है कि खादी हमारी धरोहर है संस्कृति है परंतु अगर संस्कृति और धरोहर को संजोने में बहुसंख्यक वर्ग बर्बाद हो जाए तो स्वत: ही ऐसी संस्कृति के पत्तन में समय नही लगेगा। समस्याओं का एक पूरा पहाड़ बुनकर सामने लिए खड़ा है। वो चाहे सूत या धागे की अनुपलब्धता हो या मूलभूत संसांधनों की कमी। कर्ज के तले दबा बुनकर पूरे दिन में इतना ही कमा पाता है कि वो दो वक्त की रोटी खा सके। कर्ज अदायगी या समाज के कर्मकांडों का परस्पर पालन भी जरूरी होता है। स्त्रोत एक, परंतु पूर्ति सभी जिम्मेदारियों की करनी आवश्यक है। रोशनी के अभाव में डिजाइन का फेर, बुनकर की कई दिनों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। और सबसे बड़ी बात कि खादी और हथकरघा से बने उत्पादों की तरफ लोगों का मोहभंग होना। दिल्ली में इकट्ठा हुए इन 600 बुनकरों में किन्ही 4 को चुन लीजिए और उनके दिल का हाल जानिए। समस्या एक सी ही नज़र आई। बिहार के रक्सौल की किशोरी देवी 1700 से 1800 रूपये महीना कमा पाती हैं। पति भी यही काम करते हैं। यानि हद से हद 4000 रूपये महीना। हरियाणा के कुरूक्षेत्र जिले के लियाकत भी अपना दर्द बयां करते सिसकने लगते हैं। कहते हैं दिल्ली आए हैं ताकि अपनी आवाज़ और मजबूरियाँ नेताओं और कथित समाजसेवकों को नज़दीक से सुना और दिखा सकें।
पावरलूम ने हैंडलूम पर तगड़ा आधिपत्य जमा लिय है। या ये कहें कि मशीनों की ग्रीस के आगे बुनकर का पसीना कोई अहमियत नही रखता। हैंडलूम से बनने वाला उत्पाद पावरलूम की अपेक्षा अधिक समय मे तैयार होता है। उद्योगपतियों की तिजौरियों में तो धन इकट्ठा होता जा रहा है मगर बुनकर शाम की रोटी के लिए धागों में जद्दोजहद करने में उलझा हुआ है। करोड़ों के राहत पैकेजों के आसरे बुनकरों की स्थिति को मजबूत करने के बारे में विचार किया जाता है लेकिन ये भी गौरतलब है कि बुनकर राजनीतिक बिसात पर मोहरों की तरह ही इस्तेमाल हो रहे है। पैकेज के पैसे और सुविधाओं का सही आवंटन न होना समस्या को और ज्यादा गंभीर बना रहा है। बजट में 3000 करोड़ और कुछ महीनों पहले करीब सवा 6 हजार करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा ने बुनकरों की आंखों में रोशनी तो जगाई मगर अब वो अंधेरे में बदलती जा रही है क्योंकि पैकेज अभी तक सिर्फ कागज़ी साबित हुए हैं। वाराणसी में हाल ही में बुनकरों की सही संख्या को जानने के लिए रजिस्ट्रेशन हुआ मगर वो भी चुनाव आचार संहिता के कारण सिर्फ कागज़ों में दबा रह गया है। बुनकरों में मुसलमानों की अच्छी संख्या है राजनीतिक पार्टियाँ उसे नज़रअंदाज नही कर सकती इसलिए बुनकरों के विकास की बात उठती तो है मगर राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए। जमीनी स्तर पर बुनकरों की स्थित में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन आया हो ऐसा प्रतीत नही होता। बुनकर के लिए अपने उत्पाद को बेचने के लिए बाज़ार का न होना भी बडी समस्या है। बाजार न होने के एवज़ में बुनकर अपना उत्पाद साहूकारों को बेचता है जिससे बुनकर तो औने-पौने दाम पाता है मगर साहूकार उस उत्पाद के आसरे खूब चांदी काटता है। बुनकरों को सही और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सरकारी प्रयासों को तो बट्टा लग ही रहा है, पैकेजों के सही वितरण न होने के कारण भ्रष्टाचार में भी बढ़ोतरी हो रही है, क्योंकि सरकारी सुविधाओं के वितरण के बाद मलाई चाटने में सरकारी फर्म पीछे हो ऐसा कम ही देखने को मिलता है।
खैर दिल्ली में बुनकरों ने इतनी बड़ी संख्या में पहुँचकर अपनी आवाज़ सुनाने का प्रयास जरूर किया। न्याय के लिए गुहार अगर राजघाट से लगाई जाए तो उसके मायने कुछ और होते हैं लेकिन उन मायनों को समझना जरूरी है। राहत और पैकेज दोनों शब्दों के मायने अलग-अलग हैं लेकिन पैकेजेस का सही इस्तेमाल किया जाए तो निश्चिततौर पर वो राहत जरूर पहुँचाते हैं। लेकिन नीति निर्माण करने में और उसके क्रियान्वयन में फर्क होता है। 2007 में 25 हजार की संख्या में भूमिहीन श्रमिकों का जत्था राजघाट पहुँचा था। हाथों में सफेद और हरे ध्वज लिए हुए इन प्रदर्शनकारियों की मांग भूमि और आजीविका संबंधी विवादों के निपटारे के लिए राष्ट्रीय भूमि प्राधिकरण फास्ट ट्रैक अदालतें और सिंगल विंडो सिस्टम शुरू करने की थी। इन प्रदर्शनकारियों की कदम ताल ने उस दौर में संसद तक को हिला दिया था। सरकारी आश्वासन मिला परंतु आज वो आश्वासन दम तोड़ चुका है। बहरहाल सूरत नही बदल पाई, कोशिश तो की थी। अब फिर एक आग जली है। आसरा कस्तूरबा गाँधी की पुण्यतिथि को बनाया गया है लेकिन बुनकरों की गिरती हालत वाक्ये में चिंता का विषय है। हल्ला बोल दिया गया है। मगर हथियार गाँधीवादी तरीका है ,देखते हैं बुनकर आज़ादी पाता है या नही ! हालांकि 2014 के आम चुनावों तक सरकारी नज़रे वापस बुनकरों पर लौटेंगी इसके आसार कम ही नज़र आते है।
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